स्वास्थ्य

आखिर हिमाचल में दवा बनती किसके लिए है—सिर्फ बाजार के लिए या उस मरीज के लिए, जिसके स्वास्थ्य पर पूरी व्यवस्था टिकी है? फार्मा हब हिमाचल में दवा का खेल: मरीज के हित से बड़ा है बाजार?

दवा निर्माण में देश की अग्रणी पहचान, हजारों करोड़ का निर्यात और सरकारी जमीन व प्रोत्साहन—फिर अस्पतालों में Medical Representatives पर रोक, Jan Aushadhi केन्द्रों के बंद होने और अस्पताल pharmacies और Jan Aushadhi व्यवस्था पर इतने सवाल क्यों?

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विशेष जनहित रिपोर्ट | असर मीडिया हाउस

शिमला।

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हिमाचल प्रदेश की पहचान पिछले दो दशकों में केवल पर्यटन और बागवानी तक सीमित नहीं रही। राज्य देश के सबसे महत्वपूर्ण pharmaceutical manufacturing centres में शामिल हो चुका है। हिमाचल सरकार के Economic Survey 2024-25 के अनुसार प्रदेश में 600 से अधिक operational pharmaceutical units हैं और राज्य को global pharmaceutical manufacturing hub के रूप में प्रस्तुत किया गया है। सरकारी सर्वेक्षण में प्रदेश का भारत की pharmaceutical demand में लगभग 35 प्रतिशत योगदान और करीब ₹10,000 करोड़ वार्षिक pharmaceutical exports का उल्लेख है।

अब ऊना के हरोली में 1,405.01 एकड़ में Bulk Drug Park विकसित किया जा रहा है। फरवरी 2026 के केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार इसकी कुल project cost ₹1,923 करोड़ और common infrastructure facilities की लागत ₹1,118.46 करोड़ है तथा केंद्र से ₹1,000 करोड़ तक की सहायता स्वीकृत है।

लेकिन इस पूरे औद्योगिक विस्तार के बीच एक बुनियादी जनहित प्रश्न उठता है—

जिस राज्य में देश की इतनी बड़ी मात्रा में दवा बनती है, क्या उसी अनुपात में आम मरीज को सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण, सस्ती और पारदर्शी दवा व्यवस्था भी मिल रही है?


हिमाचल का फार्मा उद्योग कितना बड़ा है?

राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार हिमाचल में 600 से अधिक pharmaceutical manufacturing units operational हैं। Pharmaceutical exports करीब ₹10,000 करोड़ सालाना बताए गए हैं। यह राज्य के कुल exports का लगभग 60 प्रतिशत है।

इस उद्योग से राज्य को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कई लाभ मिलते हैं—

  • रोजगार
  • औद्योगिक निवेश
  • ancillary industries
  • logistics और transportation
  • packaging
  • laboratories और testing services
  • राज्य को कर एवं अन्य राजस्व
  • देश और विदेश के बाजारों तक हिमाचल की औद्योगिक पहुंच

लेकिन अब सवाल केवल “कितना उत्पादन?” का नहीं होना चाहिए।

सवाल यह भी होना चाहिए—

इस पूरे pharmaceutical ecosystem का measurable benefit हिमाचल की जनता को कितना मिल रहा है?


US FDA Approved Plants कितने?—यहां भी तथ्य स्पष्ट होना जरूरी

हिमाचल में कितने “US FDA approved plants” हैं, इस प्रश्न का उत्तर देते समय एक तकनीकी अंतर समझना जरूरी है।

किसी pharmaceutical manufacturing facility का US FDA द्वारा inspection, registration, establishment record या regulatory compliance में होना और किसी particular drug/product का US FDA-approved होना एक ही बात नहीं है।

सोलन के सरकारी District Export Action Plan में लगभग 15 units को USFDA norms के अनुरूप बताया गया है। लेकिन इसे वर्तमान समय में “15 US FDA approved plants” की अंतिम आधिकारिक संख्या मानना उचित नहीं होगा।

FDA के public records में हिमाचल के Baddi क्षेत्र की कई facilities की inspections और regulatory actions भी दर्ज हैं। इसलिए राज्य सरकार को facility-wise current regulatory status सार्वजनिक करना चाहिए—

  • कौन-सी facility US FDA regulated market के लिए manufacturing करती है?
  • किस facility का FDA inspection हुआ?
  • कब हुआ?
  • क्या observations आए?
  • उनका corrective action क्या हुआ?
  • वर्तमान regulatory status क्या है?

