
उमंग फाउंडेशन के अध्यक्ष ने हिमाचल में मानव तस्करी के ऊपर से पर्दा उठाया है। अध्यक्ष अजय श्रीवास्तव ने कहा कि पिछले वर्ष अक्टूबर में उमंग फाउंडेशन के मंच पर अपने महत्वपूर्ण लेक्चर में डॉ. डेजी ठाकुर ने कहा भी था कि उनके नेतृत्व में राज्य महिला आयोग बच्चों और महिलाओं की तस्करी के विषय पर भी ध्यान केंद्रित करेगा। हालांकि उनके अध्यक्ष बनने से पूर्व राज्य महिला आयोग की भूमिका इस विषय पर नकारात्मक थी। उन दिनों आयोग महिलाओं और बच्चों की तस्करी और यौन अपराधों के अलावा मशोबरा स्थित नारी सेवा सदन में महिलाओं के मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन जैसे मामलों को रफा-दफा करने के प्रयास करता रहा है। वहां भर्ती बेसहारा महिलाओं में कई ऐसी भी थीं जो कथित रूप से तस्करी का शिकार होकर कभी हिमाचल आई थीं और मानसिक संतुलन खो देने के कारण अपने बारे में ज्यादा जानकारी देने में असमर्थ थीं।उन्होंने कहा कि
यह मुद्दा उन्होंने उमंग फाउंडेशन के माध्यम सरकार और मीडिया के समक्ष रखा। इसके बाद मुझे हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करके न्याय की मांग करनी पड़ी। जून 2015 में मेरी जनहित याचिका पर हाईकोर्ट के एक लैंडमार्क जजमेंट के बाद नारी सेवा सदन में महिलाओं के मानवाधिकारों का संरक्षण हुआ। लेकिन मानव तस्करी जैसे विषय को न तो महिला एवं बाल विकास विभाग और न ही पुलिस ने छुआ।
यही नहीं, हिमाचल के सिरमौर जिले से विवाह के लिए गरीब महिलाओं और नाबालिग लड़कियों को हरियाणा में बेमेल विवाह के लिए कथित रूप से बेचे जाने की खबरों पर भी राज्य महिला आयोग ने विस्तृत जांच की बजाए उसे हिमाचल के विरुद्ध राजनीतिक साजिश बता कर अपना पल्ला झाड़ लिया था। लेकिन समाचार पत्रों का संज्ञान लेकर राष्ट्रीय महिला आयोग ने तब सिरमौर का दौरा किया।
दरअसल मानव तस्करी एक विश्वव्यापी समस्या है। महिलाओं और बच्चों की तस्करी मानवाधिकारों का सबसे गंभीर उल्लंघन माना जाता है। अफ्रीका और एशिया के गरीब देशों के भीतर और वहां से दूसरे देशों में महिलाओं और बच्चों को तस्करी के माध्यम से भेजा जाना यह बताता है कि इस अपराध में शामिल लोगों का नेटवर्क अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कितना मजबूत है। वेश्यावृत्ति, बाल मजदूरी, बंधुआ मजदूरी, जबरन विवाह अथवा निकाह और भीख मांगने के लिए बच्चों और महिलाओं की तस्करी दक्षिण एशिया और भारत में भी काफी आम है। हमें याद होगा कि एक समय ऐसा भी था जब अरब देशों के रईस शेख हैदराबाद और अन्य क्षेत्रों की गरीब मुस्लिम बच्चियों को निकाह के बहाने खरीद कर ले जाते थे। अब समाज, मीडिया और सरकार के स्तर पर जागरूकता के कारण ऐसी घटनाओं में काफी कमी आई है।
मुझे ह्यूमन ट्रैफिकिंग विशेषकर महिलाओं और बच्चों की तस्करी पर दो इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंसेस में भाग लेने का मौका मिला। वहां मुझे काफी चौंकाने वाले आंकड़े और अन्य जानकारियां मिलीं। यही नहीं उन कॉन्फ्रेंसेस में मुझे उन नाबालिग बच्चियों और बालिग हो चुकी महिलाओं से मिलने और बात करने का मौका भी मिला जिन्हें भारत के विभिन्न राज्यों के अलावा नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार से भारत लाकर सेक्स व्यापार में धकेल दिया गया था। उन पर हुए भीषण अत्याचारों की कहानियां हमारे रोंगटे खड़े कर सकती हैं। उन्हें रेस्क्यू करने और फिर समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए किए गए कार्यों की जानकारी भी मिली।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार ह्यूमन ट्रैफिकिंग की वजह से विश्व में 4 करोड़ से अधिक लोग गुलामों से भी बदतर जिंदगी जीने पर मजबूर हैं। इसमें से महिलाओं और बच्चों की लगभग आधी संख्या भारत में है। वैश्विक स्तर पर ट्रैफिकिंग का शिकार महिलाएं और लड़कियां बहुसंख्या में हैं। ट्रैफिकिंग में उनका हिस्सा 70 प्रतिशत से अधिक है। विश्व में सेक्स के लिए ट्रैफिकिंग का धंधा 150 बिलियन डॉलर से अधिक का है। अगर हम इस रकम को रुपयों में आंकें तो यह कई सौ अरब रुपए बनेंगे।
