असर विशेष: तनाव में हिमाचल, इलाज को विशेषज्ञों का इंतजार
NHM के तहत 12 क्लिनिकल साइकियाट्रिस्ट और 42 क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट के पद प्रस्तावित, नहीं मिल रहे डॉक्टर्स
योग्य विशेषज्ञ नहीं मिलने से नियुक्तियां अटकीं; मेडिकल कॉलेजों की ओपीडी में बच्चों में बढ़ता मानसिक तनाव चिंता का कारण
शिमला। हिमाचल में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चुनौती लगातार बढ़ रही है, लेकिन इससे निपटने के लिए जरूरी विशेषज्ञों की उपलब्धता अभी भी बड़ी समस्या बनी हुई है। एक ओर बच्चों और युवाओं में मानसिक तनाव, चिंता और व्यवहार संबंधी परेशानियों के मामले सामने आ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के तहत 12 क्लिनिकल साइकियाट्रिस्ट और 42 क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट के पद रखे जाने का प्रस्ताव है। इन पदों को भरने की कवायद होती है, लेकिन पर्याप्त संख्या में योग्य विशेषज्ञ उपलब्ध न होने के कारण नियुक्तियां नहीं हो पातीं और पद खाली रह जाते हैं।
इसका सीधा असर प्रदेश के शहरी इलाकों में नहीं ही नहीं बल्कि दूरदराज और जनजातीय क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं पर भी पड़ रहा है। हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में, जहां कई क्षेत्रों से जिला मुख्यालय या मेडिकल कॉलेज तक पहुंचना भी चुनौती है, वहां स्थानीय स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की उपलब्धता बेहद जरूरी हो जाती है।
मेडिकल कॉलेजों की ओपीडी में पहुंच रहे तनाव से जूझते बच्चे
प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों की ओपीडी में बच्चों और किशोरों से जुड़े मानसिक तनाव के मामले सामने आ रहे हैं। अभिभावक बच्चों के व्यवहार में बदलाव की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं। कई बच्चों के बारे में अभिभावक बताते हैं कि वे अकेले रहना चाहते हैं, बातचीत कम कर रहे हैं, भूख कम लगती है, पढ़ाई में मन नहीं लगता और छोटी-छोटी बातों को लेकर तनाव महसूस करते हैं।
कई मामलों में बच्चों पर पढ़ाई और बेहतर प्रदर्शन का दबाव बड़ी वजह बनकर सामने आता है। अभिभावकों की ओर से अच्छे अंक लाने और हर क्षेत्र में बेहतर करने की लगातार अपेक्षा बच्चों पर मानसिक दबाव बढ़ा सकती है। वहीं, मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और डिजिटल उपकरणों का अत्यधिक इस्तेमाल भी बच्चों की दिनचर्या और व्यवहार को प्रभावित कर रहा है।
बच्चों में तनाव को समय पर पहचानना जरूरी
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कमी के बीच बच्चों में दिखाई देने वाले शुरुआती संकेतों को पहचानना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। बच्चे अगर अचानक ज्यादा चुप रहने लगें, अकेले रहना पसंद करें, उनकी नींद या भूख में बदलाव आए, पढ़ाई से दूरी बनाने लगें या लगातार परेशान और तनावग्रस्त नजर आएं तो इन संकेतों को केवल जिद या उम्र का असर मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
परिवार में बच्चों के साथ खुलकर बातचीत और उनकी परेशानी को समझने की कोशिश जरूरी है। जरूरत पड़ने पर काउंसलिंग और विशेषज्ञ की मदद लेने में देरी नहीं होनी चाहिए।
मोबाइल और पढ़ाई का दबाव, दोनों बन रहे चुनौती
बच्चों की मानसिक स्थिति पर पढ़ाई का दबाव एक तरफ असर डाल रहा है तो दूसरी तरफ मोबाइल और सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल ने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। कई बच्चे लंबे समय तक मोबाइल पर रहते हैं और धीरे-धीरे परिवार और आसपास के लोगों से संवाद कम करने लगते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों की समस्याओं का समाधान केवल उन्हें मोबाइल से दूर रखने या पढ़ाई का दबाव कम करने तक सीमित नहीं हो सकता। इसके लिए परिवार को बच्चे की भावनाओं को समझना होगा और उसके साथ संवाद का माहौल बनाना होगा।
आत्महत्या के मामले बढ़ा रहे चिंता
बच्चों और किशोरों में मानसिक दबाव के गंभीर परिणाम भी सामने आ रहे हैं। हाल में मोबाइल फोन से जुड़ी एक घटना में 11 वर्षीय बच्ची द्वारा आत्महत्या किए जाने का मामला सामने आया। ऐसे मामलों को केवल एक कारण से जोड़कर देखना उचित नहीं है, क्योंकि आत्महत्या के पीछे कई जटिल और व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं। हालांकि, ऐसी घटनाएं बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समय रहते हस्तक्षेप की जरूरत को जरूर रेखांकित करती हैं।
हर जिले में विशेषज्ञों की उपलब्धता जरूरी
हिमाचल के दूरदराज और जनजातीय क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए विशेषज्ञों की उपलब्धता सबसे जरूरी है। NHM के तहत प्रस्तावित 12 क्लिनिकल साइकियाट्रिस्ट और 42 क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट के पदों पर योग्य विशेषज्ञ नहीं मिलने की समस्या को दूर करना बड़ी चुनौती है।
हर साल पदों को भरने की प्रक्रिया आगे बढ़ाए जाने के बावजूद यदि योग्य विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं हो पाते हैं तो सरकार को ऐसी नीति पर काम करना होगा, जिससे विशेषज्ञ हिमाचल में सेवाएं देने के लिए आकर्षित हों। विशेष रूप से दूरदराज और जनजातीय क्षेत्रों में तैनाती के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन और बेहतर कार्य परिस्थितियां उपलब्ध करवाने की जरूरत है।
स्कूलों में काउंसलिंग व्यवस्था भी हो मजबूत
मानसिक स्वास्थ्य को केवल अस्पतालों तक सीमित रखने के बजाय स्कूल और कॉलेज स्तर तक ले जाने की जरूरत है। स्कूलों में नियमित काउंसलिंग, शिक्षकों को मानसिक स्वास्थ्य के शुरुआती संकेत पहचानने का प्रशिक्षण और अभिभावकों के लिए जागरूकता कार्यक्रम इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
बच्चों और युवाओं में बढ़ते मानसिक तनाव के बीच हिमाचल के लिए अब मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना जरूरी हो गया है। पद प्रस्तावित हैं, जरूरत भी बढ़ रही है, लेकिन योग्य विशेषज्ञों की कमी के कारण सेवाओं का विस्तार अटका हुआ है। ऐसे में विशेषज्ञों की उपलब्धता सुनिश्चित करना स्वास्थ्य विभाग के साथ-साथ पूरे समाज की प्राथमिकता बनना जरूरी है।