इससे “FDA approved” जैसे व्यापक दावे के बजाय जनता को वास्तविक regulatory picture मिल सकेगी।


सरकारी जमीन और उद्योग को प्रोत्साहन—बदले में जनता को क्या?

हिमाचल की Industrial Investment Policy के तहत industrial areas में need-based land को सामान्यतः 95 वर्ष की leasehold अवधि पर allot करने का प्रावधान है। भूमि का premium निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार तय किया जाता है। नीति में eligible enterprises के लिए विभिन्न incentives और concessions का भी प्रावधान है।

अर्थात pharmaceutical industry का विस्तार केवल निजी पूंजी से नहीं होता। इसमें सरकारी land, infrastructure और policy incentives की भी भूमिका है।

इसलिए जनहित में सरकार को यह जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए—

किस company को कितनी जमीन मिली?

किस दर/premium और किन lease conditions पर मिली?

कितना investment करने की शर्त थी?

कितने रोजगार देने का commitment था?

वास्तव में कितने रोजगार पैदा हुए?

राज्य को कितना revenue मिला?

क्या निर्धारित investment और employment commitments पूरे हुए?

सरकारी प्रोत्साहन का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि “कितनी कंपनियां आईं”, बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि “जनता को बदले में क्या मिला।”


दवा उद्योग बड़ा है, तो quality surveillance भी उतना ही मजबूत होना चाहिए

दवा का मामला सामान्य industrial product से अलग है। यहां गुणवत्ता का सीधा संबंध मानव जीवन और स्वास्थ्य से है।

CDSCO नियमित रूप से Not of Standard Quality (NSQ) drug alerts जारी करता है और product, batch तथा manufacturer संबंधी विवरण सार्वजनिक करता है।

हिमाचल में बने कुछ drug samples के NSQ पाए जाने के मामले भी सामने आते रहे हैं।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट रहनी चाहिए—

एक NSQ sample का मिलना पूरी company या पूरे हिमाचल pharmaceutical sector को खराब घोषित करने का आधार नहीं है।

फिर भी बड़े pharmaceutical manufacturing hub के लिए सवाल गंभीर है:

क्या drug-testing और surveillance व्यवस्था production capacity के अनुपात में पर्याप्त है?

सरकार को एक public dashboard बनाकर यह जानकारी नियमित रूप से देनी चाहिए—

कितने samples लिए गए → कितने test हुए → कितने NSQ निकले → किस manufacturer के थे → क्या कार्रवाई हुई → क्या repeat violation था।

यही transparency जनता का विश्वास मजबूत कर सकती है।


क्या खराब दवाओं और kidney disease के बीच कोई संबंध है?

राज्य में kidney disease/CKD को लेकर चिंता व्यक्त की जाती है। लेकिन उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर यह कहना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा कि हिमाचल में kidney patients की संख्या बढ़ने का कारण खराब quality की medicines हैं।

ऐसा निष्कर्ष निकालने के लिए clinical और epidemiological research आवश्यक है।

क्या राज्य सरकार ने adverse drug reactions, substandard medicines और गंभीर health outcomes के बीच कोई systematic study कराई है?

यदि नहीं, तो क्या ऐसी surveillance व्यवस्था शुरू की जाएगी?

यह प्रश्न किसी अप्रमाणित आरोप से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।


Medical Representatives पर प्रतिबंध: सवाल नियंत्रण का नहीं, व्यवस्था का है

क्या blanket ban के बजाय controlled, registered और time-bound scientific interaction की व्यवस्था बेहतर नहीं हो सकती?


