ASAR EXCLUSIVE : स्वास्थ्य दावों की खुली पोल: ठप्प किडनी ट्रांस्प्लांट के बीच, 17 हजार में डायलिसिस के लिए ज़रूरी फिस्टुला लगवाने पर मजबूर मरीज़
हिमाचल मे ट्रांसप्लांट ठप, फिस्टुला के लिए भी भटकते मरीज; 40 वर्षीय राजकुमार की हालत ने खोली स्वास्थ्य तंत्र की पोल

शिमला: हिमाचल प्रदेश में गंभीर बीमारियों के इलाज को लेकर किए जा रहे बड़े-बड़े दावों के बीच जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक है। नेपाल मूल के 40 वर्षीय राजकुमार, जिनकी दोनों किडनियां खराब हो चुकी हैं, इन दिनों शिमला के अस्पतालों में जीवन की जंग लड़ रहे हैं। राजकुमार का जन्म भी शिमला में हुआ है और वह जुनगा के भडेच गांव का रहने वाला है होली के दिन भी वह इसी उधेड़बुन में था की यदि जल्द ही फ़िस्टूला का इतज़ाम नहीं हुआ तो न डायलेसिस होगा और उसके शरीर में इन्फेक्शन फैल जाएगा
लेकिन उनका मामला केवल एक व्यक्ति की बीमारी नहीं, बल्कि प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोर नसों को उजागर करता है।
राजकुमार का उपचार फिलहाल शिमला के सरकारी अस्पतालों में चल रहा है, परंतु किडनी ट्रांसप्लांट की व्यवस्था राज्य में प्रभावी रूप से उपलब्ध नहीं है। पहले Indira Gandhi Medical College and Hospital में ट्रांसप्लांट की सुविधा होने का दावा किया जाता था, कुछ ऑपरेशन हुए भी लेकिन वर्तमान में यह प्रक्रिया ठप पड़ी है। ऐसे में मरीजों को या तो पीजीआई में लंबी प्रतीक्षा सूची का सामना करना पड़ता है या फिर मजबूरन प्रदेश से बाहर निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है।
Postgraduate Institute of Medical Education and Research (पीजीआई) जैसे संस्थानों में पहले से ही लंबी वेटिंग है। ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के सामने विकल्प सीमित हो जाते हैं।
सवाल तो ये खड़े हो रहे है कि सरकार इलाज में नए से नये कदम जोड़ने का काम कर रही है लेकिन जो सुविधाए पहले से शुरू हुईं है आख़िर उसे गंभीरता से चलाने पर क्यों काम नहीं किया जा रहा । ये क्या सिर्फ़ कागजो में दिखावे के लिए किया जा रहा है
डायलिसिस भी आसान नहीं, “फिस्टुला” के लिए भी संघर्ष
किडनी फेल होने की स्थिति में डायलिसिस जीवनरेखा होता है। लेकिन डायलिसिस से पहले लगाए जाने वाले फिस्टुला जैसी अहम प्रक्रिया भी मरीजों के लिए आसान नहीं है।राजकुमार इसे लगवाने के लिये रोज़ आईजीएमसी के चक्कर काट रहा है
फिस्टुला वह सर्जिकल तकनीक है जिसमें हाथ की नस और धमनी को जोड़कर स्थायी रक्त प्रवाह मार्ग बनाया जाता है, ताकि डायलिसिस सुरक्षित और संक्रमण मुक्त हो सके।अब वह बोल रहा है की उसे अब मज़बूरी में निजी अस्पताल में जाना पड़ेगा और उधर फ़िस्टुला लगाने की क़ीमत सत्रह हज़ार है
हैरानी की बात यह है कि:
प्रदेश में इस प्रक्रिया को करने वाले विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या बेहद सीमित है।
कई बार मरीजों को बार-बार अस्पतालों के चक्कर काटने पड़ते हैं।
निजी अस्पतालों में यही प्रक्रिया न्यूनतम 17 हजार रुपये में की जा रही है, जो एक दिहाड़ी मजदूर या गरीब परिवार के लिए बड़ी रकम है।
जब बुनियादी जीवनरक्षक प्रक्रिया तक सुगमता से उपलब्ध न हो, तो गंभीर बीमारियों के उपचार संबंधी दावे कितने वास्तविक हैं—यह प्रश्न स्वतः खड़ा होता है।
दावों और वास्तविकता के बीच खाई
प्रदेश सरकार समय-समय पर स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ीकरण की घोषणाएं करती रही है। लेकिन अगर:
किडनी ट्रांसप्लांट जैसी गंभीर सर्जरी नियमित रूप से उपलब्ध न हो,
डायलिसिस से जुड़ी अहम प्रक्रिया के लिए पर्याप्त विशेषज्ञ न हों,
मरीजों को प्रदेश से बाहर महंगे निजी अस्पतालों में जाना पड़े,
तो यह स्पष्ट संकेत है कि व्यवस्था में गंभीर संरचनात्मक कमी है।
राजकुमार जैसे मरीजों के सामने केवल बीमारी नहीं, बल्कि आर्थिक विनाश और अनिश्चित भविष्य का खतरा भी खड़ा है।
सरकार से सीधा सवाल
क्या हिमाचल प्रदेश में किडनी ट्रांसप्लांट सुविधा को स्थायी और नियमित रूप से शुरू करने की कोई समयबद्ध योजना है?
क्या डायलिसिस और फिस्टुला जैसी प्रक्रियाओं के लिए पर्याप्त विशेषज्ञ नियुक्त किए जाएंगे?
क्या गरीब मरीजों के लिए वास्तविक आर्थिक सुरक्षा तंत्र मौजूद है या केवल कागजी योजनाएं?
राजकुमार का मामला एक चेतावनी है। यदि अब भी स्वास्थ्य तंत्र की खामियों को दूर करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ना तय है।