यदि हम भारत की बात करें तो वर्ष 2016 में दर्ज ट्रैफिकिंग के 15000 मामलों में दो तिहाई महिलाएं थीं। इनमें आधी संख्या 18 साल से कम आयु की बच्चियों की थी। सेक्स ट्रैफिकिंग से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में भारत भी शामिल है। तस्करी का शिकार महिलाएं और बच्चे समाज के सबसे कमजोर आर्थिक वर्ग, और दलित तथा आदिवासी समुदाय से होते हैं।
भारत में ट्रैफिकिंग का शिकार महिलाओं और बच्चों के रिसक्यू और पुनर्वास के लिए पद्मश्री डॉ. सुनीता कृष्णन के नेतृत्व में बेहतरीन कार्य कर रही हैदराबाद की संस्था प्रज्जवला के अनुसार भारत में सेक्स स्लेवरी में एक करोड़ 80 लाख से अधिक महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। हर वर्ष लगभग 2 लाख महिलाएं और बच्चे अपहरण, डर, ब्लैकमेलिंग, और लालच आदि से देह व्यापार के धंधे में धकेल दिये0 जाते हैं। भारत में 16 वर्ष से कम आयु वर्ग के लगभग 65 हजार बच्चे हर वर्ष तस्करी किए जाते हैं। इनमें 5 वर्ष तक के बच्चे भी शामिल हैं। प्रज्वला के आंकड़ों के मुताबिक भारत में इंटर स्टेट ट्रैफिकिंग 90% और इंटरनेशनल ट्रैफिकिंग 10% है।
यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ स्टेट की 2021 की रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में 2019 में मानव तस्करी के 2088 केस रिपोर्ट हुए थे। 2018 में यह संख्या 1830 और 2017 में 2854 थी। यदि हम स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा अनुमानित आंकड़ों की तुलना नेशनल क्राइम ब्यूरो में दर्ज मामलों से करें तो पता चलता है कि पुलिस में दर्ज होने वाले मामलों की संख्या नगण्य है।
लोकसभा में 5 अप्रैल 2022 को गृह मंत्री ने एक प्रश्न के उत्तर में नेशनल क्राइम ब्यूरो की 2020 की रिपोर्ट के हवाले से 2018 से 2020 के दौरान बच्चों की ट्रैफिकिंग के राज्यवार आंकड़े पेश किए। उनके मुताबिक वर्ष 2018 में बच्चों की ट्रैफिकिंग के कुल 941 वर्ष 2019 में 883 और वर्ष 2020 में 706 मामले रिपोर्ट हुए। इनमें असम पश्चिम बंगाल केरल और झारखंड के अलावा राजस्थान के मामले अधिक थे। केंद्र शासित प्रदेशों में दिल्ली में 2018 में 66, वर्ष 2019 में 64 और वर्ष 2020 में 36 बच्चों की तस्करी के मामले दर्ज हुए। दिलचस्प बात यह है कि हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2018 में 0 2019 और 20 में एक-एक बच्चे की तस्करी का मामला दर्ज हुआ।
दिलचस्प बात यह है कि वर्ष 2020 में एक बच्चे की तस्करी का मामला भी उमंग फाउंडेशन के हस्तक्षेप के बाद पुलिस को दर्ज करना पड़ा। शिमला के टूटू के एक कारोबारी के घर से मेरी शिकायत पर मध्य प्रदेश की एक 15 वर्षीय बच्ची बहुत बुरी हालत में पुलिस ने बरामद की थी। हैरानी की बात यह है कि पुलिस ने शुरुआत में बाल मजदूरी का मामला दर्ज किया जबकि उसे पता था कि वह बच्ची हिमाचल से बाहर की है। मैंने तत्कालीन पुलिस अधीक्षक को स्पष्ट कहा कि यदि एफ आई आर में ट्रैफिकिंग के सेक्शंस नहीं लगाए गए तो मैं डीजीपी से शिकायत करुंगा और जरूरत पड़ी तो हाईकोर्ट भी जाऊंगा। इसके बाद ट्रैफिकिंग किस सेक्शन भी जोड़े गए और कुछ आरोपी गिरफ्तार भी हुए इनमें कुछ कारोबारी के नौकर भी शामिल थे। जांच में बच्ची के यौन शोषण का मामला भी उजागर हुआ। दुर्भाग्य की बात यह है कि अंत तक पुलिस का सॉफ्ट कॉर्नर उस प्रभावशाली कारोबारी के प्रति बना रहा।
