सम्पादकीय

असर संपादकीय: पीढ़ियों के बीच बढ़ते फासले

रिटायर्ड मेजर जनरल एके शोरी की कलम से…

No Slide Found In Slider.

 

“फासले ऐसे भी होंगे, ये कभी सोचा न था, सामने बैठा था मेरे फिर भी वो मेरा न था”, ये प्रसिद्ध पाकिस्तानी गायक गुलाम अली द्वारा गाई एक ग़ज़ल के बोल हैं। हालाँकि इस ग़ज़ल के माध्यम से प्रेमी अपनी प्रेमिका को संबोधित कर रहा है, लेकिन अगर हम अपने समाज, अपने परिवारों, बच्चों और परिवार के वरिष्ठ लोगों को देखें, तो ये बोल आज के परिदृश्य में हमारे ऊपर फिट बैठते हैं। पीढ़ियों के बीच फासला हमेशा से रहा है और हमेशा रहेगा, लेकिन वर्तमान समय में यह फासला, अलगाव का स्तर, उपेक्षा की भावना चरम पर है। संयुक्त परिवारों के टूटने से इस अलगाव की शुरुआत हुई और तकनीक, इंटरनेट, मोबाइल, सोशल मीडिया, गूगल, फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि के आगमन ने तो सोने पर सुहागा का काम किया। टेक्नोलॉजी का विकास इतना तेज है कि बुजुर्गों की तो बात ही क्या, आज की पीढ़ी भी इसका सामना नहीं कर पा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि जैसे ही कोई इलेक्ट्रॉनिक गैजेट खरीदता है और दुकान से बाहर निकलता है तो वह पुराना मॉडल बन जाता है क्योंकि नया, नवीनतम, तेज और आक्रामक मॉडल लॉन्च होने के लिए तैयार होता है। इन परिस्थितियों में और इन समयों में हम बुजुर्गों से कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वे बदलते समय के साथ तालमेल बिठाएंगे और अपनी युवा पीढ़ी के साथ समान स्तर पर रहेंगे? संभावनाएँ दूर हैं लेकिन संभावनाएँ अभी भी हैं। टकराव नहीं है लेकिन सहयोग समय की मांग है, दूसरों को समझाना समय की मांग नहीं है बल्कि दूसरों को समझना समय की मांग है।
मुख्य समस्या यह है कि आजकल हर चीज़ तकनीक पर आधारित है। टिकट बुक करने के लिए, वित्तीय लेनदेन करने के लिए, बैंक से संबंधित कार्य करने के लिए, निवेश करने के लिए, यहां तक कि खुद का मनोरंजन करने के लिए, चीजें खरीदने के लिए, प्रियजनों के साथ संवाद करने के लिए ऐसे व् अन्य सैकड़ों काम गिनाए जा सकते हैं, जो तकनीक, इंटरनेट, नेटवर्किंग के बिना आसान नहीं है या हम कह सकते हैं कि कुछ तो संभव ही नहीं है। ऐसा हम अपने दैनिक जीवन में घटित होते हुए देख रहे हैं और समय के साथ यह बढ़ता ही जा रहा है। टच स्क्रीन मोबाइल्स ने चीजों को आसान बनाने के साथ-साथ टेक्नोलॉजी के उपयोग को भी बढ़ा दिया है। मजबूरियों के कारण बुजुर्गों को मोबाइल, इंटरनेट का इस्तेमाल करना पड़ता है और जब कोरोना आया तो यह और बढ़ गया। लेकिन मुद्दा केवल तकनीक का नहीं है, मुद्दा समय के साथ मुकाबला करने का है, समय के साथ आगे बढ़ने का है, नई चीजें सीखने का है, नई शब्दावली सीखने का है, दैनिक जीवन में शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और बौद्धिक रूप से सक्रिय रहने का है और दूसरी बात यह साबित करने की नहीं है कि कौन बेहतर जानता है या कौन कम जानता है, बल्कि तार्किक ढंग से बात करने का है।

No Slide Found In Slider.
No Slide Found In Slider.

घर के बुज़ुर्ग आमतौर पर ऐसा कहते हैं कि युवा लोग उनके साथ नहीं बैठते, सोशल मीडिया पर ज्यादा एक्टिव रहते हैं, उनके साथ बहुत सी बातें साझा नहीं करते, ये सच है लेकिन ऐसा क्यों है? मुख्य कारणों में से एक यह है कि अनजाने में और अधिकांश समय बड़े लोग छोटों को नैतिकता का पाठ पढ़ाते रहते हैं, भले ही वे स्वयं नैतिक न हों, ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं, भले ही वे स्वयं बेईमान हों, उचित व्यवहार का पाठ पढ़ाते रहते हैं हालांकि उनका अपने सहकर्मियों और उनके बड़ों के साथ व्यवहार अलग हो सकता है। एक और बहुत महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन विषयों पर युवा पीढ़ी को बात करने में रुचि हो सकती है, शायद वे विषय दोनों के बीच मौजूद ही नहीं हैं। विषय राजनीति से लेकर खेल, संगीत से लेकर अर्थशास्त्र और इसी तरह के अनेकों हो सकते हैं , लेकिन शायद पीढ़ियों के बीच कोई सांझे एजेंडा जैसी चीज़ नहीं है और कभी कोई चर्चा होती भी है तो वह स्वस्थ चर्चा न बनकर नैतिक व्याख्यान की ओर बढ़ जाती है। कौन बेहतर और अधिक जानता है वह विवाद का विषय बन जाता है। युवा बड़ों के साथ रहने के बजाय अन्य चीजों, लोगों, गतिविधियों में स्वयं को अधिक आरामदायक लेना शुरू कर देते हैं। इसी के साथ जुडी हुयी महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी विषय पर चर्चा करने के लिए अपडेट भी रहना पड़ता है, जिसे युवा पीढ़ी गूगल और चैट जीपीटी का सहारा लेकर बहुत आसानी से कर सकती है, लेकिन बुजुर्ग शायद सहज नहीं होंगे; इसलिए अंतर बढ़ जाता है।

ऐसा नहीं है कि दोष बड़ों पर है , वे बदलते रुझानों का सामना नहीं कर सकते, यह एक सच्चाई है लेकिन निश्चित रूप से वे बदलावों के साथ चलने की कोशिश कर सकते हैं। यह भी सच है कि तकनीकी रूप से आजकल के बच्चे बहुत बातें जानते हैं क्योंकि इंटरनेट/मोबाइल के माध्यम से सारी जानकारी उनकी हथेली में उपलब्ध होती है। जब टेक्नोलॉजी हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन गई है तो गैजेट्स का उपयोग करने के लिए उनकी समझ बहुत जरूरी है और इसके लिए युवाओं से सीखने में कभी झिझक नहीं होनी चाहिए। सोशल मीडिया बुजुर्गों के लिए खुद को सुधारने, अपने ज्ञान के स्तर को बढ़ाने और चीजों को सीखने के कई अवसर पैदा कर रहा है। आपस में बातचीत करने के लिए सामान्य विषयों की सीमा एक ऐसा मुद्दा है जो दूरियां बढ़ा रहा है। जानकारी युवा पीढ़ी के पास है, ज्ञान दोनों पीढ़ियों के पास है और बुद्धि बुजुर्गों के पास है, अब इनको एक-दूसरे का सहयोग करना है।

Deepika Sharma

Related Articles

Back to top button
Close