सम्पादकीय

असर संपादकीय: माँ की दृष्टि से बच्चे की परवरिश

डॉ. निधि शर्मा की कलम से

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माँ की दृष्टि से बच्चे की परवरिश

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– डॉ. निधि शर्मा

 

(स्वतंत्र लेखिका)

  हर माँ चाहती है कि उसके बच्चे की परवरिश खुले माहौल में हो और इस मदर्स डे पर इन तमाम मुद्दों पर बात करना ज़रूरी हो जाता है जो बच्चे की परवरिश से जुड़ा हुआ है । हर वर्ष मई महीने के दूसरे रविवार को मनाये जाने वाले मदर्स डे की थीम इस वर्ष मातृत्व के विचार को स्वीकार करें रखी गई है । यह थीम मातृत्व यानि माँ के अपनत्व को बच्चे की प्रति प्रेम, चिंता व सरोकार रूपी विभिन्न भूमिकाओं में विवरण करने की कोशिश करती है ।

मुझे भी वो क्षण याद है,जब मैं माँ बनी । नन्हें-नन्हें हाथों का स्पर्श मेरे मन में उमड़ रही करूणामयी इच्छाओं का और पंख दे रहा था । एक तरफ मन धन्यवादी था तो दूसरी तरफ कई चिंताओं की तरफ ध्यान न चाहते हुए भी जा रहा था । चिंता एक नहीं बल्कि लंबी सी सूची पर उकेरे गए कई बिंदु थे । जिनका शायद मुझे समस्या के तौर पर नाम तो पता था लेकिन निवारण नहीं ।

  सबसे पहले जन्म से पूर्व ही मेरे बच्चे की धर्म व जाति निर्धारित थी । उसे भी उसका सदस्य बनाकर प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से उसकी रक्षा के नाम पर खड़ी हुई सेनाओं में सैनिक के तौर पर नियुक्त कर दिया जाएगा । जब वो पूछता है कि माँ धर्म व जाति क्या होती है ? बेशक उसके समझदार होने तक मैं इस सवाल को टालती भी जाऊँ, लेकिन स्कूल में उसकी एडमिशन होने पर फार्म में मोटे-मोटे अक्षरों पर पूछा गया वह सवाल, मुझे स्वयं इशारा करता है कि समय रहते उत्तर देना ही उचित है । ऐसा न हो कि वो आस-पास के प्रश्नों में उलझकर सही उत्तर ही न जान पाए । इसलिए बचपन से ही मैंने देश प्रथम का पाठ पढ़ाना शुरू कर दिया है । पैदा होते ही मेरे बच्चे के आस-पास की आवोहवा विचारों से प्रदूषित हो रही है या विकास के नाम पर विकसित हो रही सभ्यता के नाम पर धीरे-धीरे अपने गंतव्य की ओर बढ़ रही है । अभी तो मैं कोशिश कर रही हूँ कि अपना आंचल फैलाकर छनकर ही उसकी हवा उस तक पहुँचे । लेकिन कब तक ? इसका जवाब मेरे पास भी नहीं है ।

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 माँ के तौर पर चिंताओं के बीच मैं अपने बच्चे को प्रदूषित हवा, पानी और भोजन का प्रयोग करते हुए बस देख सकती हूँ । बच्चों के भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए किए जाए रहे अंधाधुंध विकास ने तो उनका वर्तमान भी खराब कर दिया है । जब मैं अपने छोटे से बच्चे को पानी के स्त्रोत कुएँ, तालाब और बाउड़ी सिर्फ किताबों में पढ़ाती हूँ, जिनका आज अस्तित्व ही नहीं है । इसी कारण उसे ये पंक्तियाँ झूठी लगती है उसके लिए पानी का स्त्रोत वाटर प्यूरीफायर है । उसके लिए पानी के ये स्त्रोत मात्र किताबों का एक चैप्टर है । जिसे पढ़कर उसे अपनी परीक्षा पास कर अगली कक्षा में जाना है ।

  सबसे बड़ी ग्लानि मुझे तब होती है जब मैं स्वयं यूरिया खाद से भरा भोजन पकाकर उसे खिलाती हूँ । माँ के तौर पर इससे ज्यादा दुःखदाई क्या हो सकता है? जिस भोजन से मेरे बच्चे का शारीरिक व मानसिक विकास सुनिश्चित होगा, वो ही दूषित है । यह चिंता सिर्फ मेरी नहीं, बल्कि हर उस माँ की होगी कि मैं अपने बच्चे के लिए स्वच्छ हवा, पानी और भोजन सुनिश्चित नहीं कर पा रही हूँ । चलो दूषित खान-पान तो सरकारों की गल्त नीतियों के मत्थे मढ़ दिया जाता है और हम सब बड़े साफ-सुथरे तरीके से किनारे हो जाते हैं ।

 लेकिन हमारे बच्चों के मानसिक विकास की जिम्मेवारी तो हम ले ही सकते हैं । मैं चाहती हूँ ब्रैंडिड उत्पादों की चाहना के बजाए मेरा बच्चा उच्च गुणवतापूर्ण आदतें अपने जीवन में लाए । व्यवसायिक शिक्षा के माध्यम से हर क्षेत्र में नंबर वन बनने की होड़ का हिस्सा न बने । माँ के तौर पर नैतिक मूल्यों को उसके जीवन में आत्मसात् करने की मेरी कोशिश में, मुजे समाज के हर तबके का योगदान एवं अनुशासन चाहिए । इस कोशिश में हम सरकारों पर दायित्व फैंक कर, अपनी जिम्मेवारी से मुँह नहीं मोड़ सकते । याद रखिए जिंदगी के पड़ाव की ओर बढ़ रहे हमारे बच्चों की खुशहाली साँझे प्रयास से ही सुनिश्चित हो सकती है। अपने और पराए के बीच की खाई से हमारे बच्चों का भविष्य संवर नहीं सकता । बस हम माएँ जो कर सकती है, वो तो करें । इतनी आशा तो मैं माताओं से कर ही सकती हूँ ।

Deepika Sharma

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