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असर विशेष: ज्ञान गंगा “राम राज्य — योद्धा श्रीराम”भाग : 7 

रिटायर्ड मेजर जनरल एके शौरी की कलम से....

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राम राज्य — योद्धा श्रीराम 

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रिटायर्ड मेजर जनरल एके शौरी 

हम सभी श्रीराम को एक कुशल व निपुण धनुर्धारी के रूप में पहचानते भी है और ऐसा मानते भी हैं। धनुर विद्या में उनको अपने पिता दशरथ के समान ही कुशलता प्राप्त थी। ज्ञात रहे कि राजा दशरथ तो शब्द भेद विद्या में इतने कुशल थे कि घनघोर रात के अँधेरे में भी एक हल्की सी आवाज़ सुन कर वे अचूक व सीधा निशाना लगा सकते थे।

उनके हाथों श्रवण की मृत्यु ऐसे शब्दभेदी बाण चलाने से ही हुई थी, लेकिन श्रीराम को धनुष विद्या के साथ अनेकों अन्य अस्त्रों व शस्त्रों में अत्यंत कुशलता प्राप्त थी, अनेकों मिसाईलों को चलाने हेतु उन पर पूर्णतया प्रभाव था। ऐसी गहन विद्या की उन्होंने कैसे, कब व किस से शिक्षा ली, इन सब का वाल्मीकि ने रामायण में विस्तार से उल्लेख किया हुआ है। इस के इलावा एक योद्धा में कुछ और भी विशेषताएं होती हैं, क्योंकि एक शूरवीर से आशा की जाती है कि वह अस्त्र-शस्त्र के साथ-साथ शास्त्रों में बताई नीति का भी सदैव पालन करे। आईए, इन सब को जानने का यत्न करते हैं। 

हम इस बात से तो अच्छी तरह से परिचित हैं कि ऋषि विश्वामित्र ने राजा दशरथ से आग्रह किया था कि वे अपने दोनों बेटों, श्रीराम व लक्ष्मण को उनके साथ वन में भेज दें क्योंकि वहां अनेकों असुर उनको परेशान किया करते थे। उनका मानना था कि श्रीराम व लक्ष्मण में ऐसी योग्यता है कि वे उन सभी दानवों का संहार कर सकें। राजा दशरथ का मन तो नहीं था लेकिन वशिष्ठ मुनि के कहने पर वे दोनों को वन भेजने के लिए मान गए ।

वन में पहुँचने के पश्चात, ऋषि विश्वामित्र ने सर्वप्रथम दोनों को बल व अतिबल नामक मन्त्रों का जाप करवाया जिससे उनमें एक प्रकार से आत्मिक बल व मन में एक दृढ़ता आए। बल व अतिबल मन्त्र मन में एक ऐसा विश्वास उत्पन्न कर देते हैं जिससे किसी प्रकार का भी मानसिक भय हो, समाप्त हो जाता है तथा स्मरण शक्ति भी अधिक हो जाती है। इनको ब्रह्मा के मन्त्र भी कहा जाता है। श्रीराम ने सर्वप्रथम ताड़का नामक राक्षसी का वध किया, हालांकि एक बार तो उन्होंने उसको मारने से इनकार कर दिया था क्योंकि उनको लगा कि एक स्त्री पर शस्त्र उठाना धर्म अनुसार नहीं है।

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लेकिन जब ऋषि विश्वामित्र ने उनको ताड़का के असली रूप व कर्मों के बारे में बताया तो श्रीराम ऐसा विचार कर के उसका वध करने के लिए तैयार हो गए क्योंकि उनको उस के असुरी रूप व आचरण के बारे में पता चल गया। यह एक विचारवीन व सुलझे योद्धा की विशषता है। 

तत्पश्चात ऋषि विश्वामित्र ने श्रीराम व लक्ष्मण को अनेकों मिसाईल तथा शस्त्रों की शिक्षा दी जिनसे राक्षसों, नागों व दानवों को समाप्त किया जा सके। शायद ऋषि विश्वामित्र को इस बात का आभास था कि भविष्य में श्रीराम को कैसे चौदह वर्ष वनों में रहना होगा और उनका कैसे कैसे राक्षसों से पाला पड़ेगा। इन सब का उल्लेख बालकाण्ड के २७वे, सर्ग के २- २१वे व अन्य श्लोकों में किया गया है। ऋषि विश्वामित्र ने सर्वप्रथम श्रीराम व लक्ष्मण को दंड चक्र, धर्म चक्र, काल चक्र व विष्णु चक्र नामक मिसाईल के बारे में जानकारी दी और फिर शिवा की मिसाईल जिसे ब्रह्मास्त्र के नाम से भी जाना जाता है, उन्हें प्रदान की। उसके बाद उनको शिवा और विष्णु के भाले, नंदन नामक तलवार और एक गदा दी। इसके पश्चात उन्होंने मोहना, स्वप्ना, सामना, वासना, शोषण, सान्त्वना विलापना इत्यादि अनेकों मिसाईल को उनको ग्रहण करवाया जिनकी असीम शक्ति से श्रीराम अत्यंत शक्तिशाली हो गए। इन मिसाईलों में ऐसी ताकत थी कि सामने वाले की आँखों से निरंतर अश्रु बहते रहें, उसके स्नायु तंत्र को निष्क्रिय कर के उसे एकदम से नाकारा बना दें, आसमान से बारिश करवा दे, वातावरण की नमी को सोख ले, चहुँ और असहनीय ऊष्मा फैला दें।

 

ऋषि ने श्रीराम को ऐसी मिसाईल के बारे में भी ज्ञान प्रदान किया जिसका इस्तेमाल करने से सामने वाला एकदम से भौचक्का सा हो कर रह जाए और दिन में भी रात जैसा अन्धेरा हो जाए। उन्होंने ऐसी सभी मिसाईलों को चलाने हेतु जितने भी मन्त्र थे, उन के बारे में श्रीराम को विस्तार से बताया। श्रीराम ने सभी की विशेषताओं को बहुत ही ध्यानपूर्वक सुना और सभी मन्त्रों को मन लगा कर कंठस्त किया। सबसे अंत में ऋषि विश्वामित्र ने श्रीराम व लक्ष्मण को सभी मिसाईलों को चलाने के बाद उनको वापिस बुलाने के रहस्य के बारे में भी समझाया। इस प्रकार ऋषि विश्वामित्र से अस्त्र-शस्त्र का पूर्णतया ज्ञान अर्जित कर श्रीराम एक कुशल योद्धा बन गए।

Deepika Sharma

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