
कांग्रेस पार्टी ने देश की स्वतंत्रता की दिशा निश्चित की । वैचारिक मतभेदों के चलते टूटती गई । फिर भी देश को स्वतंत्र करवाने में सफ़ल हुई और एक सशक्त लोकतन्त्र की स्थापना की । देश ने दिन दुगनी रात चौगुनी तरक्की की । भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में विफल रही और देश में “ऐसा ही चलता है” वाला ट्रेंड स्थापित होने लगा । महंगाई बढ़ने लगी । स्वास्थ्य के क्षेत्र में आर्थिक आधार पर एक बड़ी विषमता चर्म पर पहुंच गई । शिक्षा उत्तम स्तर पर नहीं पहुंच पाई समाज के कुछ वर्गों तक सिमट गई, (यह आकलन सरकारी प्राथमिक शिक्षा के संस्थानों की स्थिति पर आधारित है) । इन सब उपेक्षित विषयों पर ध्यान न दे पाने के फलस्वरूप जनता ने विकल्प तलाशने शुरू किए पर दुर्भाग्यवश सत्ता इन मुद्दों पर बदली तो ज़रूर पर इन्हें नियंत्रित नहीं कर पाई बल्कि ये समस्याएं और गम्भीर हो गई । अब इन मुद्दों पर बोलना या सरकार से प्रश्न पूछना राष्ट्रद्रोह का पर्याय बन गया और देश का लोकतन्त्र धार्मिक अशिष्टता का अखाड़ा बन गया । राजनीती और सत्ता बचाए रखना देश की अखंडता एवम संप्रभुता से अधिक महत्वपूर्ण बन गया । विचार नष्ट हो गए और प्राथमिकताएं कठोर।

