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EXCLUSIVE: सैंपल एक्सपायर के बाद आई आईजीएमसी इंजेक्शन की रिपोर्ट

साल बाद आई रिपोर्ट

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आईजीएमसी में इंजेक्शन से इन्फेक्शन होने के बाद जांच के लिए , लिए गिर सैंपल की जांच रिपोर्ट आखिर अब आ ही गई। इससे बड़ी हैरानी की बात और क्या हो सकती है कि साल बाद ये रिपोर्ट आई। रिपोर्ट तब आई जब इंजेक्शन के सारे सैंपल एक्सपायर्ड हो गए। साल बाद ये रिपोर्ट आई। यदि समय रहते रिपोर्ट आ जाती तो संबंधित इंजेक्शंस का इस्तेमाल आईजीएमसी में आसानी से कर लिया जाता लेकिन यह सभी इंजेक्शन अब एक्सपायर हो गए हैं और अब इन्हे फेंकना होगा।

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 स्वास्थ्य की दृष्टि से यह काफी अहम रिपोर्ट थी। ऐसा इसलिए क्योंकि इस सैंपल की जांच रिपोर्ट के बाद ही आगामी कार्रवाई होनी थी जो अभी तक तय नहीं हो पाई ।

 

 इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज शिमला भी इस रिपोर्ट का इंतजार करते रह गया वहीं जिला दवा निरीक्षण की टीम भी यह इंतजार कर रही थी आखिरी रिपोर्ट कब शिमला पहुंचेगी।

 

लगभग आठ माह से ऊपर का समय हो गया था इंजेक्शन के सैंपल की रिपोर्ट अभी तक शिमला नहीं पहुंच पाई थी।

बताया जा रहा है कि कुछ सैंपल पहले पुणे लैब को भेजा गया उसके बाद वहां से रिपोर्ट नहीं आई और सैंपल वापिस शिमला को भेज दिया गया था ,उसके बाद उस सैंपल को दोबारा कोलकाता भेजा गया लेकिन अब जाकर ये रिपोर्ट आई।

 

गौर हो कि हिमाचल में समय पर दवा जांच रिपोर्ट नहीं मिल पा रही है। हिमाचल की ही नहीं बल्कि हिमाचल से बाहर भेजे जाने सैंपल की रिपोर्ट भी काफी लंबित हो रही है।

 

 

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 क्या कर रही सरकार

 

अब सवाल यह उठा रहा है कि आखिर सरकार यह क्या कर रही है कि समय पर जांच रिपोर्ट ही नहीं आ पा रही है कंडाघाट लैब को अपग्रेड नहीं किया गया है वहां पर स्टाफ भी अधूरा है। जिसके कारण सैंपल प्रदेश से बाहर की लैब में भेजने पड़ते हैं।

 

दवा गुणवत्ता

स्वास्थ्य में काफी अहम किरदार दवा उठाती है , जिसमें यदि दवा गुणवत्ता युक्त नहीं हुई तो मरीज स्वस्थ नहीं हो सकता है लेकिन उसकी जांच समय पर करना भी आवश्यक रहता है लेकिन हिमाचल में ऐसा नहीं है और जो भी सैंपल केमिस्ट और सरकारी सप्लाई से उठाए जाते हैं उसकी रिपोर्ट बहुत ही लंबे समय बाद आ रही है। जिसमें 5 से 6 माह तक जांच रिपोर्ट आने में लग रहे हैं। यह सैंपल जांच के लिए कंडाघाट लैब भेजे जाते हैं

 

 

 

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15 दिन में आनी चाहिए रिपोर्ट

 

हिमाचल तो वह डेकोरम भी पूरा नहीं कर पा रहा है कि यह समय मैं रिपोर्ट आ जाए और उस पर कार्रवाई हो पाए। दवा इस्तेमाल हो कर मरीजों द्वारा निगल भी जाती है और 15 दिन नहीं बल्कि 100 से 200 दिन ऊपर हो जाता है और दवा की जांच रिपोर्ट नहीं आ पाती है।

 

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फिर दवा निरीक्षक का समय पर छापेमारी का क्या फायदा

 

हिमाचल में दवा निरीक्षकों को समय पर दवा गुणवत्ता की जांच के लिए छापेमारी के निर्देश दिए जाते हैं लेकिन उस छापेमारी का कोई भी औचित्य नहीं जब समय पर जांच रिपोर्ट ही ना आ पाए

Deepika Sharma

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