Pharmaceutical marketing को ethical बनाने के लिए केंद्र सरकार ने UCPMP 2024 लागू किया है और 2025 में इसमें amendments भी किए गए। वर्तमान व्यवस्था pharmaceutical companies और healthcare professionals के बीच promotional interactions तथा marketing expenditure disclosure से संबंधित प्रावधान रखती है।

मार्च 2026 में केंद्र सरकार ने संसद में बताया कि DGHS के 12 मई 2023 और 28 मई 2025 के आदेशों के अनुसार Medical Representatives को Central Government Hospitals में प्रवेश की अनुमति नहीं है, जिसका उद्देश्य frequent visits और unethical marketing practices को रोकना है। सरकार ने यह भी बताया कि doctors को नई treatments, investigations और procedures की जानकारी email, digital media, CME तथा conferences के माध्यम से दी जा सकती है।

लेकिन यहां हिमाचल के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण अंतर है:

Central Government Hospitals का यह आदेश अपने आप हिमाचल के प्रत्येक State Government Hospital पर लागू नहीं माना जा सकता।

इसलिए हिमाचल सरकार को स्पष्ट करना चाहिए—

  • राज्य में MR प्रवेश को लेकर वर्तमान आदेश क्या है?
  • कौन-कौन से अस्पताल इसके दायरे में हैं?
  • क्या सभी representatives पर समान नियम हैं?
  • क्या appointment-based interaction की व्यवस्था है?
  • ethical scientific information doctors तक पहुंचाने का वैकल्पिक माध्यम क्या है?

Unethical promotion पर नियंत्रण जरूरी है, लेकिन legitimate scientific communication के लिए पारदर्शी व्यवस्था भी जरूरी है।


अस्पताल परिसरों की pharmacies—कितनी पारदर्शी है व्यवस्था?

अब सवाल pharmaceutical marketing से आगे बढ़कर सरकारी अस्पतालों के परिसरों में दवा बिक्री की व्यवस्था पर आता है।

सरकारी अस्पताल की जमीन और infrastructure सार्वजनिक संसाधन हैं। यदि वहां pharmacy या medicine outlet संचालित किया जाता है तो जनता को यह जानने का अधिकार होना चाहिए—

  • दुकान किस प्रक्रिया से allot हुई?
  • tender/EOI हुआ या नहीं?
  • कितने applicants थे?
  • चयन का आधार क्या था?
  • किराया कितना है?
  • agreement कितने वर्षों का है?
  • renewal कैसे होता है?
  • क्या sub-letting की अनुमति है?
  • क्या conflict-of-interest की जांच होती है?

यह किसी व्यक्ति या pharmacy operator पर आरोप नहीं है।

लेकिन सरकारी अस्पताल परिसर में commercial activity के लिए public property के इस्तेमाल में पारदर्शिता अनिवार्य होनी चाहिए।


नई “Discounted Medicine Shop” बनाकर निजी संचालक को देने की व्यवस्था—सवाल जरूरी हैं

हाल के समय में बड़े सरकारी अस्पतालों के परिसरों में Discounted Medicine Shop के नाम से अलग medicine outlets बनाए जाने और निजी संचालकों को दिए जाने की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

यह व्यवस्था अपने आप में गलत नहीं है। यदि इससे मरीजों को वास्तव में बाजार से कम कीमत पर दवाएं मिलती हैं तो यह जनहितकारी पहल हो सकती है।

लेकिन यदि किसी सरकारी अस्पताल में नई दुकान का निर्माण किया गया है और उसे किसी निजी applicant/operator को दिया गया है, तो जनता को यह जानने का अधिकार है—

दुकान का निर्माण किसने और किस धन से कराया?

जगह किस आधार पर दी गई?

क्या खुला tender/EOI हुआ?

कितने लोगों ने आवेदन किया?

चयन की शर्तें क्या थीं?

किराया या licence fee कितना है?

दवाओं पर न्यूनतम discount कितना देना अनिवार्य है?

क्या discount का वास्तविक विवरण मरीज के bill पर दिखाई देता है?

agreement कितने वर्षों का है और renewal की व्यवस्था क्या है?

