सड़क पर दौड़ती गाड़ियाँ नहीं, दौड़ता अहंकार: जब एक ओवरटेक ने कानून को भी छोड़ दिया पीछे
HRTC वोल्वो चालक से मारपीट की घटना केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि बढ़ते असंयम, क्षणिक आक्रोश और कमजोर पड़ते कानून के डर का आईना है।

एक ओवरटेक, एक तकरार और फिर भीड़ का न्याय
कभी सड़कें लोगों को उनकी मंजिल तक पहुंचाती थीं। आज लगता है कि वे लोगों के भीतर छिपे आक्रोश, असहिष्णुता और अहंकार को भी खुली छूट देने लगी हैं।
एक मामूली ओवरटेक, कुछ तीखे शब्द, क्षण भर का गुस्सा—और फिर हाथ उठ जाते हैं। कानून, विवेक और मानवता सब पीछे छूट जाते हैं।
राजधानी में HRTC वोल्वो चालक के साथ हुई मारपीट की घटना भी शायद इसी मानसिकता की उपज है। यदि घटनाक्रम वैसा ही है जैसा सामने आ रहा है, तो प्रश्न केवल यह नहीं है कि किसने किसे मारा। बड़ा प्रश्न यह है कि हम ऐसे समाज में बदल क्यों रहे हैं जहाँ मतभेद का उत्तर संवाद नहीं, बल्कि हिंसा बनता जा रहा है।
एक बस चालक कोई राजनीतिक शक्ति नहीं होता, कोई उद्योगपति नहीं होता। वह दिन-रात सैकड़ों यात्रियों को सुरक्षित उनके गंतव्य तक पहुँचाने की जिम्मेदारी निभाने वाला कर्मी होता है। उसके साथ सड़क पर हुई मारपीट केवल एक कर्मचारी का अपमान नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का अपमान है जो सार्वजनिक सेवाओं के सहारे चलती है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि आज लोगों को अपने क्रोध पर उतना विश्वास नहीं जितना कानून पर अविश्वास है। यदि कानून का भय और न्याय व्यवस्था पर भरोसा मजबूत होता, तो शायद लोग अपने हाथों से न्याय करने की कोशिश न करते।
यह घटना हमें एक असहज प्रश्न पूछने पर मजबूर करती है—क्या हम असहमति को संभालने की क्षमता खोते जा रहे हैं?
सड़क पर हर दिन हजारों वाहन चलते हैं। ओवरटेक होते हैं, हॉर्न बजते हैं, कहासुनी भी होती है। लेकिन सभ्य समाज की पहचान यह नहीं कि विवाद नहीं होंगे; पहचान यह है कि विवादों का समाधान कैसे होगा।
यदि हर बहस का अंत मुक्कों और लातों से होगा, तो फिर कानून की किताबें केवल अलमारियों की शोभा बनकर रह जाएँगी।
प्रशासन और कानून-व्यवस्था के लिए भी यह घटना चेतावनी है। सड़क पर सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना केवल विभागीय जिम्मेदारी नहीं, बल्कि कानून के शासन की कसौटी भी है। यदि ऐसे मामलों में त्वरित और दृश्यमान कार्रवाई नहीं होती, तो समाज में यह संदेश जाता है कि क्षणिक गुस्से और भीड़ की ताकत कानून से बड़ी है।
सवाल एक चालक का नहीं है। सवाल उस मानसिकता का है जिसमें धैर्य को कमजोरी और आक्रामकता को शक्ति समझ लिया गया है।
आखिर हम किस दिशा में जा रहे हैं?
जहाँ स्टीयरिंग पर हाथ कम और अहंकार अधिक हावी है।
जहाँ सड़कों पर वाहन कम और क्रोध अधिक दौड़ रहा है।
और जहाँ कुछ लोग भूल चुके हैं कि एक क्षण का असंयम, जीवन भर की शर्म और पश्चाताप का कारण बन सकता है।
समाज को निर्णय करना होगा—हमें सड़कों पर यातायात चाहिए या अहंकार की परेड? क्योंकि जिस दिन कानून से अधिक क्रोध का शासन स्थापित हो गया, उस दिन कोई भी सुरक्षित नहीं बचेगा।



