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असर विशेष: क्या हिमाचल के सरकारी स्कूलों में है होनहारों का टोटा

क्या केवल निजी स्कूलों के छात्र ही रचते हैं परिश्रम और संघर्ष की कहनी और बन पाते हैं ब्रेन ऑफ़ हिमाचल

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जी हां आप सब सही पढ़ रहे हैं ऐसा ही कुछ दावा है एक राष्ट्रीय समाचार पत्र में दिए गए राजधानी के एक बड़े निजी संस्थान एस्पायर का ।

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संस्थान का दावा है के हिमाचल के 449 स्कूलों के 11670 विद्यार्थियों ने इसमें भाग लिया और गौरतलब हो के एक आध केन्द्रीय विद्यालय के छात्र को छोड़ सभी छात्र हिमाचल के बड़े निजी स्कूलों से हैं।

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हालांकि संस्थान द्वारा यह कहीं स्पष्ट नहीं किया गया है के क्या यह प्रतिस्पर्धा केवल निजी स्कूल के मेघावी छात्रों के लिए ही थी और अगर एसा था तो शिक्षा प्रदान करने वाले मंदिर का छात्रों को दो धड़ों में बांटने का क्या उद्देश्य ।
बहरहाल जिज्ञासा का विषय यह है के 8 हज़ार 8 सौ 28 करोड़ के बजट वाला हिमाचल का शिक्षा विभाग जिसमें एक मंत्री, एक सचिव, एक निदेशक, 15000 के लगभग कर्मचारी, 80000 हज़ार के लगभग शिक्षक जिनका मानदेय लगभग न्यूनतम 50000 रुपए से लेकर सेवा अवधि अनुरूप 1लाख से अधिक तक है और यदि छात्रों की बात की जाय तो 1500 के करीब माध्यमिक, 900 हाई और लगभग 2000 वरिष्ठ माध्यमिक स्कूलों में कुल मिलाकर 9 लाख 50000 छात्र पढ़ते हैं और दुर्भाग्यवश एक होनहार नहीं।
गौरतलब हो के एडीसी शिमला की उपस्थिति में आयोजित इस कार्यक्रम में टॉपर को एक लाख रुपए का इनाम भी दिया जाता है और संस्थान द्वारा ज्ञान की रोशनी फैलाए जाने की बात कही जाती है जिसकी सीमा केवल निजी स्कूलों की कक्षाओं तक सिमट कर रह जाती है । जिस समाज में बचपन में यदि बच्चे पैसों के लिए कोई खेल भी खेलते थे तो माता पिता उन्हें ऐसा करने से रोकते और व्यापार से परे उत्तम खेल भावना को अपनाने के लिए प्रेरित करते वहीं शिक्षा के क्षेत्र में पुरस्कार के रुप में मुद्रा वितरण निसंदेह शिक्षा के व्यापारीकरण के चिन्ह के रुप में धीरे धीरे स्थापित हो रहा है, अन्यथा एक समय था अवश्य एडीसी जी तथा इन संस्थानों के मैनेजिंग डायरेक्टर को याद होगा के कक्षा में अव्वल आने पर अक्सर बच्चों को ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी, जोनाथन लिविंगस्टन की सीगल, मुंशी प्रेमचंद की कहानियां भारतीय महापुरुषों की जीवनियों पर आधारित पुस्तकें तथा पेन इत्यादि पुरस्कारों से नवाज़ा जाता और छात्र जीवन भर उसे एक प्रेरणास्त्रोत स्मृति चिह्न के रुप संभाल कर रखते ।
परिश्रम और संघर्ष की कहानी लिखते ये बच्चे निश्चित ही होनहार हैं और ब्रेन ऑफ़ हिमाचल होने के नाते उन्हें और इनकी अभिभावकों को यह समझना होगा के क्या कहीं इन्हें किसी व्यापारिक दृष्टिकोण से किसी भी निजी संस्थान द्वारा अपने उज्ज्वल भविष्य के रुप में तो नहीं देखा जा रहा जो इन्हें सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले लगभग 9 लाख 50000 रईस छात्र जिनके जीवन में कोई परिश्रम और संघर्ष नहीं (ऐसा समाचारपत्र और संस्थान की टिप्पणियों से प्रतीत होता है) से केवल इसी आधार पर पृथक कर रहा है क्योंकी ये एक समृद्ध पृष्ठभूमि से हैं और एक अच्छे उपभोक्ता हो सकते हैं या फिर एक ख़ोज जिससे होनहारों का पहले से ही पता लगाया जा सके और उनके साथ अपना नाम जोड़ अपने व्यापार की नींव मज़बूत करने की कामना फलीभूत हो सके।
सोच की कसौटी ऐसे कई प्रश्नों को जन्म देती है के सामाजिक स्तर पर इस तरह की विषमताएं हमें किस ओर ले जाएंगी। क्या ऐसी प्राथमिकताओं के चलते क्या किसी भी तरह के नैतिक समाज का निमार्ण संभव होगा यदि हां तो वह निश्चित ही एक एसा समाज होगा जहां एक उपभोक्ता जो अपनी सम्पूर्ण शिक्षा की बोली लगाएगा और एक व्यापारी जो उस शिक्षा का प्रयोग केवल पूंजी अर्जित करने के लिए करेगा और शायद ही ऐसा समाज कोई तुलसीदास रविदास, नानक कबीर राजा राममोहन राय, गांधी, अंबेडकर, सरदार पटेल, सीवी रमण, कल्पना चावला या कलाम राष्ट्र को दे पाए।

Deepika Sharma

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