सम्पादकीयस्वास्थ्य

IGMC शिमला: व्यवस्था अहंकार में, पेशा आक्रोश में और दोनों की कीमत चुकाता आम मरीज

न्याय की जल्दबाज़ी और विरोध की ज़िद में पिसते मरीज़

No Slide Found In Slider.

हिमाचल के सबसे बड़े अस्पताल इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (IGMC) में हुआ प्रकरण एक व्यक्ति की गलती से आगे बढ़कर संस्थागत विफलता बन गया। डॉक्टर–मरीज के बीच हिंसा निंदनीय है—यह चिकित्सकीय आचार के विरुद्ध है। लेकिन सरकार द्वारा बिना समयबद्ध, निष्पक्ष जांच के सीधे बर्खास्तगी भी नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों को कमजोर करती है।

WhatsApp Image 2026-05-07 at 3.50.10 PM
WhatsApp Image 2026-05-07 at 3.50.21 PM
WhatsApp Image 2026-05-14 at 5.38.45 PM

डॉक्टरों का विरोध समझा जा सकता है, पर हड़ताल से सेवाओं का ठप होना जनहित के विरुद्ध है। स्वास्थ्य सेवा कोई साधारण श्रम नहीं—यह जीवन-रक्षा की जिम्मेदारी है। राज्य को चाहिए कि वह तेज़ पारदर्शी जांच के मॉडल को अपनाए, वहीं चिकित्सक समुदाय को भी विरोध के लोकतांत्रिक, गैर-हड़ताली विकल्प चुनने होंगे।

यह विवाद सिखाता है कि न्याय दिखना भी चाहिए और होना भी—और दोनों के बीच संवाद ही पुल बन सकता है।

शिमला का इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (IGMC) किसी एक डॉक्टर या एक मरीज की पहचान नहीं है—यह हिमाचल की सार्वजनिक स्वास्थ्य आत्मा है।
लेकिन हालिया विवाद ने यह साफ कर दिया कि जब सत्ता को त्वरित लोकप्रियता चाहिए, पेशा सम्मान की लड़ाई में अड़ जाता है और संवाद शून्य हो जाता है, तब सबसे पहले कुचला जाता है — मरीज

चिकित्सा पेशा समाज में सर्वोच्च विश्वास का प्रतीक माना जाता है। मरीज अपनी देह और जीवन डॉक्टर के हाथों सौंपता है।
ऐसे में किसी भी परिस्थिति में मरीज के साथ शारीरिक हिंसा चिकित्सकीय आचार संहिता, मानवीय मूल्यों और पेशेवर मर्यादा—तीनों का उल्लंघन है।

यदि चिकित्सक को उकसाया गया, अपमानित किया गया या धमकी मिली, तो उसके लिए संस्थागत और कानूनी रास्ते उपलब्ध हैं। प्रतिघात उस विश्वास को तोड़ देता है, जिस पर पूरा स्वास्थ्य तंत्र खड़ा है।

राज्य सरकार ने वायरल वीडियो और जनाक्रोश के बीच त्वरित निर्णय लेते हुए संबंधित डॉक्टर को बर्खास्त कर दिया।
यह कदम पहली दृष्टि में जनहित में सख्त संदेश देता है, लेकिन यहीं से विवाद गहराता है।

WhatsApp Image 2026-05-18 at 5.53.59 PM
WhatsApp Image 2026-05-18 at 5.53.59 PM (1)

डॉक्टरों का यह कहना कि एकतरफा कार्रवाई से उनका आत्मसम्मान आहत हुआ, पूरी तरह असंगत नहीं है।
लेकिन इसके विरोध में अनिश्चितकालीन हड़ताल, OPD बंद और नियमित सर्जरी स्थगित होना — एक गंभीर नैतिक संकट पैदा करता है।

असली पीड़ित: मरीज और उनका भरोसा

ग्राउंड रिपोर्ट: अस्पताल के बाहर की हकीकत

सुबह 9 बजे IGMC के OPD ब्लॉक के बाहर दर्जनों मरीज लाइन में खड़े दिखे।
कई को यह तक स्पष्ट नहीं था कि डॉक्टर उपलब्ध होंगे या नहीं।

राम लाल (65), ठियोग से आए:

“दो दिन का सफर, किराया, खाना — सब खर्च हो गया।
आज कहा गया डॉक्टर हड़ताल पर हैं।”

सुमन देवी (गर्भवती):

“प्राइवेट अस्पताल का खर्च नहीं उठा सकते।
सरकारी अस्पताल ही आख़िरी सहारा है।”

इस पूरे प्रकरण में न सरकार पूरी तरह जीतती दिख रही है, न चिकित्सक समुदाय।
हार रहा है तो वह आम नागरिक, जिसका भरोसा अस्पताल और व्यवस्था दोनों से डगमगा रहा है।

जब व्यवस्था आपस में लड़ती है, तो जनता अकेली रह जाती है

IGMC जैसे संस्थान केवल इमारत नहीं, बल्कि राज्य के लाखों लोगों की आखिरी उम्मीद हैं।
जब वही संस्थान विवादों में घिर जाए, तो सामाजिक असंतोष और अविश्वास स्वाभाविक है।

अंततः IGMC शिमला का यह संकट किसी एक डॉक्टर, एक मरीज या एक आदेश तक सीमित नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है, जहाँ सत्ता जल्दबाज़ी में फैसले सुनाती है, पेशेवर आक्रोश में सेवाएं रोक देते हैं और दोनों के बीच आम नागरिक चुपचाप पीसता रहता है। सार्वजनिक अस्पताल किसी के अहंकार का अखाड़ा नहीं, बल्कि जनता की जीवन-रेखा हैं। अब ज़रूरत है टकराव नहीं, जवाबदेही की; सख्ती नहीं, संवेदनशीलता की; और आरोप नहीं, समाधान की। क्योंकि अगर इलाज भी संघर्ष का हथियार बन गया, तो हार किसी एक पक्ष की नहीं—पूरे समाज की होगी।

Deepika Sharma

Related Articles

Back to top button
Close