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असर संपादकीय; कर्ज की मार, क्या करे सरकार

रिटायर्ड मेजर जनरल एके शोरी की कलम से..

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हिमाचल प्रदेश की वित्तीय स्थिति देश के किसी भी अन्य राज्य की तरह ही है या हम कह सकते हैं कि यह हमारे देश की तरह है। जब आय कम होती है और व्यय अधिक होता है, जब पहले से लिए गए ऋण पर ब्याज के लिए हर साल एक बड़ी राशि का भुगतान करना पड़ता है, जब मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ्त योजनाओं की घोषणा की जाती है और उन्हें लागू किया जाता है, जब आय के स्रोत घटने लगते हैं, जब मुद्रास्फीति की प्रवृत्ति के अनुसार आवश्यक वस्तुओं पर खर्च कम या स्थिर हो जाता है, तो क्या होता है? जब दीर्घकालिक दृष्टिकोण न हो केवल एक अल्पकालिक योजना हो, क्योंकि पांच साल के बाद सरकार रहेगी भी नहीं इसका किसी को पता नहीं, जब राज्य के समग्र आर्थिक स्वास्थ्य को सुधारने के लिए सभी राजनीतिक दलों के बीच कोई आम एजेंडा नहीं है, जब व्यय वास्तविक पर कम दिखावे पर अधिक होते हैं, तो राज्य का क्या होता है? जब आमदनी अठन्नी हो और खर्चा रुपया हो, जब एक हाथ में जो कुछ भी आये, दूसरे हाथ से दोगुना निकल जाये, जब लक्ष्य और उद्देश्य संकीर्ण हों, स्वार्थ पूर्ण हों, जब भ्रष्टाचार व्याप्त हो तो राज्य का क्या होगा?
प्रिय पाठकों, इन सभी सवालों के जवाब तो आप सभी जानते हैं, हालाँकि मैं आपके ध्यान में लाने के लिए महत्वपूर्ण आँकड़े भी साझा कर रहा हूँ। वित्तीय वर्ष 2024-25 और 2025-26 के बजट पर नजर डालें तो घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। राजस्व खाते में घाटा बहुत अधिक है, जो 4, 51, 394 (लाखों में) से बढ़कर 6,49, 620 हो गया है। सार्वजनिक ऋण भी काफी हद तक 7,43,000 से 8,13,347 (लाखों में) बढ़ गया है। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने 17 मार्च, 2025 को वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए राज्य का बजट पेश किया। बजट की मुख्य विशेषताएं ▪ 2025-26 के लिए हिमाचल प्रदेश का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) (मौजूदा कीमतों पर) 2,55,636 करोड़ रुपये होने का अनुमान है, जो 2024-25 की तुलना में 10% की वृद्धि है। ▪ 2025-26 में व्यय (ऋण चुकतीं को छोड़कर) 52,709 करोड़ रुपये होने का अनुमान है, जो 2024-25 के संशोधित अनुमान से 11% कम है। इसके अलावा राज्य को 5806 करोड़ रुपये का कर्ज भी चुकाना होगा। आंकड़े हैरान कर देने वाले होंगे, बजट में अनुमान पेश किए जाते हैं लेकिन वित्तीय वर्ष के बाद जब हकीकत सामने आती है तो असली तस्वीर सामने आती है और अब तक जो तस्वीर सामने आई है वह है कर्ज बढ़ना, घाटा बढ़ना।
मैं विस्तृत आँकड़ों का चित्र बनाने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ, बल्कि एक साधारण सी बात कह रहा हूँ कि क्या कोई राज्य बढ़ते कर्ज़ से बाहर आ सकता है, क्या कोई राज्य अपने राजस्व और आय को बढ़ाने के लिए कुछ कर सकता है? 