विशेषस्वास्थ्य

IGMC संकट पर सियासत की शर्मनाक तस्वीर, मरीज नहीं, माइक्रोफोन और सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया केंद्र में

बीजेपी–कांग्रेस की बयानबाज़ी में दब गया मरीज का दर्द, इलाज बना राजनीतिक हथियार

WhatsApp Image 2026-02-05 at 5.59.45 PM

हिमाचल प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (IGMC) से जुड़ा डॉक्टर–मरीज विवाद जहाँ संवेदनशीलता, संयम और जिम्मेदार नेतृत्व की मांग करता था, वहीं यह दुर्भाग्यपूर्ण रूप से राजनीतिक बयानबाज़ी और ओछी प्रतिस्पर्धा का मंच बन गया।

भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस—दोनों ने इस गंभीर मानवीय संकट को जनहित की बजाय राजनीतिक लाभ के चश्मे से देखने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

No Slide Found In Slider.

मरीज नहीं, माइक्रोफोन केंद्र में और सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया केंद्र में

डॉक्टर–मरीज हिंसा और उसके बाद की हड़ताल ने आम लोगों को इलाज से वंचित किया, लेकिन इस पीड़ा पर मरहम रखने के बजाय नेताओं ने कैमरों के सामने खड़े होकर एक-दूसरे पर आरोपों की बौछार कर दी।
भारतीय जनता पार्टी ने इसे सरकार की “अराजकता” और “प्रशासनिक विफलता” करार दिया, जबकि कांग्रेस ने विपक्ष पर “उकसावे” और “संस्थानों को बदनाम करने” का आरोप लगाया।
दोनों दलों की जुबान में मरीज कहीं नहीं था—सिर्फ सत्ता और विरोध की राजनीति थी।

No Slide Found In Slider.

संवेदनशील विषय पर असंवेदनशील शब्द

नेताओं के बयान न तो तथ्यपरक थे, न समाधान-उन्मुख। कहीं डॉक्टरों को “गुंडा” कहा गया, तो कहीं मरीजों के परिजनों को “राजनीतिक मोहरा” बताकर खारिज कर दिया गया।
ऐसी भाषा न केवल आग में घी डालने का काम करती है, बल्कि अस्पताल जैसे संवेदनशील संस्थानों में तनाव को और बढ़ाती है। सवाल यह है कि क्या किसी भी पक्ष ने यह सोचा कि इन बयानों का असर उस मरीज पर क्या होगा, जो अगले दिन ऑपरेशन की उम्मीद लेकर अस्पताल आया था?


राजनीतिक श्रेय–दोष का खेल

बीजेपी ने जहां पूरे मामले को राज्य सरकार की नाकामी बताकर राष्ट्रीय स्तर पर भुनाने की कोशिश की, वहीं कांग्रेस ने हर आलोचना को “राजनीतिक साज़िश” कहकर टालने का रास्ता चुना।
नतीजा यह हुआ कि:

  • न डॉक्टरों की सुरक्षा पर गंभीर चर्चा हुई

  • न मरीजों के अधिकारों पर ठोस बयान आया

  • न ही स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार का कोई रोडमैप सामने रखा गया

दोनों दलों की प्राथमिकता स्पष्ट थी—समाधान नहीं, श्रेय और दोष का खेल


जब राजनीति मर्यादा भूल जाए

लोकतंत्र में विपक्ष का सवाल पूछना और सरकार का जवाब देना आवश्यक है, लेकिन संकट के समय मर्यादा और संवेदनशीलता उससे भी अधिक ज़रूरी होती है।
अस्पतालों में इलाज रुकना कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि मानवीय आपातस्थिति है। इस पर बयानबाज़ी नहीं, ठोस हस्तक्षेप और जिम्मेदार संवाद होना चाहिए था।


निष्कर्ष: जनता सब देख रही है

IGMC प्रकरण ने एक बार फिर साबित कर दिया कि हमारे राजनीतिक दल संकट को अवसर में बदलने की कला में तो माहिर हैं, लेकिन याद रखना चाहिए—
इलाज रुकने की कीमत वोट नहीं, जानें चुकाती हैं।

बीजेपी और कांग्रेस दोनों को समझना होगा कि स्वास्थ्य जैसे विषय पर ओछी राजनीति अंततः जनता के भरोसे को चोट पहुंचाती है।
आज सवाल यह नहीं कि कौन सत्ता में है या विपक्ष में—
सवाल यह है कि जब मरीज तड़प रहा था, तब राजनीति किसके साथ खड़ी थी?

Deepika Sharma

Related Articles

Back to top button
Close