सम्पादकीय

असर सम्पादकीय “विकास या विनाश”

रिटायर्ड मेजर जनरल एके शोरी की क़लम से

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विकास या विनाश

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भूकंप, सुनामी, अचानक ही बाढ़ का आना, बादलों का अचानक से फट जाना, सड़कों का धस जाना, भूस्खलन, ये और कुछ ऐसी ही विपदाओं के नाम हमारे लिए नई शब्दावली नहीं हैं लेकिन इनका होना आजकल इतना अधिक हो गया है क़ि एक प्रश्न अनायास ही हमारे मन में आ जाता है क़ि हम विकास कर रहे हैं अथवा विनाश की ओर अग्रसर हो रहे हैं? जैसे ही बारिश का मौसम शुरू होता है, लोग खुशी महसूस करने के बजाय वास्तव में चिंतित हो रहे हैं। ऐसा नहीं है कि ये प्राकृतिक आपदाएँ मानसून के दौरान हो रही हैं, प्रकृति अपने रोष को जब चाहे दिखा रही है और ऐसा बार बार रहा है और कब हो जाए, इसका भी पता नहीं लग रहा। हालांकि हिमाचल को देव भूमि के रूप में संबोधित किया जाता है, लेकिन ऐसा लग रहा है जैसे दानवों का प्रभाव अधिक हो गया है, और ये दानव कोई पाताल में नहीं रह रहे हैं,बल्कि इसी धरती पर मानव का भेष बना कर रह रहे है। ग्लोबल वार्मिंग एक कारण है जो मुख्य रूप से अप्रत्याशित मौसम परिवर्तनों के लिए जिम्मेदार है, लेकिन साथ ही साथ कई अन्य कारण भी हैं जो इन चीजों को प्रभावित करते हैं। जो कुछ भी हो रहा है, इन आपदाओं की जिम्मेदारी केवल मनुष्यों पर है, उनकी संकीर्ण सोच, स्वार्थी हित, खराब योजना, दीर्घकालिक दृष्टि की कमी, बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार आदि।