वर्ष 2017 में उमंग फाउंडेशन ने शिमला जिले के अत्यंत पिछड़े क्षेत्र कुपवी की साड 13 साल की दो जुड़वा बहनों को पांवटा साहिब के एक बड़े व्यापारी के घर से रेस्क्यू कराया था। मुझे पता चला था कि बच्चियों के पिता को उस कारोबारी ने एक मुश्त पैसे देकर अपने घर पर रखा हुआ था। दोनों बच्चियों को पढ़ाई से वंचित रख कर बाल मजदूरी कराई जाती थी। एक बच्ची ने उस कारोबारी पर यौन शोषण का आरोप भी लगाया था। मामला उजागर होने के बाद पुलिस ने परंपरागत स्टाइल में बाल मजदूरी का केस दर्ज किया। पुलिस के उच्चाधिकारियों से मिलकर मैंने वहां की तत्कालीन पुलिस अधीक्षक पर चाइल्ड ट्रैफिकिंग और यौन शोषण के मामले में भी धाराएं लगाने का दबाव बनाया। इसके बावजूद अज्ञात कारणों से पुलिस ने पोक्सो एक्ट के बहुत माइल्ड सेक्शन लगाए और चाइल्ड ट्रैफिकिंग के मामले पर विचार ही नहीं किया। सिरमौर पुलिस की मेहरबानी अत्यंत धनी और प्रभावशाली कारोबारी पर बनी रही और यही वजह थी कि पोक्सो केस होने के बावजूद जिला अदालत से उसे 10 दिन में जमानत मिल गई।
हिमाचल प्रदेश से दूसरे राज्यों में बच्चियों और महिलाओं की तस्करी के आंकड़े उपलब्ध नहीं होते। इसका कारण यह है कि पिछले दशकों में प्रशासन और पुलिस बिना किसी जांच के ऐसी घटनाओं के वजूद से ही इनकार करता रही है। वर्ष 2016 में राष्ट्रीय दैनिक दि स्टेट्समैन में सिरमौर जिले के अत्यंत पिछड़े क्षेत्र शिलाई से गरीब परिवार की बच्चियों और महिलाओं को हरियाणा में विवाह के लिए कथित रूप से बेचे जाने का मामला प्रकाशित हुआ था। शिलाई के तत्कालीन एसडीएम की पहल पर इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट स्कीम के कर्मचारियों के सर्वे में यह बात उजागर हुई थी। हरियाणा में पुरुषों की तुलना में महिलाओं का अनुपात अत्यंत कम होने के कारण साथ लगते सिरमौर जिले के गरीब परिवारों से विवाह की आड़ में बच्चियों और युवतियों को बेचे जाने के आरोप लगे थे।
तत्कालीन केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती मेनका गांधी ने इस पर राज्य सरकार से रिपोर्ट भी मांगी थी। राज्य सरकार ने इसे सिरे से नकार दिया था और एसडीएम का दूसरी जगह कर दिया था। वर्ष 2016 में राज्य महिला आयोग ने भी ऐसी घटनाओं की जांच की बजाए उन्हें सरकार के खिलाफ राजनीतिक साजिश बताया था।
मीडिया रिपोर्टों का संज्ञान लेकर तब राष्ट्रीय महिला आयोग की तत्कालीन अध्यक्ष रेखा शर्मा ने अन्य सदस्यों के साथ सिरमौर जिले का दौरा किया था। तब सरकारी तंत्र ने मामले की छानबीन में उन्हें बहुत सीमित सहयोग दिया। आयोग ने शिलाई की मनाल पंचायत के गांव दीमाना में पाया कि कुल 30 परिवारों की 9 लड़कियों का विवाह हरियाणा में हुआ है। आयोग की अध्यक्ष के साथ बातचीत में कुछ अभिभावक तो यह भी नहीं बता पाए कि उनकी बेटियां हरियाणा में कहां और किसके
साथ ब्याही गई हैं। रेखा शर्मा ने उस समय ऐसे मामलों पर चिंता जताते हुए कहा था कि सरकार को ज्यादा संवेदनशीलता से काम लेना चाहिए।
हिमाचल प्रदेश दूसरे राज्यों की महिलाओं और बच्चियों की तस्करी का डेस्टिनेशन भी है और सोर्स भी। यहां ज्यादातर महिलाएं और बच्चियां देश के पिछड़े और गरीब आदिवासी क्षेत्रों से लाई जाती हैं। प्लेसमेंट एजेंसियों की आड में महिलाओं और बच्चों की तस्करी का धंधा करने वाले लोग एकमुश्त पैसे लेकर उन्हें हिमाचल में अमीर और प्रभावशाली लोगों के पास बेच देते हैं। इसके बाद उन महिलाओं और बच्चियों को मजदूरी, स्वास्थ्य सुविधा या अन्य कोई सुविधा नहीं मिलती। यदि वह बच्ची है तो उसका शिक्षा का अधिकार छीन लिया जाता है। ऐसे मामलों में यौन शोषण की संभावना को भी नकारा नहीं जा सकता। कम उम्र की महिलाओं और बच्चियों को खरीदने वाले लोगों में प्रभावशाली कारोबारी वर्ग और बड़े अधिकारी भी शामिल हैं। यही वजह है कि महिलाओं और बच्चों की तस्करी के मामले या तो उजागर नहीं हो पाते और जब किसी तरह पर्दाफाश होता है तो उसे मानव तस्करी के दृष्टिकोण से देखा ही नहीं जाता। इसका एक कारण यह भी है कि हिमाचल पुलिस सपना रिकॉर्ड राष्ट्रीय स्तर पर अच्छा दिखाने के लिए ऐसे मामलों को दर्ज ही नहीं करती।



