सम्पादकीय

असर विशेष: सामाजिक भागीदारी से खत्म होगा एड्स

डॉ. निधि शर्मा (स्वतंत्र लेखिका) की कलम से

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​​डॉ. निधि शर्मा

(स्वतंत्र लेखिका)

एड्स बीमारी का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में कई प्रकार की भ्रांतियाँ आने लग जाती है । आज इन्हीं भ्रांतियों के कारण यह बीमारी पैर पसार रही है । हर साल 1 दिसंबर वर्ष 1988 से विश्व एड्स दिवस के तौर पर मनाया जाता है । इस वर्ष की थीम संयुक्त राष्ट्र के एड्स कार्यक्रम के तहत समुदायों का नेतृत्व करने दें रखी गई है । क्योंकि समाज में जागरूकता की कमी से फैल रही किसी भी प्रकार की बीमारी को सामुदायिक भागीदारी से ही मिटाया जा सकता है । क्योंकि वर्ल्ड एड्स डे का स्लोगन भी वैश्विक एकजुटता और सांझा जिम्मेदारी है । विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक वर्ष 2022 तक विश्व में 39 लाख लोग एचआईवी से पीड़ित है जिसमें 37.5 लाख व्यतक और 1.5 लाख 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे हैं । हालांकि 1981 से अब तक 25 लाख से अधिक लोग एड्स के कारण मर भी चुके हैं । दुर्भाग्य वंश 2019 से फैले कोविड और वैश्विक स्तर पर हो रहे कई प्रकार के संघर्षों के कारण संयुक्त राष्ट्र की वर्ष 2022 की रिपोर्ट के अनुसार एड्स के परीक्षण पीड़ित लोगों की देखभाल और जागरूकता में असमानता के कारण पिछले कुछ वर्षों में मामले बढ़े हैं जो चिंता का विषय है । लेकिन भारत के लिए सुखद बात यह है कि एड्स नियंत्रण सोसाईटी के चल रहे पाँचवें चरण के मुताबिक देश में एड्स में 48 प्रतिशत कमी और मृत्यु दर 82 प्रतिशत कम हुई है । इन उपरोक्त आंकड़ों की भयावह स्थिति सचेत करती है कि इस बीमारी के प्रति समाज के विभिन्न वर्गों को सरकार के साथ जागरूकता कार्यक्रम में शामिल होना होगा क्योंकि इसका संबंध किसी विशेष धर्म व जाति से नहीं बल्कि मानवता से है ।

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हालांकि अभी तक इस बीमारी के फैलाव का कारण संक्रमित खून, असुरक्षित यौन संबंध एवं प्रभावित व्यक्ति के किसी प्रकार के तरल प्रदार्थ के संपर्क में आने से होता है लेकिन अभी भी ये बीमारी लाइलाज बनी हुई है । बेशक एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी से इसे नियंत्रित किया जा सकता है । सुखद बात यह भी है कि कुछ एचआईवी रोगमुक्ति के मामले प्रकाश में आए हैं जिसमें सबसे पहला मामला बर्लिन का रोगी टिमोथी रे ब्राउन था जिसने रक्त कैंसर के इलाज के लिए करवाए दो स्टेम सेल प्रत्यारोपण से कैंसर के साथ-साथ एचआईवी से भी ठीक हो गया । वहीं दूसरा मामला लंदन का रोगी एडम कौस्टिलजो था जिसे भी स्टेम सेल प्रत्यारोपण द्वारा ही इस भयानक बीमारी से मुक्ति मिली । ये कुछ मामले इस लाइलाज बीमारी को इलाजपूर्ण बनाने की ओर अग्रसर करते हुए प्रतीत तो होते हैं लेकिन रास्ता बहुत लंबा है । क्योंकि भारत में एड्स से संबंधित मामले उन राज्यों में सबसे ज्यादा है जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश आदि जहाँ शिक्षा का स्तर कम है और वहाँ के लोग दूसरे राज्यों में रोज़गार के लिए ज्यादा तादात में जाते हैं । शिक्षा की कमी के कारण ये एड्स के कारणों के नज़दीक आसानी से पहुँच जाते हैं । इसके साथ-साथ एक जगह टिक कर न रहने के कारण एंटी ऐट्रोवायरल थेरेपी का कोर्स भी पूरा नहीं कर पाते । हालांकि एक चिंतनीय बात यह है कि पंजाब जैसे राज्यों में एवं इसके पड़ोसी राज्यों जहाँ नशा युवाओं में बढ़ रहा है वहाँ एक-दूसरे की संक्रमित सुई के प्रयोग से एड्स चुपचाप पैर पसार रहा है । ऐसे कई सामाजिक जमीनी कारण जिसे सामुदायिक भागीदारी व उनकी समझ से एड्स को फैलने से रोका जा सकता है । एक अन्य वैज्ञानिक सफलता के तहत भारत सरकार के फूड एवं ड्रग्स प्रशासन के द्वारा अभी हाल में ही हाई रिस्क एड्स फैलाव वाले क्षेत्रों में एचआईवी नेगटिव लोगों में लंबे समय तक बचाव करने वाली इंजेक्शन रूपी दवाओं का सफल ट्रायल शुरू किया है ।

अभी तक एड्स एक सामाजिक लाइलाज बीमारी है । जिसे सरकार व समाज दोनों के सहयोग से ही यूनाइटेड नेशन के मुताबिक 2030 तक इसके प्रसार को रोका जा सकता है । क्योंकि ज़मीनी स्तर पर एचआईवी के परीक्षण को बढ़ावा देना एवं इसके रोकथाम की जिम्मेदारी तो सरकार ही कर सकती है लेकिन एड्स से बचाव संबंधित सूचना, एचआवी पीड़ित लोगों की देखभाल में आने वाली बाधाओं और असमानता को दूर करने की जिम्मेदारी तो सामुदायिक संगठनों के साथ-साथ आम शिक्षित जनता तो ले ही सकती है

Deepika Sharma

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