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बड़ा सवाल : करोड़ों की हेल्थ परियोजनाओं के बीच लगभग 30 लाख की मशीन पर अटका कैंसर मरीजों का भविष्य

IGMC में बोन मैरो ट्रांसप्लांट सुविधा का सपना अधूरा, आखिर अफ़ेरेसिस  मशीन की खरीद में क्यों हो रही देरी?

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शिमला। हिमाचल प्रदेश में हर महीने ब्लड कैंसर के 30 से 40 नए मामले सामने आ रहे हैं। इनमें से बड़ी संख्या ऐसे मरीजों की होती है जिन्हें जीवन बचाने के लिए बोन मैरो ट्रांसप्लांट की आवश्यकता पड़ती है। इसके बावजूद प्रदेश में आज तक बोन मैरो ट्रांसप्लांट सुविधा शुरू नहीं हो पाई है। वजह केवल एक महत्वपूर्ण उपकरण — अफ़ेरेसिस () मशीन — की खरीद में लगातार हो रही देरी बताई जा रही है।

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स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट स्थापित करने के लिए अफ़ेरेसिस मशीन सबसे अहम कड़ी है। हैरानी की बात यह है कि लगभग 25 से 40 लाख रुपये की लागत वाली इस मशीन की खरीद का मामला लंबे समय से अटका हुआ है। यदि प्रदेश के सभी जरूरतमंद मरीजों को लाभ देना है तो कम से कम दो से तीन मशीनों की आवश्यकता होगी, लेकिन अब तक खरीद प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई है।

 

पिछले साल भी मिला था सुझाव, इस साल भी वही सवाल
जानकारों के अनुसार पिछले वर्ष आयोजित कैंसर एवं रक्त रोगों से जुड़े सेमिनार में देश के प्रसिद्ध हीमेटोलॉजिस्ट डॉ. पंकज मल्होत्रा ने स्पष्ट रूप से कहा था कि यदि मशीन उपलब्ध करवाई जाए तो हिमाचल में बोन मैरो ट्रांसप्लांट सुविधा शुरू करने की दिशा में तेजी से काम किया जा सकता है। एक वर्ष बीत जाने के बाद भी मशीन की खरीद नहीं हो पाई।और वह ख़ुद बोन मैरो transplant के लिए IGMC आएंगे

 

बताया जा रहा है कि इस वर्ष आयोजित सेमिनार में भी विशेषज्ञों ने यही मुद्दा उठाया और आश्चर्य जताया कि आखिर इतनी आवश्यक मशीन की खरीद में देरी क्यों हो रही है। सवाल उठ रहे हैं कि जब यह मशीन ब्लड कैंसर, थैलेसीमिया और कई गंभीर रक्त रोगों के उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है तो फिर इसकी खरीद प्रक्रिया बार-बार क्यों अटक रही है।

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मरीजों को पीजीआई और बड़े संस्थानों के चक्कर लगाने की मजबूरी
हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में गंभीर मरीजों को उपचार के लिए चंडीगढ़ स्थित पीजीआई तथा अन्य बड़े चिकित्सा संस्थानों का रुख करना पड़ता है। बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए वहां पहले से लंबी प्रतीक्षा सूची है। ऐसे में समय पर इलाज न मिलने से मरीजों की परेशानी और बढ़ जाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आईजीएमसी शिमला में बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट शुरू हो जाए तो न केवल हिमाचल के मरीजों को राहत मिलेगी बल्कि पीजीआई जैसे संस्थानों पर भी दबाव कम होगा। इससे उपचार में होने वाली देरी कम होगी और कई मरीजों को समय रहते जीवनरक्षक इलाज मिल सकेगा।

कैंसर मरीजों के लिए जीवनदायिनी सुविधा
चिकित्सकों के अनुसार बोन मैरो ट्रांसप्लांट ब्लड कैंसर के अनेक मामलों में सबसे प्रभावी और कई बार जीवनदायिनी उपचार पद्धति साबित होती है। इसके अलावा थैलेसीमिया जैसी गंभीर बीमारियों के उपचार में भी इसका महत्वपूर्ण उपयोग है।

स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ अब यह सवाल उठा रहे हैं कि जब प्रदेश में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, विशेषज्ञ उपलब्ध हैं और आवश्यकता स्पष्ट है, तब आखिर अफ़ेरेसिस मशीन की खरीद के लिए टेंडर प्रक्रिया को गति क्यों नहीं दी जा रही। क्या प्रशासनिक उदासीनता की कीमत गंभीर मरीजों को चुकानी पड़ रही है?

जवाब का इंतजार
कैंसर और रक्त रोगों से जूझ रहे हजारों मरीजों तथा उनके परिवारों की निगाहें अब सरकार और स्वास्थ्य विभाग पर टिकी हैं। सवाल सीधा है—जब अपेक्षाकृत कम लागत वाली मशीन से सैकड़ों मरीजों को जीवनदान मिल सकता है, तो इसकी खरीद में आखिर इतनी देरी क्यों? और कब तक हिमाचल के मरीजों को अपने ही राज्य में उपलब्ध हो सकने वाले इलाज के लिए दूसरे राज्यों की दौड़ लगानी पड़ेगी?

Deepika Sharma

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