2023 में भारी मानसून ने इसकी अर्थव्यवस्था, विशेष रूप से कृषि-क्षेत्र और पर्यटन को प्रभावित किया। पिछले साल अचानक आई बाढ़, बादल फटने और उससे जुड़े भूस्खलन, धंसाव और ढलान विफलताओं सहित चरम मौसम की घटनाओं ने इस क्षेत्र को तबाह कर दिया, जिससे राज्य भर में जान-माल की भारी क्षति हुई। पहाड़ी राज्य में कई समस्याएं हैं जिनमें आय के सीमित स्रोतों से लेकर भारी वेतन और पेंशन विस्तार तक शामिल हैं, मौसम प्रतिकूल तरीके से व्यवहार करता है जिससे बाढ़, फसल की विफलता, भूस्खलन, भारी बर्फबारी, बादल फटने के कारण बुनियादी ढांचे को नुकसान होता है। समस्याएं तो बहुत हैं लेकिन समाधान कहां है? हर सरकार पिछली सरकारों पर दोष मढ़ती है और सत्ता में आने पर वही पुरानी नीतियां अपनाती है जिससे समस्याएं और बढ़ जाती हैं। राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने के लिए उन्हें लॉलीपॉप दिखाते हैं और बढ़ते कर्ज को बढ़ावा देते हैं। दरअसल हर दल की सरकारें अपने आप को ऐसे जाल में फंसा चुकी हैं कि निकट भविष्य में इससे निकलना नामुमकिन है। खर्चों में कटौती करने के लिए सरकारों को मुफ्त योजनाओं पर विस्तार कम करना होगा जो कोई भी सरकार नहीं करेगी क्योंकि मुफ्त योजनाओं पर ही सरकारें मतदाताओं को सपनों की दुनिया दिखाकर सत्ता में आती हैं। आय बढ़ाने के लिए सरकार को करों और शुल्कों में वृद्धि करनी होगी जो पहले से ही बहुत अधिक हैं और यदि ऐसा किया गया तो सरकारों को लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ेगा।
राज्य की ऋण यात्रा – 2010 में ₹15,830 करोड़ से आज लगभग ₹1 लाख करोड़ तक – बढ़ती देनदारों और सिकुड़ती राजकोषीय गुंजाइश की एक स्पष्ट कहानी बताती है। ब्याज भुगतान और ऋण पुनर्भुगतान पर खर्च प्रत्येक 100 रुपये में से 12 रुपये और 10 रुपये इसी पर हो जाता है। मैं जो सोचता और महसूस करता हूं वह यह है कि कर्ज से बाहर आना ही इसका एक समाधान है। जरा सोचिए, अगर यह न हो तो राज्य सरकार विकास क्षेत्रों पर ज्यादा से ज्यादा खर्च कर सकती है, टैक्स भी कम कर सकती है। फिर सवाल आता है कि ये कैसे होगा? कृपया ध्यान से, तर्कसंगत और तार्किक रूप से सोचें, यदि ऋण ऋण माफ कर दिए जाएं तो क्या होगा? यह कैसे होगा यह तो एक बात है लेकिन अगर ऐसा हुआ तो क्या होगा? क्या सरकार, सत्ता में हो और विपक्ष में कोई भी पार्टी हो, इस बात पर सहमत होगी, वादा करेगी और प्रतिबद्ध होगी कि भविष्य में मतदाताओं को लुभाने के लिए कोई मुफ्तखोरी नहीं होगी, कोई सस्ते राजनीतिक हथकंडे नहीं होंगे, शिक्षा, स्वास्थ्य, लघु उद्योगों पर धन खर्च किया जाएगा, छोटे और सीमांत किसानों को सस्ते उर्वरक और इसी तरह की अन्य वस्तुओं की मदद की जाएगी और आर्थिक दृष्टिकोण से कई कदम उठाए जाएंगे कि किसी भी लोकलुभावन योजना के नाम पर खुलेआम धन वितरित न किया जाए? क्या ऐसी कोई प्रतिबद्धता हो सकती है कि भविष्य में कभी भी कोई ऋण नहीं लिया जाएगा, परिस्थितियाँ कुछ भी हों, विज्ञापनों, समारोहों, दौरों, बैठकों आदि के रूप में कोई व्यर्थ व्यय नहीं किया जाएगा?
आइए हम अपनी सहायता के लिए अपनी दैवीय शक्तियों के पास जाएं। इस भूमि को देवभूमि कहा जाता है तो फिर देव की सहायता क्यों न ली जाए? आइए हम सभी मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों और इसी तरह के अन्य धार्मिक स्थानों और डेरों में जाकर उन से प्रार्थना करें कि वे अपने खजाने खोलें और उनके पास पड़ी संपत्ति को सरकार को कर्ज और उधारी चुकाने के लिए स्वतंत्र रूप से सौंप दें। क्या ऐसा संभव है? अगर ऐसा होता है तो क्या वो भी हो सकता है इसके एवज में नेताओं से जिसके बारे में मैंने अभी बात की है ? पाठक गण, यदि आप मुझसे पूछें तो हृदय से यही उत्तर मिलेगा कि न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी। इस देश व् राज्य की गाड़ी इसी तरह से रेंग रेंग कर चलती रहेगी। इस अँधेरी रात में मुझे कोई आशा की किरण नज़र नहीं आती।

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Deepika Sharma

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