और सबसे महत्वपूर्ण—

यदि उसी परिसर में Jan Aushadhi Kendra भी उपलब्ध है या बंद हो चुका है, तो Discounted Medicine Shop और Jan Aushadhi की भूमिका एवं चयन प्रक्रिया क्या है?

यहां भी किसी दुकान या संचालक को दोषी ठहराने के बजाय पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक करने की मांग होनी चाहिए।


“Discounted” नाम पर्याप्त नहीं—मरीज को वास्तविक discount पता होना चाहिए

यदि किसी दुकान को सरकारी अस्पताल में इस उद्देश्य से स्थान दिया गया है कि मरीजों को कम कीमत पर दवा मिले, तो transparency के लिए कुछ न्यूनतम नियम होने चाहिए—

  • MRP और selling price स्पष्ट दिखाई दे;
  • वास्तविक discount bill पर दर्ज हो;
  • मरीज को computerised bill मिले;
  • pharmacy licence और pharmacist की जानकारी प्रदर्शित हो;
  • expiry और storage की जांच हो;
  • शिकायत के लिए स्पष्ट व्यवस्था हो;
  • सरकार agreement की discount conditions public करे।

रियायती दवा की दुकान का सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण उसका नाम नहीं, मरीज को मिलने वाली वास्तविक बचत होनी चाहिए।


यदि मरीज अधिक हैं और दवाओं की खपत भी अधिक है, तो Jan Aushadhi क्यों बंद?

यहीं से रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण जनहित प्रश्न सामने आता है।

31 दिसंबर 2025 के सरकारी आंकड़ों में हिमाचल प्रदेश के लिए 74 Jan Aushadhi Kendras opened और 41 closed दर्ज थे।

इसके बाद 28 फरवरी 2026 तक हिमाचल में 75 Jan Aushadhi Kendras operational दर्ज किए गए।

इसलिए 74/41 का आंकड़ा 31 दिसंबर 2025 का snapshot है; इसे वर्तमान operational count समझना सही नहीं होगा।

लेकिन 41 बंद centres का सवाल फिर भी महत्वपूर्ण है:

वे क्यों बंद हुए?

क्या वजह थी—

  • कम बिक्री?
  • supply समस्या?
  • operator की समस्या?
  • agreement समाप्त होना?
  • location?
  • financial viability?
  • administrative कारण?

सरकार को प्रत्येक बंद centre का कारण सार्वजनिक करना चाहिए।


Jan Aushadhi: 74 चल रहे, 41 बंद—क्यों?

बड़े सरकारी अस्पताल में मरीज बहुत, दवा की मांग बहुत—फिर Jan Aushadhi बंद क्यों?

यदि किसी सरकारी hospital में मरीजों की संख्या अधिक है और दवाओं की मांग भी पर्याप्त है, लेकिन वहां Jan Aushadhi Kendra बंद पड़ा है, तो यह एक वैध जनहित प्रश्न है:

क्या सरकार उस स्थान पर Jan Aushadhi दोबारा शुरू करने का प्रयास कर रही है?

और यदि कोई पात्र निजी व्यक्ति या संस्था इसे जनहित में चलाना चाहती है—

क्या उसे आवेदन का अवसर दिया जा रहा है?

केंद्र सरकार की PMBJP व्यवस्था में Jan Aushadhi Kendras के लिए private participation का रास्ता मौजूद है और सरकार ने wider availability के लिए सरकारी hospitals, CHCs और PHCs में space उपलब्ध कराने का भी अनुरोध किया है।

इसलिए राज्य सरकार से पूछा जाना चाहिए:

क्या बंद centre के लिए नया EOI निकाला गया?

कितने applicants आए?

यदि कोई applicant नहीं आया तो क्यों?

यदि applicant आया तो चयन क्यों नहीं हुआ?

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यदि सरकारी अस्पताल में स्थान उपलब्ध है तो affordable medicine outlet दोबारा शुरू करने में बाधा क्या है?

