असर विशेष: ख़बरदार : हिमाचल में बढ़ रहा सोशल मीडिया ट्रायल का चलन, कहीं घातक न बन जाय
क्या सोशल मीडिया ट्रायल और चरित्र हनन पर प्रशासन करेगा सख्ती, उठ रहे कई सवाल

क्षेत्रीय अस्पताल कुल्लू में एक गर्भवती महिला की दुखद मृत्यु के मामले में चिकित्सकीय लापरवाही के आरोपों की जांच अभी जारी है। ऐसे में सोशल मीडिया पर संबंधित डॉक्टर की फोटो सार्वजनिक कर उनके लिए अत्यंत अपमानजनक और आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग करते हुए पोस्ट वायरल की जा रही हैं। यह घटनाक्रम कई गंभीर कानूनी और नैतिक प्रश्न खड़े कर रहा है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब तक किसी व्यक्ति का दोष कानूनन सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक उसकी पहचान इस तरह सार्वजनिक करना कितना उचित है? देश का कानून प्रत्येक व्यक्ति को निष्पक्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया का अधिकार देता है। केवल आरोप लग जाने मात्र से किसी को दोषी नहीं माना जा सकता।
गौरतलब है कि जब पुलिस किसी कथित आरोपी को गिरफ्तार करती है, तब भी कई मामलों में उसकी पहचान की सुरक्षा का ध्यान रखा जाता है। मीडिया के सामने पेश करते समय अक्सर चेहरे को कपड़े या अन्य माध्यम से ढक दिया जाता है, ताकि जांच पूरी होने और न्यायालय के निर्णय से पहले उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को अनावश्यक क्षति न पहुंचे।
हिमाचल साइबर अपराध सेल एडिशनल एसपी दुष्यंत सरपाल ने असर न्यूज़ से बातचीत में कहा की सोशल मीडिया एक सार्वजनिक पटल है लेकिन यदि कोई व्यक्ति विशेष सार्वजनिक पटल पर अपना नाम धूमल करने की शिकायत करता है तो उक्त व्यक्ति विशेष कोर्ट के मध्यम से इस पर कार्रवाई करवा सकता है
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि अन्य मामलों में यह संवेदनशीलता बरती जाती है, तो डॉक्टरों या अन्य पेशेवरों के मामलों में सोशल मीडिया पर खुलेआम फोटो और अपमानजनक टिप्पणियां वायरल होने पर रोक क्यों नहीं लग पा रही है?
चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि डॉक्टरों का पेशा पहले से ही अत्यधिक मानसिक दबाव, लंबे कार्य घंटे और कठिन परिस्थितियों से जुड़ा होता है। यदि किसी चिकित्सक से लापरवाही हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन जांच पूरी होने से पहले सोशल मीडिया पर किसी डॉक्टर का सार्वजनिक ‘ट्रायल’ करना न केवल उसकी व्यक्तिगत और पेशेवर प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि पूरे चिकित्सा समुदाय का मनोबल भी प्रभावित करता है।
हिमाचल प्रदेश मेडिकल ऑफिसर एसोसिएशन ने भी इस पर आपत्ति ज़ाहिर की है
कानूनी जानकारों का मानना है कि किसी व्यक्ति के विरुद्ध अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना, उसकी छवि धूमिल करने के उद्देश्य से सामग्री प्रसारित करना या बिना पुष्टि के उसे दोषी की तरह प्रस्तुत करना परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न कानूनी प्रावधानों के दायरे में आ सकता है। यदि ऐसी पोस्ट किसी की प्रतिष्ठा को गंभीर क्षति पहुंचाती हैं, तो संबंधित व्यक्ति कानूनी उपाय भी अपना सकता है।
हिमाचल में ये अब ये अक्सर देखा जा रहा है की बाद में दोष सिद्ध नहीं होगा और संबंधित कथित आरोपी को जाँच से पहले सोशल मीडिया पर अपमान जनक भाषा का प्रयोग करके फोटो वायरल कर दी जाती है
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक और बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या हिमाचल प्रदेश में सोशल मीडिया पर किसी भी कथित आरोपी की फोटो और व्यक्तिगत जानकारी वायरल करने का एक खतरनाक चलन बनता जा रहा है? यदि ऐसा है तो इसे रोकने के लिए संबंधित प्रशासन, पुलिस और साइबर सेल क्या ठोस कदम उठा रहे हैं? क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश या कार्रवाई की जाएगी?
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति को जांच पूरी होने से पहले दोषी घोषित कर देना उसके मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। ऐसी परिस्थितियों में कोई व्यक्ति सामाजिक बहिष्कार, अवसाद या अन्य गंभीर मानसिक दबाव का शिकार हो सकता है। इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ जिम्मेदारी और कानून की मर्यादा का पालन भी उतना ही आवश्यक है।इस मामले की जांच अभी जारी है और किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जांच पूरी होने तथा सक्षम प्राधिकारी के निर्णय के बाद ही उचित होगा। पत्रकारिता और सोशल मीडिया—दोनों की जिम्मेदारी है कि तथ्यों पर आधारित जानकारी ही प्रसारित करें और किसी भी व्यक्ति की गरिमा तथा कानून द्वारा प्रदत्त अधिकारों का सम्मान करें।




