सम्पादकीय

असर संपादकीय: “बीमारी से पहले गूगल पर भरोसा? स्वास्थ्य के लिए बन रहा बड़ा खतरा”

डॉ निधि शर्मा स्वतंत्र लेखिका की कलम से..

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“बीमारी से पहले गूगल पर भरोसा? स्वास्थ्य के लिए बन रहा बड़ा खतरा”

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हमारे समाज में यह ट्रेंड है कि किसी व्यक्ति को बीमारी होने के शुरूआती दौर में डाक्टर से ज्यादा इंटरनेट पर दी जाने वाले सुझाव को ज्यादा तवज्जो दी जाती है। वो सलाह कभी-कभी गंभीर बीमारी का रूप ले लेती है। ऐसे भ्रम पूर्ण स्वास्थ्य मुद्दों पर चर्चा करना आज बहुत जरूरी हो गया है। ऐसे वैश्विक स्वास्थ्य से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए हर वर्ष 7 अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष 2026 की थीम है स्वास्थ्य के लिए विज्ञान के साथ खड़े होना, यह केवल एक विचार नहीं बल्कि आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। सबसे बड़ा कारण यह है कि हम सब केवल वायरस और बीमारियों से ही नहीं, बल्कि गलत जानकारी की खतरनाक महामारी से भी जूझ रहे हैं।

 

आज का डिजिटल युग सूचना का युग है लेकिन विडंबना यह है कि यही युग भ्रम का भी युग बन गया है। स्वास्थ्य मिथ्या सूचना वह अदृश्य खतरा है जो बिना किसी चेतावनी के समाज में फैलता है और लोगों के जीवन को प्रभावित करता है। यह गलत या अधूरी जानकारी लोगों को ऐसे निर्णय लेने पर मजबूर कर देती है, जो उनके स्वास्थ्य के लिए घातक हो सकती है। हाल के वर्षों में इसके कई चौंकाने वाले उदाहरण सामने आए हैं। गौर करने वाली बात ये है कि स्वास्थ्य संबंधित भ्रम अविकसित और विकासशील देशों तक ही सीमित नहीं बल्कि विकसित देश भी इससे अछूते नहीं हैं हाल में ही इंग्लैंड में खसरा के मामलों में बढ़ोतरी का एक बड़ा कारण टीकाकरण के खिलाफ फैली अफवाहें थीं। कई अभिभावकों ने सोशल मीडिया पर पढ़ी गलत बातों के कारण अपने बच्चों को टीका नहीं लगवाया, जिसका परिणाम संक्रमण के रूप में सामने आया है। इसी तरह ऑस्ट्रेलिया में सुपर-के नाम का फ्लू के दौरान यह देखा गया कि जिन लोगों ने वैक्सीन नहीं लगवाई, उनमें गंभीर संक्रमण का खतरा अधिक था-और इसके पीछे भी गलत जानकारी की बड़ी भूमिका थी। वहीं अफ्रीका के कुछ देशों में पोलियो टीकाकरण अभियान भी व्हाट्सएप पर फैली अफवाहों के कारण प्रभावित हुआ – यह दर्शाता है कि मिथ्या सूचना केवल भ्रम नहीं बल्कि जीवन के लिए सीधा खतरा है। हमारे देश भारत में अभी भी कोविड-19 वैक्सीन को लेकर भ्रामक दावे और साजिश सिद्धांत फैलते रहे। वैक्सीन से ऑटिज्म होता है जैसे पुराने मिथक एक बार फिर सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जबकि वैज्ञानिक शोध इसे बार-बार खारिज कर चुके हैं। जनवरी 2026 में पश्चिम बंगाल में निपाह वायरस के दो मामलों की पुष्टि के बाद, सोशल मीडिया पर घबराहट फैलाने वाली गलत जानकारी साझा की गई। विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारत सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा और जानकारी दी गई कि स्थिति नियंत्रण में है और घबराने की जरूरत नहीं है। हद तो तब हुए जब हाल ही में गूगल एआई ओवरव्यू ने कुछ मामलों में गलत मेडिकल जानकारी दी, जिसके बाद चिंताएं व्यक्त की गई और कुछ हेल्थ ओवरव्यू हटाए गए। हालांकि ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए दुनिया भर में सरकारों द्वारा कदम उठाए गए हैं। भारत सरकार द्वारा भी भ्रामक स्वास्थ्य विज्ञापनों और दावों से निपटने के लिए सरकार ने आयुष सुरक्षा पोर्टल लॉन्च किया है।

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विशेषज्ञों ने इस स्थिति को इन्फोडेमिक नाम दिया है-एक ऐसी महामारी, जिसमें जानकारी का अतिरेक और गलत सूचना का प्रसार लोगों को भ्रमित कर देता है। यह स्थिति और भी खतरनाक इसलिए है क्योंकि इसमें सच और झूठ के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाता है। स्वास्थ्य मिथ्या सूचना के पीछे कई कारण हैं। डिजिटल साक्षरता की कमी के कारण लोग यह नहीं समझ पाते कि कौन-सी जानकारी विश्वसनीय है। सनसनीखेज और भावनात्मक कंटेंट तेजी से वायरल होता है, जिससे गलत जानकारी और भी तेजी से फैलती है। इसके अलावा, कुछ लोग जानबूझकर अफवाहें फैलाते हैं, जिससे समाज में डर और अविश्वास पैदा होता है। जबकि सोशल मीडिया एल्गोरिदम स्वास्थ्य संबंधी गलत सूचना के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

 

मीडिया और पत्रकारिता की भूमिका भी इस लड़ाई में बेहद अहम है। जिम्मेदार पत्रकारिता न केवल सही जानकारी देती है बल्कि गलत सूचनाओं का पर्दाफाश भी करती है। मीडिया को चाहिए कि वह तथ्य जांच को अपनी प्राथमिकता बनाए और समाज को जागरूक करने में सक्रिय भूमिका निभाए। लेकिन यह लड़ाई केवल सरकार या मीडिया की नहीं है-यह हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है। आज हर व्यक्ति एक सूचना वाहक है। इसलिए यह जरूरी है कि हम किसी भी जानकारी को साझा करने से पहले उसकी सच्चाई की जांच करें। सोचें, समझें, फिर शेयर करें.. यह आदत हमें अपनानी होगी।

 

ऐसे समय में स्टेंड विद साइंस का संदेश एक मार्गदर्शक की तरह है। इसका अर्थ है-तथ्यों पर विश्वास करना, विशेषज्ञों की सलाह को प्राथमिकता देना और वैज्ञानिक प्रमाणों को अपनाना। स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए केवल प्रमाणित स्रोतों जैसे डॉक्टर, सरकारी संस्थान और विश्वसनीय संगठनों पर भरोसा करना ही सुरक्षित विकल्प है। सबसे जरूरी है कि स्वास्थ्य के लिए इकट्ठे होना यानि कि सामूहिक जिम्मेदारी और सहयोग। जब हम सभी मिलकर वैज्ञानिक सोच को अपनाते हैं और गलत जानकारी के खिलाफ खड़े होते हैं, तभी हम एक स्वस्थ और जागरूक समाज का निर्माण कर सकते हैं। क्योंकि आज के समय में सबसे बड़ी दवा केवल दवाई नहीं, बल्कि सही जानकारी है और सबसे बड़ा बचाव, विज्ञान पर विश्वास है।

Deepika Sharma

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