EXCLUSIVE : किताबें पढ़ेंगे या शौचालय ढूंढेंगे बच्चे? लाखों का बजट पर एक साल से नहीं बने टायलेट्स और हैंडवॉश के नाम पर ‘लोटा’!
मंत्री के अपने क्षेत्र में स्कूल बदहाल! डीआरडीए के तहत हो रहा निर्माण ; पर अभी तक नहीं बने टायलेट्स

लोक निर्माण मंत्री के क्षेत्र में स्कूल की बदहाल व्यवस्था! ढाई सौ बच्चों के लिए शौचालय नहीं, हाथ धोने के लिए बना ‘लोटे’ जितना स्टेशन
आपदा में ढहे शौचालयों का एक साल बाद भी नहीं हुआ निर्माण, प्राइमरी स्कूल के शौचालयों के सहारे बच्चे; पंचायत के छोटे हैंडवॉश स्टेशन ने भी खड़े किए सवाल
शिमला।
शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, स्कूलों में बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करवाने और बच्चों के स्वास्थ्य एवं स्वच्छता को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन पीएमश्री उत्कृष्ट वरिष्ठ माध्यमिक स्कूल बसंतपुर की स्थिति इन दावों पर सवाल खड़े कर रही है।इस स्कूल में आजकल इसी जद्दोजहद में बच्चे दिख रहे है कि टॉयलेट के लिए निकलेंगे लेकिन वह समय पर क्लास में वापिस आ भी पायेंगे या नहीं ..इसका कोई जवाब नहीं है … कभी बच्चे अपने दो जर्जर टॉयलेट्स के बाहर खड़े हो रहे है और कभी प्राइमरी बच्चों के लिए बने टॉयलेट्स के लिए भागना पढ़ रहा है दिक़्क़त छात्राओं को भी बहुत हो रही है क्योंकि जो जर्जर हालत में टॉयलेट्स है भी वह लड़कों के है लड़कियों के नही..दल
बताया जा रहा है कि लाखों के बजट होने के बावजूद भी एक साल से डीआरडीए के तहत बच्चों के लिये टायलॉट्स का निर्माण नही हो पाया है जिस पर अब कई अभिभावक भी सवाल उठाने लगे है
करीब 250 विद्यार्थियों वाले इस स्कूल में शौचालयों का संकट लंबे समय से बना हुआ है। हैरानी की बात यह है कि आपदा में क्षतिग्रस्त हुए शौचालयों के पुनर्निर्माण का काम करीब एक साल बीत जाने के बाद भी पूरा नहीं हो पाया है।

गौर करने वाली बात यह भी है कि यह क्षेत्र लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह का विधानसभा क्षेत्र है। ऐसे में उनके क्षेत्र के एक स्कूल में बच्चों को शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा के लिए परेशानी झेलनी पड़ रही है। हिमाचल प्रदेश शिक्षा के क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ने और बेहतर शैक्षणिक सुविधाओं की दिशा में प्रयास कर रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर इस तरह की तस्वीरें चिंता बढ़ाने वाली हैं।
स्कूल के वरिष्ठ माध्यमिक खंड में विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध शौचालय आपदा के दौरान ढह गए थे। इसके बाद डीआरडीए के तहत नए शौचालयों का निर्माण किया जाना प्रस्तावित था, लेकिन लंबा समय बीतने के बावजूद यह सुविधा विद्यार्थियों को नहीं मिल पाई है। ऐसे में बच्चों को शौचालय जाने के लिए प्राथमिक स्कूल खंड के सीमित शौचालयों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। वहीं, वरिष्ठ माध्यमिक खंड में लड़कों के लिए मौजूद दो शौचालय भी जर्जर हालत में हैं और इनके कभी भी ढहने का खतरा बना हुआ है। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर बच्चों को सुरक्षित और स्वच्छ शौचालय उपलब्ध करवाने के लिए और कितना इंतजार करना पड़ेगा?
पंचायत की पहल, लेकिन हैंडवॉश स्टेशन ने खड़े किए सवाल
इस मामले में पंचायत की ओर से भी गंभीरता दिखाते हुए दो शौचालय बनाकर देने की बात सामने आई है। हालांकि, अभी तक ये शौचालय औपचारिक रूप से स्कूल प्रशासन को हस्तांतरित नहीं किए गए हैं। लेकिन पंचायत की इस पहल के साथ ही स्कूल परिसर में बनाया गया एक छोटा-सा हैंडवॉश स्टेशन ( वॉशबेसन) भी चर्चा का विषय बन गया है।
हैंडवॉश स्टेशन का आकार इतना छोटा है कि उसे देखकर सहज ही सवाल उठता है कि आखिर करीब 250 बच्चों की जरूरतों को ध्यान में रखकर इसका निर्माण किया गया है या केवल औपचारिकता पूरी करने के लिए? लोटे जैसी आकृति वाले इस छोटे से स्टेशन पर इतने सारे बच्चे किस तरह आसानी से हाथ धो पाएंगे? किधर साबुन रखेंगे जब स्कूल परिसर में पर्याप्त जगह उपलब्ध है, तो फिर बच्चों की संख्या और उनकी सुविधा को ध्यान में रखकर एक बड़ा और उपयोगी हैंडवॉश स्टेशन क्यों नहीं बनाया गया?
बजट और दावों के बीच बुनियादी सुविधाओं का सवाल
एक तरफ प्रदेश में समग्र शिक्षा अभियान और शिक्षा विभाग के माध्यम से स्कूलों की आधारभूत सुविधाओं और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। सरकार बच्चों को बेहतर शैक्षणिक माहौल देने की दिशा में प्रयासरत है, लेकिन दूसरी तरफ किसी स्कूल में शौचालय और हाथ धोने जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है।
उठे सवाल
जब बच्चों को सुरक्षित शौचालय तक उपलब्ध नहीं होंगे, तो स्कूलों में स्वच्छता, स्वास्थ्य सुरक्षा और बेहतर वातावरण की कल्पना कैसे की जा सकती है? आखिर आपदा के बाद एक साल बीतने पर भी शौचालय निर्माण क्यों अधूरा है? जर्जर शौचालयों को लेकर सुरक्षा के इंतजाम क्यों नहीं किए गए? और पंचायत ने यदि बच्चों की सुविधा के लिए हैंडवॉश स्टेशन बनाया है, तो उसकी उपयोगिता और बच्चों की वास्तविक जरूरतों का ध्यान क्यों नहीं रखा गया? कई अभिभावक भी इसे लेकर सवाल उठाने लगे है ,
अब शिक्षा विभाग, डीआरडीए और पंचायत को इस मामले में जवाबदेही तय करनी होगी। करीब 250 बच्चों के भविष्य की बात करने से पहले उनके लिए सुरक्षित शौचालय, स्वच्छ पानी और हाथ धोने की पर्याप्त व्यवस्था सुनिश्चित करना जरूरी है। क्योंकि शिक्षा केवल कक्षाओं और किताबों तक सीमित नहीं है, बच्चों का स्वास्थ्य, सुरक्षा और सम्मानजनक वातावरण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।




