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असर विशेष : जीवंत रहेंगे महान कलाकार “मदन गौतम” , IGMC देहदान से अमर हुई उनकी इंसानियत

शिमला शोकमग्न, अंतिम क्षणों में भी मानवता को समर्पित किया जीवन

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शिमला:
कला, संवेदना और सेवा का पर्याय रहे मदन गौतम (मामू) आज भले ही हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन अपने महान निर्णय के कारण वे हमेशा जीवंत रहेंगे। उनके निधन की खबर से पूरे शहर ही नहीं पूरा हिमाचल में गहरा शोक और भावनात्मक सन्नाटा छा गया है।
उन्होंने कल शाम Postgraduate Institute of Medical Education and Research Chandigarh (पीजीआई) में अंतिम सांस ली। परंतु जीवन की अंतिम दहलीज पर खड़े होकर भी उन्होंने जो निर्णय लिया, उसने उन्हें साधारण इंसान से असाधारण बना दिया।
मदन गौतम ने अपने पार्थिव शरीर को Indira Gandhi Medical College Shimla (आईजीएमसी) शिमला को दान कर दिया था—यह संदेश देते हुए कि “मानवता की सेवा मृत्यु के बाद भी संभव है।”
वे केवल एक कलाकार नहीं, बल्कि संवेदनाओं के सच्चे साधक थे। Lalit Kala Akademi में 14 वर्षों की उनकी सेवाएं, भाषा विभाग में उनका योगदान, और All India Radio Shimla (आकाशवाणी शिमला) में वायलिन वादन—ये सब उनकी समर्पित जीवन यात्रा के साक्षी हैं। लोक कला में उनकी आत्मा बसती थी, और यही कारण है कि वे लोगों के दिलों में हमेशा बसेंगे।
उनके सहयोगी ओम प्रकाश शर्मा  शगीन से ने भावुक शब्दों में कहा कि “मदन गौतम का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि एक युग का अंत है। उनकी कमी कभी पूरी नहीं हो सकेगी।”
मदन गौतम ने अपने जीवन से यह सिखाया कि सच्ची महानता केवल जीने में नहीं, बल्कि जाने के बाद भी दूसरों के काम आने में है। उनका देहदान एक दीपक की तरह है, जो आने वाली पीढ़ियों को मानवता और सेवा का मार्ग दिखाता रहेगा

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टॉफ़ी वाले मामू”—एक अपनापन, जो हमेशा जीवंत रहेगा

Shimla की गलियों में एक नाम ऐसा भी था, जो केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि अपनत्व, सादगी और मुस्कान का प्रतीक बन चुका था—मदन गौतम, जिन्हें हर कोई प्यार से “मामू” कहता था।

मामू सिर्फ एक कलाकार नहीं थे, वे लोगों के दिलों में बसने वाली एक भावना थे। उनकी एक अलग ही पहचान थी—वो अक्सर सभी को टॉफ़ी देते थे। यह छोटी-सी मिठास भरी आदत ही उन्हें सबसे अलग बनाती थी। बच्चे हों या बड़े, जो भी उनसे मिलता, उनके हाथ से मिली उस छोटी-सी टॉफ़ी में एक बड़ा सा स्नेह महसूस करता था।

शहर के लोग कहते हैं कि “मामू से मिलना मतलब मुस्कान मिलना।” उनकी जेब में हमेशा टॉफ़ियां रहती थीं और दिल में अपार प्रेम। शायद यही वजह थी कि वे केवल नाम से नहीं, बल्कि रिश्ते से “मामू” बन गए थे—हर किसी के अपने।

आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तो उनकी दी हुई टॉफ़ियों की मिठास और उनकी मुस्कान लोगों की यादों में घुल गई है। उनका जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि उस सहज अपनापन का खो जाना है, जो आज के समय में बहुत दुर्लभ होता जा रहा है।

लेकिन उनकी यादें, उनका स्नेह और उनका दिया हुआ छोटा-सा प्यार—ये सब उन्हें हमेशा जीवंत बनाए रखेंगे। सच में, “टॉफ़ी वाले मामू” अब सिर्फ यादों में नहीं, बल्कि हर उस मुस्कान में जिंदा रहेंगे, जो उन्होंने कभी बांटी थी

Deepika Sharma

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