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कफ सिरप पर शिकंजा या जिम्मेदारों पर पर्दा?

एक सिरप से हुई मौतों के बाद सरकार ने पूरे देश के केमिस्टों पर नियंत्रण बढ़ाया, लेकिन सवाल उठ रहा है—क्या असली जिम्मेदारों पर भी उतनी ही सख्ती हुई?

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“कफ सिरप पर शिकंजा: दोषी कौन था और सजा किसे मिल रही है?”

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बच्चों की मौत का दर्द, लेकिन सजा पूरे देश के केमिस्ट और मरीजों को?

विशेष रिपोर्ट | असर मीडिया हाउस

केंद्र सरकार ने 9 जून 2026 को जारी अधिसूचना G.S.R. 477(E) के माध्यम से Drugs Rules, 1945 की Schedule K से “Syrups” शब्द हटा दिया है। इसके परिणामस्वरूप कफ सिरप सहित अधिकांश सिरप आधारित दवाएं अब ओवर-द-काउंटर (OTC) श्रेणी से बाहर हो जाएंगी और उनकी बिक्री डॉक्टर के पर्चे पर निर्भर होगी।

सरकार का तर्क है कि यह कदम दवा सुरक्षा और दुरुपयोग रोकने के लिए उठाया गया है। लेकिन देशभर के फार्मासिस्टों और मरीजों के बीच एक बड़ा सवाल उठ रहा है—

क्या व्यवस्था की विफलता की सजा पूरे देश के केमिस्टों और आम नागरिकों को दी जा रही है?


आखिर हुआ क्या है?

अब तक Schedule K के तहत कुछ परिस्थितियों में कफ सिरप जैसी दवाओं की बिक्री को विशेष छूट प्राप्त थी। नए संशोधन के बाद यह छूट समाप्त कर दी गई है। सरकार का कहना है कि अब कफ सिरप केवल लाइसेंसधारी फार्मेसी और निर्धारित नियमों के अनुसार ही उपलब्ध होंगे।


सबसे बड़ा सवाल: दोषी कौन था?

यदि किसी कफ सिरप के सेवन से बच्चों की मौत हुई, तो जिम्मेदारी किनकी बनती है?

  • दवा निर्माता की?
  • गुणवत्ता जांच एजेंसियों की?
  • ड्रग इंस्पेक्टरों की?
  • सरकारी खरीद प्रणाली की?
  • चिकित्सकीय निगरानी की?

या फिर उस अंतिम व्यक्ति की, जो काउंटर पर मरीज को दवा देता है?

यही वह प्रश्न है जिस पर फार्मा जगत में बहस तेज हो रही है।


केमिस्ट: दुकानदार या प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी?

दवा कानून के अंतर्गत लाइसेंसधारी मेडिकल स्टोर किसी सामान्य दुकान की तरह संचालित नहीं होते। वहां दवा वितरण की जिम्मेदारी एक पंजीकृत फार्मासिस्ट या सक्षम व्यक्ति (Competent Person) के अधीन होती है।

यदि एक प्रशिक्षित फार्मासिस्ट अच्छी प्रतिष्ठा वाली कंपनियों के सुरक्षित कफ सिरप मरीज को देता है, तो क्या उसे पूरी तरह निर्णय प्रक्रिया से बाहर कर देना उचित है?

यह सवाल अब उद्योग जगत खुलकर पूछ रहा है।


क्या असली समस्या नकली और घटिया निर्माण नहीं?

भारत और दुनिया के कई देशों में कफ सिरप से जुड़ी त्रासदियों की जांचों में बार-बार गुणवत्ता, निर्माण और निगरानी तंत्र पर प्रश्न उठे हैं।

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यदि कोई घटिया या दूषित सिरप बाजार तक पहुंचा, तो इसका अर्थ है कि—

  • निर्माण स्तर पर विफलता हुई,
  • निरीक्षण स्तर पर विफलता हुई,
  • गुणवत्ता नियंत्रण स्तर पर विफलता हुई,
  • और कई मामलों में सरकारी खरीद प्रणाली भी सवालों के घेरे में आई।

ऐसे में आलोचक पूछ रहे हैं कि क्या उत्पादन और निरीक्षण तंत्र को मजबूत करने के बजाय खुदरा बिक्री पर प्रतिबंध सबसे आसान प्रशासनिक रास्ता चुना गया है?


क्या मरीजों की परेशानी बढ़ेगी?

ग्रामीण भारत में अक्सर मामूली खांसी-जुकाम के लिए लोग नजदीकी मेडिकल स्टोर पर निर्भर रहते हैं।

नई व्यवस्था के बाद:

  • डॉक्टर तक अतिरिक्त दौड़,
  • अतिरिक्त परामर्श शुल्क,
  • अस्पतालों पर अतिरिक्त बोझ,
  • दूरदराज क्षेत्रों में इलाज में देरी,

जैसी चुनौतियां सामने आ सकती हैं।

विशेषकर उन इलाकों में जहां पहले ही डॉक्टरों की भारी कमी है।


एक और चिंता: क्या इससे अनौपचारिक बाजार बढ़ेगा?

विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि अत्यधिक प्रतिबंध कई बार वैध बाजार को कमजोर और अवैध बाजार को मजबूत कर देते हैं।

यदि मरीज को साधारण कफ सिरप के लिए भी डॉक्टर तक जाना पड़ेगा, तो संभावना है कि कुछ लोग गैरकानूनी या अनियंत्रित स्रोतों की ओर रुख करें।


सरकार का पक्ष

सरकार और नियामक संस्थाओं का कहना है कि कफ सिरप के दुरुपयोग और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को देखते हुए नियंत्रण आवश्यक था। इसी कारण Schedule K से “Syrup” हटाने का निर्णय लिया गया।


निष्कर्ष

बच्चों की मौत जैसी त्रासदियां किसी भी सभ्य समाज को झकझोर देती हैं। दोषियों को कठोर सजा मिलनी चाहिए।

लेकिन असली बहस यह है कि—

क्या खराब निर्माण, कमजोर निगरानी और नियामकीय विफलता की जिम्मेदारी तय किए बिना पूरे देश के केमिस्टों और करोड़ों मरीजों पर नई पाबंदियां थोपना समस्या का समाधान है?

या फिर यह उस व्यवस्था की स्वीकारोक्ति है जो नकली और घटिया दवाओं को बाजार तक पहुंचने से रोकने में विफल रही?

कफ सिरप पर नियंत्रण बढ़ गया है, लेकिन देश अब भी जवाब चाहता है—बच्चों की मौत का असली जिम्मेदार कौन था, और कार्रवाई आखिर किस पर हुई?

Deepika Sharma

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