

रिटायर्ड मेजर जनरल एके शौरी
वहशी दरिंदे, हिंसक जानवर कौन हैं, क्या इंसान हैं? नहीं. क्या वे राक्षस हैं, हाँ। यह प्रश्न मैं उन पाठकों के समक्ष रख रहा हूँ जो माता-पिता हैं और अपनी प्यारी बेटियों और बहनों के भाई हैं। यदि राक्षस, दरिंदे बेटियों और बहनों को कोई हानि पहुँचाएँ, तो उनके साथ किस प्रकार का व्यवहार किया जाना चाहिए?
यदि वे उन्हें शारीरिक क्षति पहुंचाते हैं, मानसिक यातना देते हैं तो क्या उन्हें किस तरह से दंडित किया जाना चाहिए? अपनी फूल से बेटियों और बहनों को हम बहुत ही लाड, प्यार और स्नेह के साथ पालते हैं, हम सुनिश्चित करते हैं कि उन्हें कभी कुछ न हो, उन्हें मामूली सा काँटा भी न चुभ जाए और यदि कोई जंगली जानवर उनके शरीर पर क्रूर बल से अत्याचार करता है, तो हम इसे कैसे सहन कर सकते हैं? क्या हम इस बात का एहसास कर सकते हैं कि जब उन पर बेरहमी से हमला किया गया, उन्हें घायल किया गया और मार दिया गया, तो उन्हें कितना दर्द और पीड़ा हुई होगी? ऐसे कृत्य करने वाले राक्षसों को हिरासत में रख कर कई वर्षों तक मुकदमा चला कर और तरह के तर्क दे कर ज़िंदा रहने देना चाहिए? और अगर कोई सबूत नहीं है, कोई उचित अभियोजन नहीं है, मामला कमजोर हो गया है तो क्या उन्हें इन आधारों पर छूट जाने दिया जाना चाहिए? यदि कोई शिक्षक स्कूल में बच्चे को थप्पड़ मार दे, डांट-फटकार दे, अभिभावक दौड़ पड़ते हैं विरोध करने के लिए , तो फिर माता-पिता बेटियों पर अमानवीय अत्याचार कैसे सहन कर सकते हैं?
मैं हाल ही में कोलकाता में हुई घटना के संबंध में बात कर रहा हूँ। निर्भय, गुड़िया से लेकर वर्तमान तक, ये दरिंदे कब तक बलात्कार और अत्याचार करते रहेंगे? भारत में बलात्कार और यौन हिंसा एक बड़ी समस्या है। अधिकांश बलात्कार पीड़ितों की आयु 18 वर्ष से 30 वर्ष के बीच है। तीन में से एक पीड़िता 18 साल से कम उम्र की है और दस में से एक बलात्कार पीड़िता 14 साल से कम उम्र की है। भारत में हर 20 मिनट में एक महिला के साथ बलात्कार हो रहा है और हम दावा करते हैं कि इस देश में महिलाओं को देवी की तरह पूजा जाता है. महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में नवरात्र के दिन भी अपवाद नहीं हैं। महिलाओं के साथ छेड़ छाँड़ करना, उनपर भद्दे कमेंट कसना, उनके सामने ही गालियां बकना तो जैसे एक मामूली सी बात हो गई है। मुख्य मुद्दा यह है कि जब अपराधी दबाव और खींचतान, अत्यधिक लचीली कानूनी प्रक्रिया और मुकदमों में असामान्य देरी के कारण छूट जाते हैं, तो उन्हें लगता है कि यह एक सामान्य दिनचर्या की बात है।
कुछ मामलों में अदालतें रात में भी बैठती हैं, अगर कोई मशहूर हस्ती शामिल हो तो फिर महिलाओं के खिलाफ अपराधों और वह भी बलात्कार जैसे मामलों की जांच के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन क्यों नहीं किया जा सकता है? बलात्कार एक महिला के लिए शारीरिक, सामाजिक और मानसिक रूप से चरम अपमान और यातना है, फिर अपराधियों को भी ऐसी ही सजा क्यों नहीं दी जाती है? बलात्कारी केवल एक ही सज़ा का हकदार है और वो है मौत की सज़ा, इससे कम कुछ भी नहीं। मानवता, सुधारवादी भावना, पश्चाताप, सुधार का अवसर आदि के नाम पर कोई भी घटिया बहाना नहीं हो सकता। ये सभी उन अपराधियों के लिए सुरक्षा वाल्व हैं। जो लोग ऐसी सुधारवादी और किताबी बातें करते हैं और बलात्कारियों की वकालत करते हैं उन्हें पहले अपनी मां-बहनों को सामने रखकर सोचना चाहिए। बलात्कार में वास्तविक अपराधी एक ही होता है लेकिन उसके कई सहयोगी भी होते हैं जिन्हें तदनुसार दंडित किया जाना चाहिए। वे उसके माता-पिता, दोस्त, शुभचिंतक या कोई भी व्यक्ति हो सकते हैं, जिन्होंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनके जीवन में परिस्थितियाँ बनाने में, उनके पालन-पोषण को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दूसरे शब्दों में, बलात्कारी के अलावा उसके परिवार को भी दंडित किया जाना चाहिए। बलात्कारियों और उसके सहयोगियों, उसका समर्थन करने वाले या बचाव करने वाले लोगों को सार्वजनिक रूप से बेनकाब किया जाना चाहिए, उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाना चाहिए और आर्थिक रूप से दंडित किया जाना चाहिए। निस्संदेह, यह तभी संभव है जब अपराधी को दोषी पाया गया हो और इसके लिए मामले को निपटाने के लिए निश्चित समय सीमा वाली फास्ट ट्रैक अदालतें समय की मांग हैं। ऐसे कई देश हैं जहां ऐसी घटनाएं नहीं होती हैं और अगर कभी संयोगवश हो भी जाती है, तो सजा की मात्रा इतनी होती है कि दूसरों के मन में डर का माहौल पैदा हो जाता है। लेकिन हमारे देश में भ्रष्टाचार, धन बल, बाहुबल, दबाव समूह, उदार वादी सोच वाले लोग, समाज में ऐसे कितने ही अंग हैं जो बलात्कारियों के लिए जेलों में आराम से समय बिताने की स्थिति पैदा करते हैं। कानून-व्यवस्था मजाक बन गई है और राजनीतिक दल पीड़ितों का समर्थन करने के बजाय केवल अपने कार्यकर्ताओं का बचाव करते हैं। कानून का डर नहीं हो तो राज्य में जंगलराज जैसा हो जाता है और यही हो रहा है और इसका मुख्य कारण यह है कि जिन पर कानून और व्यवस्था की रक्षा करने और उसे बनाए रखने की जिम्मेदारी है, वे या तो राजनीतिक मजबूरियों या दबाव समूहों के कारण या स्वयं भ्रष्ट होने के कारण अपने कर्तव्यों में विफल हो रहे हैं। 
बलात्कारियों को समय सीमा के अंदर सजा मिलनी चाहिए, सजा सिर्फ मौत की होनी चाहिए, इससे कम की सजा नहीं होनी चाहिए। उनकी संपत्ति जब्त कर ली जाए, उनके आश्रितों को दैनिक जीवन-यापन के लिए केवल एक निश्चित वजीफा दिया जा सकता है। यदि हमें महिलाओं को जंगली, वहशी दरिंदों से बचाना है तो उसने साथ ऐसा ही क्रूर व्यवहार करना होगा ताकि समाज में एक मैसेज जाए और दूसरों के लिए एक चेतावनी।


