IGMC शिमला विवाद: डॉक्टर–मरीज हिंसा से हड़ताल तक
प्रशासनिक सख्ती, चिकित्सकीय असंतोष और मरीजों की पीड़ा — एक निष्पक्ष व समग्र आकलन

लेखक: Asar Media House Desk
श्रेणी: स्वास्थ्य नीति | सामाजिक सरोकार | राज्य प्रशासन
स्थान: शिमला, हिमाचल प्रदेश
IGMC शिमला में डॉक्टर–मरीज हिंसा के बाद सरकार का कड़ा फैसला, हड़ताल से ठप स्वास्थ्य सेवाएं — सबसे बड़ा संकट मरीजों पर बर्खास्तगी के विरोध में चिकित्सकों की हड़ताल, प्रशासन बनाम डॉक्टर आमने-सामने — नैतिकता, न्याय और जनहित के बीच फंसा हिमाचल का सबसे बड़ा अस्पताल
हिमाचल प्रदेश के सबसे बड़े रेफरल अस्पताल इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (IGMC), शिमला में चिकित्सक और मरीज के बीच हुई हिंसक झड़प ने पूरे राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
एक ओर सरकार द्वारा लिया गया त्वरित और कठोर निर्णय, तो दूसरी ओर चिकित्सकों की अनिश्चितकालीन हड़ताल — इस टकराव में सबसे अधिक प्रभावित वे मरीज हैं, जिनके लिए IGMC जीवन रेखा है।
क्या हुआ, कैसे हुआ?
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IGMC शिमला के एक वार्ड में वरिष्ठ रेजिडेंट डॉक्टर और मरीज के बीच विवाद हुआ, जो देखते ही देखते हिंसा में बदल गया।
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घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिससे जनआक्रोश फैला।
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हिमाचल प्रदेश सरकार ने मामले में त्वरित संज्ञान लेते हुए संबंधित डॉक्टर को सेवा से बर्खास्त कर दिया और जांच के आदेश दिए।
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इस निर्णय के विरोध में रेजिडेंट डॉक्टरों और अन्य चिकित्सकों ने इसे एकतरफा कार्रवाई बताते हुए अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू कर दी।
हड़ताल का असर: मरीज सबसे बड़ा पीड़ित
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OPD सेवाएं बंद
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नियमित सर्जरी स्थगित
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पहाड़ी और दूरदराज़ इलाकों से आए मरीजों को भारी परेशानी
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बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और गंभीर रोगी सबसे ज्यादा प्रभावित
हालांकि आपात सेवाएं चालू रखने का दावा किया गया, लेकिन जमीनी हकीकत में इलाज की निरंतरता टूटती दिखी।
नैतिक और कानूनी दृष्टि से आकलन
🔹 क्या चिकित्सक का व्यवहार उचित था?
नहीं।
चिकित्सकीय पेशा उच्च नैतिक मानकों पर आधारित है। किसी भी परिस्थिति में मरीज पर शारीरिक हमला चिकित्सा आचार संहिता का उल्लंघन है। डॉक्टर को स्वयं को संयमित रखते हुए प्रशासनिक या कानूनी मार्ग अपनाना चाहिए था।
🔹 क्या सरकार की कार्रवाई न्यायसंगत थी?
आंशिक रूप से।
सरकार का त्वरित एक्शन जनभावना को संतुष्ट करता है, लेकिन:
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बिना पूर्ण जांच बर्खास्तगी
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डॉक्टर का पक्ष सुने बिना अंतिम फैसला
यह प्रक्रिया नैसर्गिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों पर सवाल खड़े करती है।
चिकित्सकों की हड़ताल: अधिकार या अति?
डॉक्टरों को विरोध का अधिकार है, लेकिन:
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हड़ताल से मरीजों का इलाज रुकना
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जीवनरक्षक सेवाओं पर अप्रत्यक्ष असर
यह सामाजिक नैतिकता के विपरीत है।
स्वास्थ्य सेवा सामान्य श्रम नहीं, बल्कि लोकसेवा का अनिवार्य स्तंभ है।
क्या बेहतर रास्ता संभव था?
हाँ। यदि निम्न कदम उठाए जाते:
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तत्काल निलंबन तथा समयबद्ध निष्पक्ष जांच न के सीधे सेवा से बर्खास्तगी
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डॉक्टर, मरीज पक्ष और प्रशासन के बीच मध्यस्थता
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अस्पतालों में सुरक्षा और शिकायत निवारण तंत्र मज़बूत करना
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सोशल मीडिया ट्रायल से पहले संस्थागत प्रक्रिया पर भरोसा
तो शायद मामला यहाँ तक न पहुँचता।
प्रशासन, डॉक्टर और समाज के लिए सबक
सरकार के लिए
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निर्णय में जल्दबाजी नहीं, पारदर्शिता ज़रूरी
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जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए
चिकित्सकों के लिए
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पेशेवर संयम सर्वोपरि
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हड़ताल के बजाय वैकल्पिक लोकतांत्रिक विरोध
समाज और मीडिया के लिए
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वायरल वीडियो से पहले सच्चाई की जांच
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भावनात्मक नहीं, विवेकपूर्ण प्रतिक्रिया
निष्कर्ष
IGMC शिमला का यह प्रकरण केवल एक झगड़ा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था, प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया और सामाजिक धैर्य की परीक्षा है।
जब डॉक्टर, सरकार और मरीज आमने-सामने खड़े हो जाते हैं, तब सबसे ज्यादा चोट विश्वास को लगती है।
अब आवश्यकता है —
संवाद, संतुलन और संवेदनशील निर्णयों की,
ताकि भविष्य में कोई मरीज इलाज के अभाव में और कोई डॉक्टर भीड़ के गुस्से में न फँसे।