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पिछले महीने से अधिकतम आपदाएं हिमाचल और उत्तरांचल में हुई है। ऐसा नहीं है कि अन्य राज्यों में बाढ़ नहीं आयी है, लेकिन इन दोनों राज्यों में अधिकतम क्षति हुई है। ये पहाड़ी राज्य विकास के नाम पर बहुत सारी चीजों का शिकार हो रहे थे और यह उन परिणामों को दिखा रहा है जो भविष्य में बदतर हो सकते हैं। सड़कों के चौड़ीकरण के नाम पर, चार लेन राजमार्गों का निर्माण किया गया है, फ्लाई ओवर का निर्माण किया गया है, ब्लास्ट करके सुरंगों का निर्माण किया गया, पहाड़ियों को छील दिया गया, विस्फोट किए गए है और ऐसे सभी पेड़ों को काटने के बाद किया गया जिसके फलस्वरूप पहाड़ों पर दबाव इतना बढ़ गया कि बारिश होते ही वे अपने स्थान से खिसकने शुरू हो गए। यह सुनिश्चित करने के लिए कि पर्यटक आधे घंटे या एक घंटे पहले हिल स्टेशनों तक पहुंच जाएँ, विनाशकारी कदम उठाए गए हैं। क्या यह विकास है? सब कुछ जल्दी में होने के लिए, गंतव्य स्थान तक पहुंचने के लिए , जल्दी करो जल्दी करो, क्यों? यदि लोग नए हाईवे बनने के बाद थोड़ा जल्दी भी पहुंचते हैं, तो क्या यह उनकी अतिरिक्त उपलब्धि होगी? इसमें कोई संदेह नहीं है कि अच्छी गुणवत्ता, चौड़ी और चिकनी सड़कों की आवश्यकता होती है ताकि ट्रैफ़िक जल्दी और तेजी से आगे बढ़े, लेकिन क्या इसके लिए पेड़ों का काटना, सुरंग बनाना और भूस्खलन का जोखिम लेना एकमात्र समाधान है? क्या सड़कों को ही थोड़ा सा और चौड़ा नहीं किया जा सकता है ? हिमाचल और उत्तरांचल में जो पेड़ काट दिए गए हैं, क्या उनके बदले पेड़ लगाए गए है? नहीं, क्योंकि नए पेड़ लगाने की जगह भी नहीं छोड़ी और अगर लगाये भी जाए तो उनको बड़ा होने में बीस तीस वर्ष लगेंगे, तो ऐसे में मिट्टी के कटाव को कैसे बचाया जाएगा? हिमाचल में राजमार्गों पर जिस प्रकार का निर्माण चल रहा है, इसने हेरिटेज रेल ट्रैक के लिए भी खतरा पैदा कर दिया है।
यह केवल राजमार्गों से संबंधित मुद्दा नहीं है, पेड़ों की भारी कटाई की वज़ह से ही अचानक बादल फटने लग गए हैं और वह भी अक्सर और नए स्थानों पर। पहाड़ी क्षेत्रों में जहां मिट्टी नाजुक होती है, भूमि को समतल किया जाता है और फिर कंक्रीट की इमारतों का निर्माण किया जाता है और वह भी बहु -मंजिला। शिमला में, मॉल रोड में और उसके आसपास, पर्यटकों के लिए पार्किंग सुविधा के साथ इस तरह से कई होटलों का निर्माण किया गया है, अब अगर कोई भूकंप आ जाय, तो परिणाम क्या होंगे? कई मल्टी स्टोरी पार्किंग भी हैं जो एक आपदा की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यह शिमला की अनन्य कहानी नहीं है, यह पहाड़ी पर्यटन स्थलों में लगभग हर जगह है। सुरंगों में होने वाली तबाही जो कि यात्रा समय को कम करने के लिए है जो आराम से अधिक नुकसान ला रही है। क्या सुरंगों का बनाना वास्तव में आवश्यक है? यदि हाँ, तो उन ब्रिटिशों से सीखें जिन्होंने पर्यावरण, जलवायु आदि को नुकसान पहुंचाए बिना शिमला-कालका रेल मार्ग पर 103 सुरंगों का निर्माण किया। मल्टी स्टोरी बस स्टैंड भी भूमि द्रव्यमान पर एक बड़ा दबाव है। अन्य राज्यों के हर छोटे से शहर से बस क्यों आये? बड़ी और लंबी बसें क्यों होनी चाहिए, केवल 30-40 सीटर बसों को क्यों नहीं रखा जाए जैसा पहले था? हर जगह रेस्त्रां, होटल, मोटल, खाने के स्थान, क्यों? क्योंकि लोग कृषि से दूर जा रहे हैं और राजस्व के स्रोतों की तलाश कर रहे हैं। यह फिर से सामाजिक और साथ ही आर्थिक मुद्दा है जो जीवन शैली को नुकसान पहुंचा रहा है और एक तरह से पर्यावरण के खतरों से जुड़ा हुआ है। खेल को प्रोत्साहित करने के लिए पहाड़ी क्षेत्रों को बड़े स्टेडियमों की आवश्यकता नहीं होती है, बल्कि उन्हें बच्चों की सुविधा और प्रोत्साहन के लिए हर जगह छोटे मैदान की आवश्यकता होती है। स्टेडियम एक वाणिज्यिक उद्यम है जो पहाड़ों में बनने से खेलों को प्रोत्साहित करने का काम कम करता है बल्कि भूमि पर दबाव डालता है, मैचों के समय सैंकड़ों वाहन आ कर प्रदूषण फैलाते हैं, अधिक से अधिक होटलों की आवश्यकता पड़ती है जो फिर से भूमि पर दबाव डालते हैं। अब एक नया क्रेज आ रहा है, रोप वे जो फिर से भूमि द्रव्यमान पर दबाव डालने, पेड़ों को काटने और विनाश को आमंत्रित करने के लिए है।

सूची बहुत लंबी है, परिणाम हमारे सामने हैं। प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं, कृषि और इसके विविधीकरण उत्पादों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, ज़मीनी स्तर पर गाँव के स्तर पर स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहित करने, स्थानीय स्तर पर संसाधनों को विकसित करने तथा अनेकों ऐसे कार्यों पर ध्यान देने के बजाय हम औद्योगीकरण, पर्यटन और इसकी संबंधित परियोजनाओं में चले गए हैं और हम इन चीजों को विकास के रूप कहते हैं, जो अधिक समस्याओं को पैदा कर रहे हैं। आर्थिक विकास कैसा भी हो रहा है, सामाजिक संघर्षों को बड़ा रहा है, शांति और सद्द्भाव को कम कर रहा है, समय के बचत के नाम पर टेंशन बड़ा रहा है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि विकास नहीं होना चाहिए, लेकिन फिर से हमें परिभाषित करना चाहिए कि विकास का क्या मतलब है। क्या हर राज्य में कोई भी राज्य स्तर, जिला स्तर, नगर स्तर, पंचायत स्तर की लाइब्रेरी है? क्या आस पास के स्थानों पर एक खेल का मैदान है? क्या सभी सुविधाओं के साथ एक प्राथमिक और साथ ही अच्छा स्वास्थय केंद्र है? क्या पीने का पानी आसानी से उपलब्ध है और यह सुरक्षित है? ऐसी सूची भी बहुत लम्बी है। हमें थोड़ा रुकने और खुद पर प्रतिबिंबित करने की आवश्यकता है कि हम वास्तव में विकसित हो रहे हैं या विनाश की ओर बढ़ रहे हैं?

Deepika Sharma

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