“सरकारी शिक्षक या ‘सुरक्षित नौकरी क्लब’? शिक्षा पर सियासत और जिम्मेदारी से भागता तंत्र”
“तनख्वाह बढ़ती रहे, पर प्रदर्शन पर सवाल न उठे” “ज्ञान घटे, लेकिन सुविधा बढ़े”

हिमाचल की शिक्षा व्यवस्था आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां सबसे बड़ा सवाल किताबों का नहीं, नियत और जवाबदेही का है।
हाल ही में सदन से एक विपक्षी विधायक का यह बयान सामने आता है कि—“किसी भी विषय की परीक्षा को एक समय के बाद पास करना असंभव होता है। ” अजीब विडंबना है। डॉक्टर, इंजीनियर और अन्य स्किल्ड लेबर समय के साथ बेहतर होते हैं और हम सब और विधायक महोदय भी एक वरिष्ठ डॉक्टर से ही इलाज करवाना चाहेंगे, पर ऐसे में क्या हमारे सरकारी शिक्षक समय के साथ बेहतर हो रहे हैं जिनके पास एक गरीब और मजबूर के अलावा कोई और विशेषकर विधायक महोदय अपने बच्चों को भेजना चाहेंगे — या सिर्फ तनख्वाह और पेंशन ही बेहतर हो रही है ?
यह बयान सिर्फ एक विचार नहीं, पूरे शिक्षा तंत्र पर अविश्वास की मुहर है। और दुखद यह कि कुछ नेता भी इसमें कूद पड़ते हैं—सिर्फ राजनीति के लिए। न शिक्षा से मतलब, न बच्चों के भविष्य से।
सवाल कड़ा है, लेकिन ज़रूरी है—क्या यह तर्क एक सामान्य व्यक्ति के लिए है, या उस शिक्षक के लिए भी लागू होता है जिसने जीवन भर उसी विषय को पढ़ाया और पढ़ा है? अगर एक शिक्षक, जो रोज़ उसी विषय से जुड़ा है, समय के साथ उसे पास नहीं कर सकता गौर कीजिएगा बात केवल पास करने की हो रही है टॉप करने या डिस्टिंक्शन की नहीं —तो इससे बड़ा दुर्भाग्य इस देश के लिए क्या हो सकता है?
सच्चाई कड़वी है।
सरकारी शिक्षक बनने का सपना आज कई लोगों के लिए “राष्ट्र निर्माण” नहीं, बल्कि “स्थायी नौकरी, बढ़ती तनख्वाह और सीमित जवाबदेही” बन चुका है। और विडंबना देखिए— जो शिक्षक सरकारी स्कूलों में पढ़ाते हैं, वही अपने बच्चों को निजी बड़े स्कूलों में भेजते हैं। अगर उन्हें खुद अपने पढ़ाने पर भरोसा नहीं, तो समाज क्यों भरोसा करे? अब जब सरकार शिक्षा में CBSE जैसे मानकों को लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाती है, तो सबसे ज़्यादा विरोध वहीं से क्यों आता है, जहां से सुधार की उम्मीद की जाती है? तो यह विरोध शिक्षा के स्तर को बचाने का है…या फिर जवाबदेही से बचने का? और इस पूरी बहस को और नीचे गिराता है, कुछ नेताओं का हस्तक्षेप, जो शिक्षा जैसे गंभीर विषय को भी सिर्फ राजनीति का अखाड़ा बना देते हैं।
“तनख्वाह बढ़ती रहे, पर प्रदर्शन पर सवाल न उठे”, “ज्ञान घटे, लेकिन सुविधा बढ़े” क्या यही नया मॉडल है?
सीधा सवाल है—क्या यह राष्ट्रहित में है? या हम आने वाली पीढ़ी के साथ एक खतरनाक समझौता कर रहे हैं?
आखिरी सवाल—क्या हम अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित हाथों में दे रहे हैं, या सिर्फ एक व्यवस्था को ढो रहे हैं?
सोचिए… और जवाब मांगिए। क्योंकि अगर आज भी हम चुप रहे, तो कल इतिहास पूछेगा—“जब शिक्षा कमजोर हो रही थी, तब आप किसके साथ खड़े थे?”
“हिमाचल में बेहतर परिणाम के बावजूद घटता भरोसा—आखिर समस्या कहाँ है?”
हिमाचल प्रदेश को अक्सर शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर राज्यों में गिना जाता है। रिपोर्ट्स भी यही कहती हैं—रीडिंग लेवल अच्छा है, इन्फ्रास्ट्रक्चर ठीक है। लेकिन जमीनी सच्चाई एक अलग कहानी कहती है। सरकारी स्कूलों में एनरोलमेंट लगातार घट रहा है कई स्कूलों में बच्चों की संख्या इतनी कम है कि उन्हें मर्ज करना पड़ रहा है रिमोट क्षेत्रों में आज भी टीचर शॉर्टेज एक बड़ी समस्या है क्योंकि अधिकतर सचिवालय और सत्ता पक्ष में अच्छी पैंठ रखने वाले शिक्षक और कुछ मेडिकल ग्राउंड पर बड़े शहरों कस्बों में ही अजीवन सेवाएं देते हैं और वहीं से रिटायर होते हैं ! सवाल यह है— अगर सब कुछ ठीक है, तो लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों से क्यों हटा रहे हैं? यह सिर्फ परसेप्शन नहीं, **विश्वास (ट्रस्ट) का संकट** है।
ASER जैसे सर्वे बताते हैं कि— बच्चे स्कूल में हैं, लेकिन लर्निंग गैप मौजूद है बुनियादी गणित और रीडिंग में अभी भी कमी है अब इस पूरी बहस के बीच एक बयान आता है— “समय के बाद किसी भी विषय की परीक्षा पास करना कठिन हो जाता है।” तो क्या यह बात उस शिक्षक पर भी लागू होती है जिसने जीवन भर उसी विषय को पढ़ाया है? अगर हाँ, तो यह सिर्फ एक बयान नहीं— **पूरे शिक्षा तंत्र की विफलता का प्रमाण है।** और अगर नहीं, तो फिर यह तर्क दिया ही क्यों जा रहा है? एक और कड़वी हकीकत— बड़ी संख्या में सरकारी शिक्षक अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाते हैं यह सवाल उठाना गलत नहीं— क्या यह अपने ही सिस्टम पर अविश्वास नहीं है? अब जब सरकार CBSE जैसे मानकों को लागू करने की बात करती है, तो विरोध क्यों? क्या यह सुधार के खिलाफ लड़ाई है या जवाबदेही से बचने की कोशिश? और इस पूरे मुद्दे को और जटिल बना देता है राजनीतिक हस्तक्षेप, जहां शिक्षा भी वोट बैंक का हिस्सा बन जाती है।*बिना सख्त सुधार और जवाबदेही के शिक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं हो सकती।** अब सवाल जनता के सामने है— क्या हम वास्तविक सुधार चाहते हैं, या फिर इसी व्यवस्था के साथ समझौता? क्योंकि निर्णय आज होगा, असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा।
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