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EXCLUSIVE: हिमाचल में इन्क्लूसिव एजुकेशन को झटका , बजट में कटौती

पहले मिलता था ज्यादा बच्चों को लाभ अब मिल रही कम बच्चों को राहत

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हिमाचल में इन्क्लूसिव एजुकेशन के बजट को केंद्र सरकार से करारा झटका लगा है। सूचना है कि जो बजट इंक्लूसिव एजुकेशन के तहत हिमाचल को मिलता था

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उसमे कटौती हुई है। गौर हो कि हिमाचल को लगभग तीन करोड़ का बजट इंक्लूसिव एजुकेशन के लिए रहता था लेकिन इसमें कट लगाया गया है।

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कई विशेष बच्चे लाभ लेने से छूटे

अब कई इलाकों से ऐसी शिकायतें आ रही है कि पहले जहां चालीस बच्चों को बजट के तहत लाभ मिलता था अब बजट की कटौती के तहत सिर्फ तीस बच्चों को मिल रहा है। जो उन बच्चों को लाभ लेने से रोक रहा है जो पहले,बच्चे इंक्लूसिव एजुकेशन के बजट के तहत कुछ विशेष कार्यक्रमों का लाभ उठा पा रहे थे। जो बहुत ही दयनीय स्थिति रहती है।

क्या है समावेशी शिक्षा

समावेशी शिक्षा (अंग्रेज़ी: Inclusive education) से आशय उस शिक्षा प्रणाली से है जिसमें एक सामान्य छात्र एक दिव्यांग छात्र के साथ विद्यालय में अधिकतर समय बिताता है। दूसरे शब्दों में, समावेशी शिक्षा विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों को सामान्य बालकों से अलग शिक्षा देने की विरोधी है।

शिक्षा का समावेशीकरण यह बताता है कि विशेष शैक्षणिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए एक सामान्य छात्र और एक दिव्यांग को समान शिक्षा प्राप्ति के अवसर मिलने चाहिए। पहले समावेशी शिक्षा की परिकल्पना सिर्फ विशेष छात्रों के लिए की गई थी लेकिन आधुनिक काल में हर शिक्षक को इस सिद्धांत को विस्तृत दृष्टिकोण में अपनी कक्षा में व्यवहार में लाना चाहिए।[1]

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समावेशी शिक्षा या एकीकरण के सिद्धांत की ऐतिहासिक जड़ें कनाडा और अमेरिका से जुड़ीं हैं। प्राचीन शिक्षा पद्धति की जगह नई शिक्षा नीति का प्रयोग आधुनिक समय में होने लगा है। समावेशी शिक्षा विशेष विद्यालय या कक्षा को स्वीकार नहीं करता। अशक्त बच्चों को सामान्य बच्चों से अलग करना अब मान्य नहीं है। विकलांग बच्चों को भी सामान्य बच्चों की तरह ही शैक्षिक गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार है।

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समावेशी शिक्षा, निम्नलिखित कारणों से महत्वपूर्ण है-

1. शारीरिक दोषमुक्त विभिन्न बालकों की विशेष आवश्यकताओं की सर्वप्रथम पहचान करना तथा निर्धारण करना।

2. शारीरिक दोष की दशा को बढ़ाने से पहले कि वे गम्भीर स्थिति को प्राप्त हो, उनके रोकथाम के लिये सर्वप्रथम उपाय किया जाना। बालकों के सीखने की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए कार्य करने की विभिन्न नवीन विधियों द्वारा विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करना।

3. शारीरिक रूप से विकृतियुक्त बालकों का पुनर्वास कराया जाना।

4. शारीरिक रूप से विकृतियुक्त बालकों की शिक्षण समस्याओं की जानकारी प्रदान करना।

5. शारीरिक रूप से विकृतियुक्त बालकों की शिक्षण समस्याओं की जानकारी प्रदान करना तथा सुधार हेतु सामूहिक संगठन की तैयारी किया जाना।

6. बालकों की असमर्थताओं का पता लगाकर उनके निवारण का प्रयास करना।

Deepika Sharma

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