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बड़ी खबर: हिमाचल ब्लड बैंक की व्यवस्था बीमार

उमंग फाउंडेशन ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर इस मामले में तुरंत कदम उठाने की मांग

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शिमला, 3 फरवरी।

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हिमाचल प्रदेश में ब्लड बैंकिंग व्यवस्था गंभीर रूप से बीमार है। स्वास्थ्य विभाग खुद सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और संबंधित नियम-कानून की खुले आम धज्जियां उड़ा रहा है।

अफसरशाही की कोताही का नतीजा यह है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ब्लड बैंकिंग व्यवस्था चलाने के लिए स्वास्थ्य सचिव की अध्यक्षता में बनी राज्य ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल वर्षों से ठप्प पड़ी है। उसका पुनर्गठन नहीं हुआ है और 8 वर्ष से अधिक समय से उसकी कोई मीटिंग ही नहीं हुई। अव्यवस्था के कारण कई बड़े ब्लड बैंकों से आम रोगियों को समय पर आवश्यकता के अनुसार रक्त नहीं मिल पाता है। ऐसे में खून खरीदने- बेचने का खतरा पैदा हो गया है।

समाज सेवा एवं रक्तदान के क्षेत्र में अग्रणी संस्था उमंग फाउंडेशन के अध्यक्ष और वरिष्ठ रक्तदाता अजय श्रीवास्तव ने आज एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह खुलासा किया। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर इस मामले में तुरंत कदम उठाने की मांग की गई है क्योंकि यहां सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और कानून के खुलेआम उल्लंघन का मामला है।

अजय श्रीवास्तव के अनुसार कॉमन कॉज़ बनाम भारत सरकार (सीडब्ल्यूपी 91/1992) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 4 जनवरी 1996 को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। संपूर्ण ब्लड बैंकिंग व्यवस्था के संचालन एवं देखरेख के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर केंद्र में नेशनल ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल और हिमाचल प्रदेश सहित सभी राज्यों में राज्य ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल गठित की गई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में नेशनल एड्स कंट्रोल आर्गेनाइजेशन और राज्यों की एड्स कंट्रोल सोसायटी को रक्त सुरक्षा और एड्स के कामकाज तक ही सीमित कर दिया था।

हिमाचल में राज्य ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल शुरू से ही सिर्फ कागजों पर चलती रही। सरकार का स्वास्थ्य सचिव इसका अध्यक्ष होता है। हैरानी की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ब्लड बैंकिंग व्यवस्था का जिम्मा संभालने के लिए बनी यह काउंसिल अब दम तोड़ चुकी है। पिछले 8 वर्ष से अधिक समय से इसकी कोई मीटिंग ही नहीं हुई है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि राज्यों में स्टेट ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल ब्लड बैंकों से संबंधित समस्त योजनाओं, उनके संचालन और आवश्यकताओं की पूर्ति का कार्य करेगी। इसमें स्वयंसेवी संस्थाओं और रक्तदाताओं को मीडिया और कार्यक्रमों के माध्यम से जागरूक करने का कार्य भी शामिल है।
यह वैधानिक व्यवस्था ठप हो जाने से ब्लड बैंकों में डॉक्टर, नर्स, टेक्नीशियन, डाटा एंट्री ऑपरेटर, ड्राइवर, अन्य संसाधनों की कमी की ओर कोई ध्यान नहीं देता।

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स्टेट ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल की गैर मौजूदगी में इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज समेत सभी प्रमुख ब्लड बैंकों में स्टाफ और उपकरणों की काफी कमी है। इस कारण से केंद्र सरकार द्वारा 100% कॉम्पोनेंट बनाने और इस्तेमाल करने का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता। इससे हमेशा रक्त की कमी बनी रहती है। एक यूनिट रक्त से कम से कम तीन कंपोनेंट प्लाज्मा, प्लेटलेट और आरबीसी बनाकर तीन मरीजों को चढ़ाए जा सकते हैं।

प्रदेश के चार ब्लड बैंकों में कंपोनेंट सिपरेशन की मशीन है जिसका उचित इस्तेमाल नहीं किया जाता। प्रदेश में एफ्रेसिस (APHRESIS)
मशीन किसी भी ब्लड बैंक में उपलब्ध नहीं कराई गई है। इस मशीन से रक्तदाता का सिर्फ आवश्यक कॉम्पोनेंट दान में लिया जाता है और बाकी रक्त शरीर में फिर से चला जाता है। हम तौर पर रक्तदाता साल में चार बार खून दान कर सकते हैं। लेकिन यदि यह मशीन हो तो प्लेटलेट्स एक साल में 24 बार दान किया जा सकता है। इसी तरह अन्य कंपोनेंट भी बिना पूरा खून दान किए मशीन से निकल जा सकते हैं।
प्रदेश के ब्लड बैंकों में स्टोर किया संपूर्ण रक्त और लाल रक्त कण 35 दिन तक खराब नहीं होते। यदि खून का फ्रेश फ्रोजन प्लाजमा बना दिया जाए तो उसकी लाइफ एक वर्ष तक होती है। जबकि प्लेटलेट्स का जीवन 5 दिन का होता है।

राज्य में कल 24 ब्लड बैंक हैं जिसमें 20 सरकारी क्षेत्र में और चार गैर सरकारी क्षेत्र में चल रहे हैं। किस ब्लड बैंक में क्या-क्या दिक्कत आती हैं उन्हें समझने और हल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित की गई वैधानिक व्यवस्था अस्तित्व में नहीं है।

बीमार ब्लड बैंकिंग व्यवस्था से अस्पतालों में होने वाली रक्त की कमी का सबसे बड़ा खतरा प्रदेश में खून की खरीद फरोख्त का है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी खतरे को समाप्त करने के लिए 1996 में देश भर में एक व्यवस्था कायम की थी जो हिमाचल प्रदेश में समाप्त कर दी गई है। जब मरीज को खून खरीद कर चढ़ाया जाता है तो उसमें संक्रमित होने का खतरा बहुत ज्यादा होता है जिससे मरीज की जान जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार राज्य ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल का दफ्तर किसी बड़े चिकित्सा संस्थान में एक निदेशक के नेतृत्व में चलाया जाए। जबकि यहां इसका दफ्तर इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज से दूर खालिनी में किराए के भवन में है।
यही नहीं प्रदेश का स्वास्थ्य विभाग नेशनल ब्लड पॉलिसी, वॉलंटरी ब्लड डोनेशन प्रोग्राम और ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के अनेक प्रावधानों का उल्लंघन कर रहा है।

मुख्यमंत्री से मैंने मांग की है कि इस पूरे मामले पर तुरंत ध्यान दें और सुप्रीम कोर्ट तथा अन्य संबंधित कानूनो का पालन सुनिश्चित करें। ब्लड बैंकों में रक्त की कमी से तड़पने वाले मरीजों और उनके तीमारदारों को न्याय देने के लिए स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेवार अफसर के विरुद्ध कार्रवाई भी की जाए।

Deepika Sharma

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