जहां मरीज हैं, दवा की मांग है और सरकारी परिसर उपलब्ध है, वहां affordable medicine centre लंबे समय तक बंद क्यों रहे—इसका जवाब जनता को मिलना चाहिए।


Theog का मामला: Jan Aushadhi की शर्तों पर अदालत की स्पष्ट टिप्पणी

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के Civil Hospital Theog से जुड़े मामले में Jan Aushadhi Kendra में गैर-generic/branded medicines और surgical equipment की बिक्री का विवाद सामने आया।

13 सितंबर 2024 के आदेश में अदालत ने दर्ज किया कि संबंधित Kendra को PMBJP के तहत संचालित किया जा रहा था और non-generic/branded medicines तथा surgical equipment की बिक्री पर रोक का interim order पहले जारी किया गया था। अदालत के रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि Director, Health Services, Himachal Pradesh की inquiry में इन आरोपों को पाया गया था।

अदालत ने interim restraint हटाने से इनकार करते हुए कहा कि Jan Aushadhi Kendra विशेष सरकारी योजना के तहत चलता है और scheme की conditions का पालन करना आवश्यक है। अदालत ने केवल profitability/economic viability को scheme conditions से विचलन का पर्याप्त आधार नहीं माना।

यह फैसला केवल Theog के मामले पर लागू तथ्य देता है; इससे दूसरे centres के बारे में कोई सामान्य निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

लेकिन इससे एक महत्वपूर्ण राज्यव्यापी सवाल जरूर उठता है—

क्या Theog मामले के बाद हिमाचल के सभी Jan Aushadhi Kendras का compliance audit हुआ?

यदि हुआ तो—

  • कितने centres की जांच हुई?
  • कितने compliant पाए गए?
  • कितनों में अनधिकृत medicines मिलीं?
  • कितने operators को notice दिया गया?
  • कितने मामलों में कार्रवाई हुई?

और यदि audit नहीं हुआ—

तो क्या अब statewide compliance audit नहीं होना चाहिए?


Jan Aushadhi और अन्य hospital pharmacies—नियम स्पष्ट क्यों न हों?

यदि किसी सरकारी hospital परिसर में Jan Aushadhi, Discounted Medicine Shop और अन्य authorised pharmacy जैसी एक से अधिक व्यवस्थाएं मौजूद हैं, तो मरीज के लिए नियम पूरी तरह स्पष्ट होने चाहिए।

उसे पता होना चाहिए—

  • कौन-सी दुकान किस योजना के तहत है?
  • कौन-सी दवाएं वहां बेची जा सकती हैं?
  • कीमत कैसे निर्धारित होती है?
  • discount कितना है?
  • quality assurance क्या है?
  • शिकायत कहां की जा सकती है?

विशेष रूप से Jan Aushadhi outlet को PMBJP की निर्धारित conditions के अनुसार ही संचालित किया जाना चाहिए। Theog judgment इसी principle को रेखांकित करता है।


Jan Aushadhi की quality assurance व्यवस्था क्या है?

केंद्र सरकार के अनुसार Jan Aushadhi medicines की quality सुनिश्चित करने के लिए केवल WHO-GMP compliant plants से supply, सभी medicine batches का pre-testing और GLP-compliant laboratories में testing जैसी व्यवस्थाएं लागू हैं।

सरकार के अनुसार PMBJP product basket में हजारों medicines और surgical/medical consumables शामिल हैं तथा इन्हें सामान्य branded medicines की तुलना में लगभग 50–80 प्रतिशत कम कीमत पर उपलब्ध कराने का उद्देश्य है।

इसलिए हिमाचल में असली सवाल होना चाहिए:

क्या इन योजनाओं का लाभ वास्तविक रूप से उस मरीज तक पहुंच रहा है जिसे इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है?


Bulk Drug Park: हिमाचल के लिए बड़ा औद्योगिक अवसर

हरोली, ऊना का Bulk Drug Park हिमाचल के pharmaceutical ecosystem को formulations से आगे bulk drugs/API manufacturing की दिशा में ले जाने का प्रयास है।

केंद्र सरकार के अनुसार हिमाचल पार्क को ₹1,000 करोड़ तक की केंद्रीय सहायता स्वीकृत है और इसका area 1,405.01 acres है। Common infrastructure facilities की लागत ₹1,118.46 करोड़ बताई गई है।

राज्य के Economic Survey में project से ₹8,000–10,000 करोड़ के projected investment और लगभग 40,000 रोजगार potential का उल्लेख है। ये project projections हैं, वर्तमान उपलब्धियों के आंकड़े नहीं।

इसलिए जनता को हर वर्ष इसका report card मिलना चाहिए—

कितना निवेश आया?

