सम्पादकीय

असर संपादकीय ; हास्य : व्यंग्य हैेप्पी सासू डे

मदन गुप्ता सपाटू की कलम से..

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– यूं तो हमारे देश में हर दिन नया होता है और आदमी किसी न किसी उपलक्ष्य में बिजी रहता है। आज एकादशी का व्रत तो कुछ  दिन बाद पूर्णमासी पर कथा। बेचारा हलवाई अभी तीज के त्योहार से बेला नहीं हो पाता कि भईया दूज, करवा चौथ या दीवाली उसके हाथों में खौंचा थमा ही रखते हैं। खैर ! ये तो परंपरागत उत्सव हैं जिनकी तिथियां आदि ज्योतिषीय गणनाओं पर आधारित रहती हैं । ऐसा नहीं कि जब चाहो तब त्योहार मना लो और जो दिल में आए, कर लो। होली पूर्णमासी पर ही आएगी और दीवाली अमावस पर ही पड़ेगी। तीज तृतीया पर आएगी तो करवा चौथ , चतुर्थी पर ही आएगा। ये बात अलग है कि लोग बाग , कई त्योहार , उसके कई दिनों बाद इतवार को मनाने लगते हैं और हो ये जाता है कि होली के दिन दिवाली मना ली जाती है।

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अब संत वेलेंटाइन ने 14 फरवरी को प्रेम दिवस ही घोषित करवा डाला । बस उसके बाद क्या था! अंग्रेजों ने ‘डेओं’ की झड़ी ही लगा दी। हमारा रक्षाबंधन, भईया दूज तो पीछे रह गए, फादर्स डे, मदर्स डे, सिस्टर डे, ब्रदर डे की लंबी फहरिस्त जारी कर डाली। यहां तक  कि बेबी डे, चिल्डर्न डे, ग्रांड पेरेंट्स डे, सिबलिंग डे, स्टेप फैमिली डे तक का प्रोविजन रख डाला। और तो और , 30 जुलाई को ‘फादर – इन – ला ’ डे  यानी कानूनी बाप दिवस डिक्लेयर कर दिया। यही नहीं 12 अगस्त का दिन मिडल चाईल्ड डे के लिए फिक्स कर दिया कि मंझला भाई कहीं नाराज न हो जाए। किसी को नहीं छोड़ा।

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बस एक को नहीं छुआ । और वह है भारत के परिवारों की खास प्रजाति – सास। हालांकि बड़ा मन मार के अंग्रेजों ने मदर -इन -ला डे , अक्तूबर के चौथे इतवार को फिक्स कर दिया है। पर क्या आपने कभी लोगांे को बड़े प्यार से यह कहते सुना – हेैप्पी सासू डे जी! उल्टे कशमीर से कन्या कुमारी तक, राजस्थान से बर्मा बार्डर तक सास – बहू के लड़ाई के किस्से ही सुने होंगे। यह भी एक शोध का विषय है कि इनमें 36 का आंकड़ा क्यों रहता है? इस आग में मुंबईया फिल्मों ने घी डालने का काम किया है। हर बहू को सास मंे ललिता पवार या शशिकला ही नजर आने लगी। एक दिन बहू का सौ दिन सास के, सास भी कभी बहू थी जैसी फिल्में दिखा दिखा कर अच्छी भली  सासों को खलनायिका बना डाला। रही सही कसर कभी न खत्म होने वाले अनगिनत टी.वी सीरियलों ने कर दी । कोई सास या बहू सीज फायर करना भी चाहे, तो किसी न किसी सीरियल से तलवारें खींचने का मसाला मिल ही जाता है। ऐसे धारावाहिक पाकिस्तान मंे और भी मशहूर हैं।

कई घरों में एक कहावत मशहूर कर दी गई-

‘सास वही होती है जो करती है दिन भर आराम,

बेटे के आते ही करने लगती है घर का काम’

   बस! तिकोना मुकाबला चालू। अब दहेज, खाना बनाना न बनाना वगैरा वगैरा लड़ाई के मुददे् नहीं रहे। अब मोबाइल, रिमोट, किटट्ी पार्टियां, क्लब,  नौकरियां , ब्यूटी पार्लर आदि क्लेश के लेटेस्ट मुदद्े हो गए हैं। बहू भी  भी माडर्न और सास उससे भी ज्यादा एडवांस। देखने वाले कभी कभी छोटी बहन ही मान लेते हैं। आपस में कट थ्रोट कंपीटिशन। फैशन शो में दोनों आगे। दोनों  किसी से कम नहीं।

हमारा तो सुझाव है कि सभी सासुओं एक हो जाओ और सरकार से हैप्पी सासू डे डिक्लेयर करवा के इसे राष्ट्र्ीय अवकाश घोषित करवा दिया जाए।

 पंजाब में ऐसे डे मनाने का रिवाज प्रचलित नहीं है क्यों कि अभी गभरु कनाडा जाने की जुगाड़ में हैं ओेेैर बापू खेत -खूत बेच कर उन्हें विदेश में फिट करने की फिराक में हैं या आन्दोलनों में व्यस्त हैं। जो यहां हैं वो पंजाबी गानों की  मैन्युफैक्चंिरंग मं बिजी हैं। वरना वो दिन दूर नहीं जब पंजाब में बैसाखी के बाद हैप्पी बापू डे,  हैप्पी बेबे डे , हैप्पी फुफ्फड़ डे, हैप्पी बुढ़ा- बुढ़ी डे, हैप्पी जीजा जी डे मनाए जाएंगे।

संपर्क- मदन गुप्ता सपाटू, मो- 98156-19620

– 458 सैक्टर 10, पंचकूला।

 

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Deepika Sharma

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