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असर विशेष: ज्ञान गंगा”यक्ष प्र्शन – ८ ज्ञान, क्रोध व् सादगी”

रिटायर्ड मेजर जनरल एके शौरी की कलम से

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रिटायर्ड मेजर जनरल एके शौरी की कलम से……

यक्ष ने प्रश्नों की झड़ी लगाते हुए युधिष्ठिर से अनेक प्रश्न पूछे जिनका शांतिपूर्वक उत्तर दिया गया। यक्ष ने पूछा – “तप का लक्षण क्या कहा गया है? और सच्चा संयम क्या है? शर्म क्या है?” युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, – “स्वयं के धर्म में रहना तपस्या है, मन का संयम सभी संयमों में से सच्चा है: और शर्म की बात है, सभी योग्य कार्यों से पीछे हटना।

इसके बाद यक्ष ने पूछा – “हे राजा, ज्ञान क्या कहा जाता है? शांति और दया क्या होती है? और सादगी किसे कहते हैं?” युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, – “सच्चा ज्ञान देवत्व का है। सच्ची शांति हृदय की है। सभी के सुख की कामना में ही दया है। और सादगी हृदय की समता है। यक्ष ने पूछा, -“कौन सा शत्रु अजेय है? मनुष्य के लिए एक लाइलाज बीमारी क्या है? कैसा आदमी ईमानदार कहलाता है और कैसा बेईमान?” युधिष्ठिर ने उत्तर दिया – “क्रोध अजेय शत्रु है। लोभ एक लाइलाज बीमारी है। वह ईमानदार है जो सभी प्राणियों की भलाई चाहता है, और वह बेईमान है जो निर्दयी है।

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आइए अब इन बातों को सरल और व्यवहारिक तरीके से समझने की कोशिश करते हैं। स्वंय के धर्म में रहने का मतलब है कि चाहे वो मानव हो, जानवर, या प्रकृति भी, सभी को अपने दायरे ,अपने कर्म व् गुणों की विशेषताओं के भीतर व् अनुसार ही रहना होता है और इसी को धर्म कहते हैं। इसी को तपस्या कहते है। सबसे सच्चा संयम मन का है और जिसने मन पर संयम करना सीख लिया मानो वो तपस्वी बन गया। सादगी का मतलब यहां पर सरल ह्रदय से माना जाना चाहिए, सादगी का अर्थ गरीबी नहीं बल्कि मन की पवित्रता माना जाये। योग्य कार्यों से पीछे हटने वाला कार्य से जी चुराने वाला, कामचोर व् आलसी होता है और इससे अधिक शर्म की बात क्या हो सकती है?

जब युधिष्ठिर कहते हैं कि वास्तविक शांति मन की है, तो यह उत्तर अपने आप में बहुत सुखदायक है। और जो व्यक्ति हमेशा दूसरों की मदद करने के साथ-साथ दूसरों का कल्याण करने के लिए भी तत्पर रहता है, इससे बड़ी कोई बात नहीं हो सकती है। अब कौन है वो ऐसा जिसे जीता न जा सके ? यह क्रोध ही है क्रोध जो सब कुछ नष्ट कर देता है और जो व्यक्ति अपने भीतर क्रोध को नियंत्रित करना जानता है, उसने अपने भीतर कई बुराइयों पर काबू पा लिया है। लालच एक ऐसी बीमारी है जिसका कोई इलाज नहीं है, यानी इसका कोई अंत नहीं है और इसे नियंत्रित न किया जाए तो यह बढ़ती ही जाती है। युधिष्ठिर ने आगे बताया कि जो व्यक्ति क्रूर होता है वह विश्वासघाती होता है और जो व्यक्ति दूसरों का हित देखता है वह ईमानदार व्यक्ति होता है।

Deepika Sharma

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