कितने रोजगार बने?

कितने हिमाचली युवाओं को रोजगार मिला?

राज्य को कितना revenue मिला?

कितना production शुरू हुआ?

कितना import substitution हुआ?


फार्मा उद्योग से हिमाचल को क्या मिलता है?

Pharmaceutical industry से राज्य को मिलने वाले संभावित लाभ स्पष्ट हैं—

रोजगार

Manufacturing, quality control, packaging, engineering, laboratories और logistics में रोजगार।

निवेश

नई factories और existing plants के expansion से capital investment।

निर्यात

राज्य सरकार करीब ₹10,000 करोड़ annual pharmaceutical exports का आंकड़ा देती है।

राजस्व

करों, fees और economic activity से सरकारी आय।

Ancillary economy

Packaging, transport, warehousing, maintenance, testing और अन्य सेवाओं का विस्तार।

औद्योगिक ecosystem

Baddi-Nalagarh-Solan जैसे क्षेत्रों में technical और manufacturing ecosystem का विकास।

लेकिन इन सभी लाभों के बीच जनता के लिए सबसे महत्वपूर्ण लाभ होना चाहिए—

सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण और affordable medicines तक बेहतर पहुंच।


सरकार से 15 सीधे जनहित सवाल

1. हिमाचल में वर्तमान में कितनी pharmaceutical manufacturing units operational हैं?

2. कितनी facilities के पास वर्तमान में US FDA, EU, WHO-GMP या अन्य international regulatory markets से संबंधित approvals/registrations हैं?

3. सरकार facility-wise current regulatory status public domain में रखेगी?

4. पिछले पांच वर्षों में कितने drug samples test हुए और कितने NSQ पाए गए?

5. Repeat quality violations पर कितनी कार्रवाई हुई?

6. Pharmaceutical companies को आवंटित सरकारी/industrial land का district-wise विवरण क्या है?

7. कितनी जमीन किस premium और lease conditions पर दी गई और उसके बदले कितने investment तथा employment commitments थे?

8. हिमाचल के सरकारी hospitals में Medical Representatives के प्रवेश को लेकर वर्तमान राज्य-स्तरीय आदेश क्या हैं?

9. UCPMP के तहत ethical scientific communication के लिए क्या व्यवस्था है?

10. पिछले पांच वर्षों में सरकारी hospital परिसरों में कितनी pharmacies/medicine outlets allot किए गए और किस प्रक्रिया से?

11. कितने Jan Aushadhi Kendras बंद हुए और प्रत्येक के बंद होने का कारण क्या था?

12. जिन बड़े hospitals में Jan Aushadhi Kendra बंद है, वहां नया EOI क्यों नहीं निकाला गया?

13. यदि कोई पात्र private applicant Jan Aushadhi Kendra जनहित में चलाना चाहता है तो उसे अवसर देने की प्रक्रिया क्या है?

14. क्या Theog मामले के बाद सभी सरकारी hospital परिसर के Jan Aushadhi Kendras का statewide compliance audit हुआ?

15. क्या सरकारी अस्पतालों में बनाई/आवंटित Discounted Medicine Shops के निर्माण खर्च, tender/EOI, allotment conditions, rent और अनिवार्य discount की जानकारी सार्वजनिक की जाएगी?


निष्कर्ष: दवा उद्योग बढ़े, लेकिन मरीज पीछे न छूटे

हिमाचल ने pharmaceutical manufacturing में बड़ी उपलब्धि हासिल की है।

600 से अधिक operational pharmaceutical units, लगभग ₹10,000 करोड़ annual pharmaceutical exports, भारत की pharmaceutical demand में लगभग 35 प्रतिशत योगदान और अब 1,405 एकड़ का Bulk Drug Park—ये आंकड़े राज्य की औद्योगिक क्षमता को दर्शाते हैं।

लेकिन दूसरी ओर, 31 दिसंबर 2025 के आंकड़ों में हिमाचल के 74 Jan Aushadhi Kendras opened और 41 closed दर्ज थे।

फिर सवाल उठता है—

जब राज्य में इतनी बड़ी pharmaceutical manufacturing capacity है, तो affordable medicines की institutional व्यवस्था में gaps क्यों हैं?

