सम्पादकीय

असर संपादकीय: Covid-19 महामारी में बचाव व सुरक्षा के लिये इस्तेमाल वैक्सीन ‘कोविशील्ड’ के बारे में अब हुई चर्चा

डॉ.रमेश चंद ( शिमला )की कलम से

WhatsApp Image 2026-02-05 at 5.59.45 PM

आज देश भर में Covid-19 महामारी में बचाव व सुरक्षा के लिये इस्तेमाल वैक्सीन ‘कोविशील्ड’ के बारे चर्चाओं का बाज़ार गर्म है, आम लोगों में असमंजस और डर सा पैदा हो रहा है, यह वैक्सीन ग़लत थी या इसके दुष्प्रभाव ब्लड क्लोटिंग या थ्रोम्बस के बारे बहुत कंफ्यूजन का वातावरण है ….
पूरे देश में लगी, विदेशों में भी डरे सहमे लोगों ने अपनी और अपनों की सुरक्षा के लिये इसकी तत्कालीन गाइड लाइनज के अनुसार कोविशील्ड लगाई और लगवाई और अपने आपको सुरक्षित महसूस किया।
इत्तेफ़ाक से या इस वैक्सीन का असर था या ईश्वर मेहरबान हुआ धीरे-धीरे कोविड-19 महामारी दुनिया भर में लाखों करोड़ों बेशकीमती जिंदगीयां लील कर, अपना बेरहम मौत का तांडव दिखा कर कम ज़रुर हुआ था!
जो भी हुआ दुनिया भर में बड़े बड़े वैज्ञानिक, चिकित्सक, चिंतक, ज्ञानी सभी देखते रह गये और पूरे विश्व के लगभग सभी देश इस अभूतपूर्व वैश्विक महामारी की चपेट में आ गये, कोई इंतजाम नहीं था, कोई ईलाज नहीं था कोई व्यवस्था नहीं थी मतलब इतनी बड़ी जानलेवा महामारी के लिये कोई भी तैयार नहीं था!
यह पूरी मानवता के लिये ‘वज्रपात’ से कम नहीं था !
जब बीमारी की दहशत फैली कई तरह के दौर आये!
एतिहासिक लॉक डाउन हुआ ,
मिलना जुलना बंद हुआ, हाथ मिलाना गले मिलना बंद हुआ, मास्क लगे, सेनिटाईजर का बेइंतिहा इस्तेमाल हुआ, हाथ धो धोकर लोगों ने अपनी हस्तरेखायें मिटा दीं…
बसें,स्कूल,दफ़्तर, ट्रेन, हवाई यात्राएं महिनों सालों बंद की गयीं पर कोरोना फिर भी बेरहमी से फैलता गया,
ईलाज कोई नहीं था, बचाव के लिये बहुत प्रयास हुये समझा कर, जागरूकता अभियान चला कर, कानून का डंडा चला कर,शाम दाम दंड भेद सब किया!
ईलाज और बचाव के नाम पर हाइड्रोकसी क्लोरोक्वीन का नाम आया लोगों को खिलाई, देश में भी और विदेशों में भी! इन गोलियों की लूट पड़ गयी लोग डर के मारे इन कड़वी गोलियों को चने की तरह खाने खिलाने लगे!
अमेरिका भी हिन्दुस्तान से यह कड़वी दवा ले के गया!
बाद में पता चला ये इस जानलेवा बीमारी में प्रभावशाली नहीं है!
कई तरह के काढ़े ,जड़ी-बूटियों का प्रचलन भी आया ,
दुनिया भर के अस्पताल खोले गये, मेक शिफ्ट अस्पताल बने, बड़े बड़े हॉल, धार्मिक संस्थानों को भी अस्पतालों में परिवर्तित किया गया,
ऑक्सीजन प्लांट, कंसंट्रेटर, वेंटिलेटर, पीपी किट्स,मास्क,ग्लब्ज का प्रबंध करना ,नये स्टाफ, कर्मचारियों को लगाना और दहशत भरे माहौल में सारी व्यवस्था सुचारू रूप से चलाना कोई आसान काम नहीं था !
बीचों बीच में कुछ महंगी दवाओं के नाम भी आये जैसे रेंमडेशीवीर …जिसके लिए दुनियाभर की मारामारी हुई… बाद में इसका भी पता चला यह भी असरदार नहीं थी !
कोरोना अपनी बेरहम चाल चलता रहा, अपना काम करता रहा …
सरकार लगातार सतर्क रही,लगातार प्रयास हुये!
असीमित प्रबंध किये गये !
जो भी दुनिया में कहीं नयी खोज हुई नया इलाज़ आया, वहीं प्रबंध हमारे यहां भी रातोंरात किये जाते रहे !
अस्पतालों में, अस्पतालों के बाहर, जान पर खेल कर चिकित्सकों ने, अस्पतालों में कार्यरत कर्मचारियों ने ,सामाजिक संस्थाओं ने समाज के हर वर्ग ने,अपनी-अपनी क्षमता के अनुरूप सभी ने दिन- रात अपनी-अपनी सेवाएँ दीं,
बाद में बचाव के टीके आये ..डरे सहमे लोगों को जब यह लगे तो लोगों ने खुद को सुरक्षित समझा और हुये भी ,क्योंकि जैसा मैंने शुरू में लिखा है इसके बाद बीमारी ख़त्म हुई है-
यह टीके का असर था या फ़िर इत्तेफाक !!!

No Slide Found In Slider.
No Slide Found In Slider.

कुल मिलाकर यह वाईरस कैसे आया, कैसे गया,कैसे थमा, किसको छोड़ा, किसको ले गया– यह अब भी प्रश्न चिन्ह ही है !!!
जो भी हो, अब टेंशन न लें …

 

Deepika Sharma

Related Articles

Back to top button
Close