साहित्य के रंगों से गूंजा गेयटी…..
साहित्य अकादेमी और संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार द्वारा आयोजित आजादी के अमृत महोत्सव के तहत अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव उन्मेष-‘अभिव्यक्ति की आजादी’ मे शिमला के टाऊन हॉल में एक सत्र 17 जून अपराह्न में हिमाचल प्रदेश के लोकगीत विषय पर केन्द्रित रहा जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार,कहानीकार डा.प्रत्यूष गुलेरी ने की।उन्होने हिमाचल के लोक गीतो के संदर्भ मे कहा कि लोक गीतो का प्रचार प्रसार तभी संभव है जब हम अपनी बोलियो मे ज्यादा से ज्यादा लिखेगे ।
उन्होने हिमाचली भाषा,लोक संस्कृति व लोक साहित्य का संरक्षण और संवर्धन हेतु मिलकर कार्य करना का आग्रह किया ।
सत्र मे साहित्यकार अनंत आलोक ने सिरमौरी लोक गीत,गंगी तरनुम मे गाकर समा बाधा ,साहित्यकार दिलीप वशिष्ठ (सिरमौरी) ने हिमाचली लोक गीतो के लम्बे एतिहासिक सफर की बात की और पारंपरिक लोक गीत पेश किए । वरिष्ठ साहित्यकार हरि प्रिया ने मंडयाली मे कविता पाठ किया, वरिष्ठ साहित्यकार व सुप्रसिद्ध लोक गायिका रूपेश्वरी शर्मा ने मंडियाली मे छीज व बारह मासा तरनुम मे सुनाया । उमा ठाकुर नधैक ने हिमाचली लोक गीतो पर शोध पत्र पढकर हिमाचल की लोक संस्कृति के अनछुए पहलूओ को उजागर किया और पारंपरिक आचडी गीत,लामण और विवाह संस्कार गीत सुनाकर लोक गीतो का महत्व बताया । उन्होने कहा कि
वर्तमान में युवापीढ़ी पहाड़ी बोली से विमुख होती जा रही है और यह हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी है कि हम सब मिलकर हिमाचली बोलियों और लोक गीतो का संरक्षण और संवर्धन करें, ताकि इन बोलियों को गाँव की मुँडेर से विश्व पटल तक पहुंचाकर व हिमाचली भाषा का स्वरूप देकर संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जा सके.
सभागार में देश,विदेश व प्रदेश के साहित्य संगीत प्रेमियों ने सत्र की गरिमा बढ़ाई। साहित्य अकादेमी, संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार और भाषा विभाग हिमाचल प्रदेश द्वारा हिमाचल के लोक साहित्य व हिमाचल के लेखको को इस उत्सव मे यथासंभव स्थान देना बहुत ही सराहनीय पहल है। उम्मीद यही कि भविष्य मे भी इस तरह के साहित्य उत्सव होते रहेगे।