यदि कोई Jan Aushadhi Kendra बंद हो गया है तो उसका कारण सार्वजनिक क्यों न हो?

यदि बड़े सरकारी अस्पताल में मरीजों की संख्या और दवाओं की मांग पर्याप्त है तो वहां नया applicant बुलाकर Jan Aushadhi फिर शुरू करने का प्रयास क्यों न हो?

यदि hospital परिसर में नई Discounted Medicine Shop बनाई जाती है तो उसके निर्माण और allotment की पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक क्यों न हो?

यदि Medical Representatives पर restrictions हैं तो ethical scientific information के लिए पारदर्शी व्यवस्था क्या है?

यदि दवा की quality सबसे महत्वपूर्ण है तो drug testing और regulatory action का data public dashboard पर क्यों न हो?

और यदि pharmaceutical industry को सरकारी land, infrastructure और incentives मिलते हैं तो investment, employment और public benefit का annual report card जनता के सामने क्यों न रखा जाए?


सबसे बड़ा सवाल

क्या हिमाचल केवल “Pharma Manufacturing Hub” बनेगा या “Patient-Centric Pharma State” भी?

क्योंकि किसी राज्य की pharmaceutical सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि वहां कितनी दवाएं बनती हैं।

सफलता तब होगी जब—

दवा की गुणवत्ता पर भरोसा हो,

regulatory व्यवस्था पारदर्शी हो,

pharmaceutical marketing ethical हो,

Medical Representative policy स्पष्ट हो,

अस्पताल pharmacies का allotment पारदर्शी हो,

Discounted Medicine Shops में वास्तविक discount की निगरानी हो,

Jan Aushadhi केन्द्र जरूरत वाले स्थानों पर उपलब्ध हों,

बंद केन्द्रों को पुनर्जीवित करने के लिए पात्र applicants को अवसर मिले,

और सरकारी incentives का लाभ रोजगार और revenue के साथ जनता की स्वास्थ्य सुविधा में भी दिखाई दे।

दवा उद्योग बढ़ना चाहिए। निवेश बढ़ना चाहिए। रोजगार बढ़ना चाहिए। निर्यात बढ़ना चाहिए।

लेकिन इस पूरी कहानी के केंद्र में आम मरीज भी उतना ही बड़ा stakeholder होना चाहिए।

आखिर हिमाचल में दवा बनती किसके लिए है—सिर्फ बाजार के लिए या उस मरीज के लिए, जिसके स्वास्थ्य पर पूरी व्यवस्था टिकी है?


संपादकीय टिप्पणी

यह रिपोर्ट किसी pharmaceutical company, doctor, Medical Representative, pharmacy operator या राजनीतिक व्यक्ति पर व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगाती।

अस्पताल pharmacies में राजनीतिक प्रभाव, आर्थिक “कट” अथवा किसी विशेष commercial हित के कारण किसी व्यक्ति/समूह को target किए जाने जैसी बातों को बिना दस्तावेजी प्रमाण तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है। इन्हें जांच योग्य transparency questions के रूप में रखा गया है।

इसी तरह किसी NSQ sample को पूरी pharmaceutical industry की खराब गुणवत्ता का प्रमाण नहीं माना गया है और खराब quality medicines को हिमाचल में kidney disease बढ़ने का कारण नहीं बताया गया है। इसके लिए वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक होगा।

Theog मामले में रिपोर्ट केवल न्यायालय के उपलब्ध आदेश में दर्ज तथ्यों और अदालत की टिप्पणियों तक सीमित है। उससे अन्य Jan Aushadhi Kendras के बारे में कोई सामान्य निष्कर्ष नहीं निकाला गया है।

Deepika Sharma

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