सम्पादकीय

असर संपादकीय: “देस परदेस”

रिटायर्ड मेजर जनरल एके शोरी की कलम से

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देस

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रिटायर्ड मेजर जनरल एके शोरी 

परदेस

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सत्तर के दशक में, देव आनंद द्वारा निर्मित एक हिंदी फिल्म आयी थी, जिसमें इंग्लैंड में रोजगार के लिए जाने वाले आप्रवासी भारतीयों से संबंधित मुद्दों पर प्रकाश डाला गया था। इस फिल्म का कथानक ग्रामीण भारत था और इसमें प्रवासी संबंधी समस्याएं, एजेंटों व् तस्करों की अनैतिक भूमिका को भी दर्शाया गया था। पचास से अधिक वर्ष बीत चुके हैं और समस्याएं जैसी की तैसे हैं। आज भी युवा लड़कों को एजेंटों द्वारा विदेशों में फुसला कर भेजा जाता है, इस आश्वासन के साथ कि वे विदेश में स्थायी हो जाएंगे और उनका गुणवत्तापूर्ण व् ऐश्वर्य से भरपूर जीवन होगा। लेकिन वास्तविकता उन सपनों की तुलना में बहुत अलग है जो लड़कों को दिखाए जाते हैं। हालांकि लोग इस छलावे के बारे में जानते भी थे, लेकिन अमेरिका द्वारा भारत से अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने के अभी के निर्णय और जंजीरों में बाँध कर लोगों को निष्कासित करने की घटना ने उन लोगों की आँखें खोलनी चाहिए जो अभी भी रेगिस्तान में मृग तृष्णा की तलाश में हैं। बेहतर भविष्य की तलाश करने के लिए विदेश जाने में कोई नुकसान नहीं है, लेकिन इसे कुछ योग्यता, मानदंड और उचित कानूनी तरीकों पर आधारित होना चाहिए। कोई समस्या नहीं है अगर कोई उज्ज्वल छात्र मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय या कॉलेज में उच्च अध्ययन करने के लिए विदेश जाता है और वहां बस जाता है। इस तरह के विद्यार्थी शैक्षिक ऋण भी लेते हैं और समय बीतने के साथ इस तरह के ऋणों का भुगतान करते हैं। समस्या मुख्य रूप से उन लोगों के साथ है जो अवैधता से एजेंटों को भारी मात्रा में भुगतान करते हैं, उनकी योग्यता भी किसी स्तर की नहीं होती और वे विदेश में भी संघर्ष करते हैं।
पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश में क्या हो रहा है कि स्कूल पास करने के बाद छात्रों ने विदेश जाने का सपना देखना शुरू किया, बजाय इसके वो यहां अपने देश में रह कर और पढ़ाई करके स्वंय अपने पैरों पर खड़े हो। इस प्रवृत्ति के पीछे कई कारण थे, जिसमें शिक्षा की उच्च लागत, नौकरी पाने की कम संभावना, सरकारी नौकरी की संख्या कम होना या हम कह सकते हैं कि बेरोजगारी बढ़ाना, जीवन जीने की उच्च लागत आदि। ILETS पास करवाने के लिए कोचिंग केंद्रों का खुलना, दूसरे देशों में अन्य एजेंटों के साथ सांठ गाँठ, वीजा प्रसंस्करण में भ्रष्टाचार, दो नंबर से डंकी रुट के ज़रिये विदेश भेजना आदि इतना फैल गया था जिसका एक दिन भांडा सरेआम फूटना ही था क्योंकि जो कुछ भी हो रहा था वो गलत और पूरी तरह से अवैध था। जैसा कि समाचारपत्रों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिआ में आ रहा है कि लोग विदेश जाने के लिए अपनी अवैध प्रविष्टि के लिए 30 से 40 लाख का भुगतान करते थे और अगर यह सच है, तो क्या जाने की आवश्यकता थी अगर किसी के पास नकद या भूमि के आकार में इतना पैसा था? इतने सारे पैसे के साथ कोई भी उच्च अध्ययन कर सकता था और अगर कोई अध्ययन में अच्छा नहीं था, तो आसानी से खेती या कृषि संबंधी गतिविधियों के साथ किसी अन्य पेशे को भी शुरू किया जा सकता था। यहां तक कि कुछ भी नहीं करने से भी बैंकों में निवेश करके ब्याज दर के रूप में एक उचित राशि तो हर माह मिल ही सकती थी। ऐसा लगता है कि ये लोग जो फंसे हुए थे, वास्तव में उनके मस्तिष्क धोए गए थे और उनको पता होना चाहिए था कि इतनी राशि वापस कमाने के लिए उन्हें दस से बीस वर्ष तो लग जाते क्योंकि विदेशों की आर्थिक स्थितियां, रहने की लागत और बढ़ती कीमतें जैसे समस्या वहां भी है।
