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हैरानी: हिमाचल मानवाधिकार आयोग अपना दायित्व निभाने में नाकाम

विश्व मानवाधिकार दिवस पर उमंग फाउंडेशन का वेबीनार

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उमंग फाउंडेशन जल्द ही खामियां उजागर करेगा

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। विश्व मानवाधिकार दिवस पर उमंग फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रो. अजय श्रीवास्तव ने एक वेबीनार में आरोप लगाया कि राज्य मानवाधिकार आयोग अपना दायित्व निभाने में नाकाम साबित हो रहा है। उन्होंने कहा कि शीघ्र ही संस्था एक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाकर आयोग की खामियों को उजागर करेगा।

प्रो. अजय श्रीवास्तव ने कहा कि मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 के अंतर्गत गठित राज्य आयोग पूरी तरह से एक सरकारी दफ्तर की तरह काम कर रहा है और उसे समाज के सबसे कमजोर वर्गों के मानवाधिकार संरक्षण की कोई चिंता नहीं है।

वेबीनार में 50 से अधिक युवाओं और विशेष कर हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के पीएचडी स्कॉलर्स ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता भारतीय चुनाव आयोग की ब्रांड एंबेसडर, बेहतरीन दृष्टिबाधित गायिका और शिमला के आरकेएमवी कॉलेज की असिस्टेंट प्रोफेसर मुस्कान ने की।

अपने व्याख्यान में प्रो अजय श्रीवास्तव ने कहा की हिमाचल प्रदेश में सबसे अधिक मानवाधिकार उल्लंघन बेसहारा मनोरोगियों, बेघर बुजुर्गों, बेसहारा महिलाओं अनाथ एवं तस्करी कर यहां लाए गए बच्चों, दलितों और दिव्यांगजनों का हो रहा है। समाज में जागरूकता फैलाना राज्य मानवाधिकार आयोग का कानूनी दायित्व है। लेकिन आयोग ने पिछले कई वर्षों से इस दिशा में कोई अभियान नहीं चलाया।

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बेसहारा मनोरोगियों को पुलिस बार-बार शिकायत करने के बावजूद कानून के अनुरूप रेस्क्यू नहीं करती है। बेघर महिलाओं और बेसहारा बुजुर्गों को नारी सेवा सदन और वृद्ध आश्रम में भरती कराने के लिए अनेक मुश्किलें पेश आती हैं। बेसहारा मनोरोगियों, बुजुर्गों व महिलाओं की पहचान आधार कार्ड के जरिए स्थापित करने का कोई प्रबंध नहीं है। तस्करी कर प्रदेश में लाए गए बच्चों के मामले उजागर होने पर पुलिस मानव तस्करी की धाराओं में केस दर्ज नहीं करती।

उन्होंने कहा की दृष्टिबाधित एवं अन्य दिव्यांग बच्चों की पढ़ाई के लिए शिक्षण संस्थानों में न तो टॉकिंग सॉफ्टवेयर वाले कंप्यूटरों से लैस लाइब्रेरी है और नहीं रैंप तथा व्हीलचेयर का इंतजाम है। अक्सर स्कूलों में उन्हें दिव्यांगता के आधार पर दाखिला देने से इनकार कर दिया जाता है। मेडिकल एवं इंजीनियरिंग कॉलेज में हाई कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन करके विद्यार्थियों से फीस वसूली जाती है। दिव्यांग बच्चों के साथ भी अनेक स्कूलों में भेदभाव होता है और मिड डे मील में उन्हें अलग बैठाया जाता है।

प्रो. अजय श्रीवास्तव ने वेबीनार में प्रतिभागी युवाओं को दुर्बल वर्गों के मानवाधिकार उल्लंघन की पहचान करने के तरीके बताए। उन्होंने कहा कि संबंधित विभागों से यदि कोई सहयोग नहीं मिलता है तो राज्य मानवाधिकार आयोग को पत्र लिखें, मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से आवाज़ उठाएं। फिर भी कोई हल न निकलने पर हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को मानवाधिकार उल्लंघन के बारे में पत्र लिखें।

वेबिनार में प्रश्न पूछने वालों में टांडा मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस कर रही व्हीलचेयर यूजर छात्रा निकिता चौधरी, पीएचडी स्कॉलर संजय भैरव, चंडीगढ़ की वरिष्ठ पत्रकार सुमेश ठाकुर और शुभम शामिल थे।

कार्यक्रम के संचालन में सवीना जहां, उदय वर्मा, अभिषेक भागड़ा, मुस्कान, अंजना ठाकुर, विनोद योगाचार्य और प्रतिभा ठाकुर ने सहयोग दिया।

Deepika Sharma

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