सम्पादकीय

असर संपादकीय: दिशा और दशा तय करने का समय

डॉ. निधि शर्मा (स्वतंत्र लेखिका)की कलम से

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आज की युवा पीढ़ी स्वयं को अपने में नहीं बल्कि दूसरों के नज़रिए से खोजने में लगी हुई है । वो नज़रिया जो उसकी पब्लिक इमेज तो बनाता है जबकि उसकी आंतरिक खोज अधूरी सी रह जाती है । कभी भीड़ में बड़ी-बड़ी लाइनों के बीच खड़े होकर उस भीड़ का हिस्सा बनना उसे अच्छा लगता है क्योंकि हर व्यक्ति उसी ओर चलना चाहता है । लेकिन ये मनोदशा युवा पीढ़ी के लिए अच्छी नहीं है । ये वो वर्ग है जिसकी तरफ नन्हा सा बालक और अधेड उम्र में खड़ा हर व्यक्ति देख रहा है क्योंकि उसका हर कदम किसी के लिए रोल मॉडल तो किसी के लिए आशा हो सकता है ।  

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जब स्कूल से निकलकर लाखों युवा बच्चे कॉलेज व यूनिवर्सिटी की दहलीज़ पर अपने और अपनों के सपनों के साथ कदम रखते हैं तो कई चुनौती पूर्ण पड़ाव उन्हें पार करने पड़ते हैं । इन हर पड़ावों पर फोकस रहना और अपनी दिशा तय करना, युवाओं के लिए आज के समय में सबसे बड़ा काम है । यकीन मानिए अगर भाग्य में मंजिल की ओर लंबी दूरी की रेलगाड़ी चल भी पड़ती है उसके बीच आने वाले लघु विरास जैसे भटकाव, नशा, नकारात्मकता, फोकस का टूटना, तनाव, अवसाद, सामाजिक-पारिवारिक दवाब और डिजिटल दुनिया में खो जाना आदि उनकी यात्रा में रूकावट पैदा कर सकते हैं और अक्सर करते हैं ।

इन उपरोक्त पलूओं में भटकाव वो कारक है जो युवा को गलत संगत में डालकर नशे में धकेल रहा है । अक्सर उन युवाओं के प्रति समाज का नज़रिया कि हमें क्या लेना है ? तब तक जब तक आग अपने घर ना पहुँच जाए, उस असोचनिए वर्ग को भी सवालों के कटघरे में खड़ा करता है । सबसे बड़ा डर उन परवाज़ों के लिए कि उनके इर्द-गिर्द वैज्ञानिक सोच की जगह अनैतिक धर्म व जाति की सोच पैदा की जा रही है जो उनके अंदर सामाजिक-पारिवारिक अड़चने पैदा कर रहा है । ये दवाब इतना बड़ा है कि उनके सोचने व समझने की शक्ति को अक्षुण्ण कर रहा है । समाज जिसे इस तरूण पीढ़ी को सजाना व संवारना चाहिए, वही कभी-कभी भटकाव पैदा कर देती है ।  

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इसके अलावा सबसे बड़ी परीक्षा डिजिटल परछाई से मुक्त कराने की है । युवा वर्ग का सुबह उठना-बैठना, खाना-पीना, आहार-व्यवहार और चाल व चलन सिर्फ सोशल मीडिया नियंत्रित कर रहा है । डिजिटल क्रांति का आगाज़ देश में वर्ष 2000 के बाद हुआ, उसके बाद पैदा हुए जेन जी कब इस मीडिया के आदी हो गए पता भी नहीं चला । सोशल मीडिया के कारण युवा वर्ग में आई मानसिक व शारीरिक अक्षमता ने इस मीडिया के आत्म मंथन पर जोर दे दिया है । बेशक आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस ने इस विश्लेषण को और व्यापक करने की रूपरेखा को तवज्जो दी हो जो सामाजिक व राजनैतिक तौर पर सोचनीय विषय है । बड़े-बड़े विकसित देश जैसे आस्ट्रेलिया, फ्रांस, इटली, नीदरलैंड्स व दक्षिण कोरिया में स्कूल-स्तर पर मोबाइल फोन पर सख्त प्रतिबंध लगाए गए हैं । हमारे देश में भी 16 साल से कम उम्र के बच्चों में ये कानून सख्ती से लागू किया जाना चाहिए ।  

लेकिन फिर वही सवाल की कानून तो सिर्फ बनाने के लिए बनाए जाते हैं लेकिन युवाओं में इन चुनौतियों का सामना करने का आत्मिक नियंत्रण होना चाहिए। 

यद्यपि हर नज़र व आशा सिर्फ युवाओं से की जाए वो भी अच्छा नहीं । समाज को भी उन नवयुवकों को आबाद करने के लिए अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी । हर आशा व निराशा उस तबके से हटाकर सामूहिक होनी चाहिए ताकि वो सारा भार सिर्फ उस जोशिले वर्ग तक ना पहुँचे जो अभी-अभी उड़ना सीख रहे हैं ।  आशा कीजिए उनकी उड़ान काफी ऊँची होगी अगर राह में पड़ने वाले पड़ाव साकारात्मक, दवाब रहित होगें । याद रखिए जैसे हम बीज बोएंगें, वैसी ही तो फसल पैदा होगी ।

Deepika Sharma

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