इतनी बार हम समाचार पत्रों में पढ़ते हैं कि स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षकों की कमी है, तो ऐसे में छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे मिलेगी? एक औसत छात्र स्नातक स्तर की पढ़ाई करता है और या तो उच्च शिक्षा इतनी महंगी है वो कुछ कर नहीं सकता या और आगे पड़ने हेतु सक्षम नहीं है, तो वह क्या करेगा? वह किसी भी निजी संस्थान से कुछ तकनीकी कोर्स करेगा या किसी भी लिपिकीय नौकरी में जाने की कोशिश करेगा। प्राइवेट संस्थानों में और प्रशासन में कोई भी नौकरी पाना बहुत मुश्किल है और एक ‘लागत पर कोई भी पेशा करना भी आसान नहीं है। ऐसे में एक रास्ता जो बच्चों को दिखता है वे शॉपिंग मॉल, फैक्टरियों, बड़े संस्थानों में छोटी मोटी नौकरी कर लें, या फिर कूरियर कम्पनी में या जोमाटो या स्विग्गी आदि में डिलीवरी का काम करें। वे जो अर्जित करेंगे, वह इतना कम होगा जो उन्हें लंबे समय में बनाए नहीं रख सकता है और उनका कोई भविष्य नहीं है। जो लोग भूमिहीन हैं, उनके पास इस प्रकार का भविष्य है और जिन लोगों के पास भूमि है, वे कृषि नहीं करना चाहते हैं, जिसके लिए उच्च लागत, कम रिटर्न, मौसम की मार जैसी समस्याओं के साथ उनका स्वयं से खेती से दूर जाना भी है। इन प्रतिकूल परिस्थितियों में, वह विदेशी लालच, विदेशी मृग तृष्णा में फँस जाता है, वह विदेश जाने और वहां कैरियर की तलाश करने के लिए मन बना लेता है और एजेंटों के चक्कर लगाने लग पड़ता है। एजेंट भी तैयार हैं क्योंकि उनके पास देस और परदेस में संपर्क हैं, उनका धंधा है। अपना देस छोड़ने और परदेस जाने की यात्रा लोगों का मुख्य लक्ष्य बन जाता है, चाहे उसके लिए डंकी रुट ही क्यों न अपनाना पड़ जाय।
फिर क्या किया जाना चाहिए? जो एजेंट अवैध तरीके से हैं, वे भूमिगत हैं या खुले तौर पर इन चीजों को कर रहे हैं उन्हें क्यों अनुमति दी जाती है? वे क्या कर रहें है उसकी जाँच और सत्यापित क्यों नहीं की जा सकती? सरकारों की प्रमुख प्राथमिकता शिक्षा क्यों नहीं है? क्यों स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षकों के पद खाली रहते हैं? क्यों शिक्षा और इंडस्ट्री के साथ ताल मेल बना कर नहीं चला जाता? नई शिक्षा प्रणाली जो स्किल बेस्ड कोर्स की बात कर रही है, उसके अपनी चाल इतनी धीमी है कि एक और पीढ़ी निकल जायेगी। निगरानी और समीक्षा प्रणाली विफल हो गई है, पाठ्यक्रम पुराने हैं, उद्योग के साथ चलने कि आवश्यकता है जिससे पता चले वो किस तरह के पड़े लिखे युवा चाहते हैं। स्थिति निराशाजनक है, लेकिन इन अंधेरों में प्रकाश की किरण भी है। देश की प्राथमिकता को परिभाषित करने की आवश्यकता है, शिक्षकों की क्षमताओं और गुणों की समीक्षा की जानी चाहिए, तुष्टिकरण नीतियों से कुछ नहीं मिल सकता है। क्या ऐसा कुछ हो सकता है और कब हो सकता है? इसका उत्तर यह है कि यह न तो आसान है और न ही इससे जल्द परिणाम निकल कर आएंगे, लड़ाई कई मोर्चों पर लड़ने की आवश्यकता है।

Deepika Sharma

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