पीएम फसल बीमा योजना की राष्ट्रीय समीक्षा बैठक में हिमाचल के पर्वतीय बागवानों के हितों को लेकर निदेशक विनय सिंह ने रखे अहम सुझाव

पीएम फसल बीमा योजना की राष्ट्रीय समीक्षा बैठक में हिमाचल के पर्वतीय बागवानों के हितों को लेकर निदेशक विनय सिंह ने रखे अहम सुझाव

बेंगलुरु। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के अंतर्गत 18–19 जनवरी को बेंगलुरु में दो दिवसीय नेशनल रिव्यू कॉन्फ्रेंस (NRC) का आयोजन किया गया। इस राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन में देशभर से आए वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, विभिन्न बीमा कंपनियों के उच्च अधिकारी तथा हिमाचल प्रदेश बागवानी विभाग के निदेशक श्री विनय सिंह (IAS) ने भाग लिया।
सम्मेलन के दौरान आयोजित विचार-विमर्श में श्री विनय सिंह ने हिमाचल प्रदेश में क्रियान्वित मौसम आधारित फसल बीमा योजना (RWBCIS) को अधिक किसान-हितैषी बनाने हेतु महत्वपूर्ण नीतिगत सुझाव प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश की पर्वतीय बागवानी, विशेषकर सेब आधारित कृषि, उच्च निवेश, दीर्घ अवधि तथा अत्यधिक जलवायु-संवेदनशील प्रकृति की है। ऐसे में मैदानी राज्यों के लिए विकसित समान जोखिम मॉडल हिमालयी परिस्थितियों में प्रभावी सिद्ध नहीं हो पाते।

उन्होंने इस बात पर बल दिया कि बीमा व्यवस्था को केवल मौसम विचलन तक सीमित न रखकर वास्तविक उत्पादन हानि से जोड़ा जाना आवश्यक है। प्रतिकूल वर्षों में सेब उत्पादन की संभावित क्षमता और वास्तविक उत्पादन के बीच बड़ा अंतर देखने को मिलता है, जिसके कारण बागवानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
श्री विनय सिंह ने बताया कि ओलावृष्टि, पाला तथा बादल फटना जैसी घटनाएं पर्वतीय क्षेत्रों में अत्यंत स्थानीय एवं तीव्र होती हैं। इन जोखिमों के सटीक आकलन के लिए सूक्ष्म-स्तरीय मौसम सूचकांक तथा सघन स्वचालित मौसम केंद्र (AWS) नेटवर्क की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि ओलावृष्टि को केवल “ऐड-ऑन जोखिम” के रूप में न मानकर मुख्य जोखिम के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए तथा पाले से होने वाले नुकसान को भी बीमा में प्रमुख घटक बनाया जाना चाहिए।
जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि फसल कैलेंडर में हो रहे परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए बीमा कवरेज अवधि को स्थिर न रखकर फसल की अवस्थाओं (फिनोलॉजी) से जोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सेब के बाग केवल मौसमी फसल नहीं, बल्कि दीर्घकालिक पूंजीगत परिसंपत्ति हैं; इसलिए पेड़ों को होने वाली स्थायी क्षति को भी बीमा दायरे में शामिल किया जाना आवश्यक है।
उन्होंने उच्च घनत्व बागानों के लिए पृथक बीमा उत्पाद विकसित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि पारंपरिक एवं उच्च घनत्व बागानों पर समान प्रीमियम एवं दावा सीमा लागू करने से प्रणालीगत अंडर-इंश्योरेंस की समस्या उत्पन्न होती है। मंच पर यह भी कहा गया कि बेसिस रिस्क किसानों के योजना से दूर रहने का एक प्रमुख कारण है, जिसे कम करने के लिए अधिक मौसम केंद्र, पर्वतीय परिस्थितियों के अनुरूप लचीले मानक तथा रिमोट सेंसिंग तकनीक का प्रभावी उपयोग आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि पिछले लगभग 15 वर्षों से बदलते मौसम के कारण सेब उत्पादक क्षेत्रों में पर्याप्त बर्फबारी नहीं हो पा रही है, जिससे शीत ऋतु में आवश्यक ठंड (चिलिंग आवर) कम हो रही है। सेब की रॉयल किस्म को अच्छे फूल एवं फलन के लिए 7 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान पर 1200 से 1600 घंटे की आवश्यकता होती है। चिलिंग आवर की कमी से उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है; ऐसे में बीमा पेआउट को वर्तमान ₹265 से बढ़ाया जाना आवश्यक है।
समय पर दावा भुगतान को जोखिम प्रबंधन का मूल उद्देश्य बताते हुए उन्होंने कहा कि विलंबित भुगतान योजना की प्रभावशीलता को कमजोर करता है। छोटे एवं खंडित खेतों वाले बागवानों के लिए एफपीओ के माध्यम से क्लस्टर-आधारित बीमा नामांकन से लागत में कमी आएगी तथा नुकसान आकलन की सटीकता बढ़ेगी। पर्वतीय राज्यों के लिए अतिरिक्त प्रीमियम सहायता एवं नीतिगत लचीलापन दिए बिना किसानों की भागीदारी बढ़ाना कठिन होगा।
उन्होंने जानकारी दी कि इस वर्ष हिमाचल प्रदेश में लगभग 62,000 बागवानों ने RWBCIS के अंतर्गत फसल बीमा कराया है। हालांकि ओलावृष्टि के लिए उपलब्ध ऐड-ऑन विकल्प पर अपेक्षित सहभागिता नहीं मिल पाई, जबकि बागवान से मात्र ₹23 प्रति पेड़ प्रीमियम लेकर नुकसान की स्थिति में ₹450 प्रति पेड़ तक क्षतिपूर्ति का प्रावधान है। इस कम सहभागिता के कारणों को समझने के लिए बागवानों से प्रत्यक्ष सुझाव लिए जाएंगे तथा बागवानों को नुकसान की स्थिति में उचित लाभ सुनिश्चित करने का विषय हिमाचल प्रदेश सरकार के माध्यम से भारत सरकार के समक्ष प्रमुखता से उठाया जाएगा।
अंत में निदेशक, बागवानी विभाग ने प्रदेश के सभी बागवानों से अपील की कि वर्तमान में आड़ू, प्लम, अनार एवं संतरा फसलों के लिए फसल बीमा कराने की अवधि 14 फरवरी से 29 फरवरी तक निर्धारित है। सभी पात्र बागवान समय रहते फसल बीमा योजना के अंतर्गत अपना बीमा करवाकर संभावित प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान से स्वयं को सुरक्षित करें।
इस अवसर पर भारत सरकार ने हिमाचल प्रदेश में बीमा योजना के अंतर्गत सहभागिता में वर्ष-दर-वर्ष हो रही कमी पर चिंता व्यक्त की तथा अधिक से अधिक बागवानों को योजना से जोड़ने के लिए हिमाचल प्रदेश सरकार एवं कृषि तथा बागवानी विभाग से निरंतर एवं ठोस प्रयास करने का आग्रह किया।




