BEEOs के लिए राज्य स्तरीय ECCE ओरिएंटेशन कार्यक्रम, छह जिलों के 80 प्रतिभागियों ने लिया हिस्सा*
*प्री-प्राइमरी शिक्षा को सुदृढ़ बनाने और बच्चों के सर्वांगीण विकास पर दिया जोर*
*शिमला*
हिमाचल प्रदेश में PM SHRI योजना के तहत प्री-प्राइमरी शिक्षा को सुदृढ़ बनाने और प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा (ECCE) की गुणवत्ता में सुधार के लिए खंड प्रारंभिक शिक्षा अधिकारियों (BEEOs) का पांच दिवसीय राज्य स्तरीय ओरिएंटेशन कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें छह जिलों के लगभग 80 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।

कार्यक्रम में प्री-प्राइमरी कक्षाओं में बच्चों के लिए रुचिकर और गतिविधि-आधारित शिक्षण वातावरण तैयार करने के तरीकों पर चर्चा की गई। साथ ही, बच्चों के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, भावनात्मक और भाषाई विकास में शुरुआती वर्षों की भूमिका को समझाया गया।
प्रतिभागियों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा–आधारभूत अवस्था (NCF-FS) के प्रमुख प्रावधानों की जानकारी दी गई। इसमें खेल, खोज, बातचीत और अनुभवों के माध्यम से बच्चों को सिखाने पर जोर दिया गया। साथ ही, बच्चों की उम्र, रुचि और सीखने की गति के अनुसार शिक्षण गतिविधियां तैयार करने की आवश्यकता बताई गई। इसमें खेल, कहानी, कविता, गीत, चित्र और बातचीत के माध्यम से बच्चों को सिखाने के तरीकों पर चर्चा की गई। इन गतिविधियों से बच्चों की भाषा, संख्या ज्ञान, सोचने-समझने और समस्या सुलझाने की क्षमता विकसित करने में मदद मिलती है।
हिमाचल के स्थानीय परिवेश को बच्चों की शिक्षा से जोड़ने के लिए ‘हिमवाटिका’ की भूमिका पर भी चर्चा हुई। इसके तहत स्थानीय पौधों, प्रकृति, मौसम और आसपास की वस्तुओं के माध्यम से बच्चों को सीखने के अवसर देने पर जोर दिया गया। वहीं, ‘जादुई पिटारा’ के माध्यम से खिलौनों, पहेलियों, चित्रों और अन्य शिक्षण सामग्री के इस्तेमाल से सीखने को रोचक बनाने के तरीके बताए गए।
*बच्चे के सीखने में माँ की भूमिका को रेखांकित किया*
प्री-प्राइमरी शिक्षा में अभिभावकों और समुदाय की भागीदारी के महत्व को भी रेखांकित किया गया। समग्र शिक्षा की पहल ‘पहली शिक्षक–माँ’ के तहत बताया गया कि मां बच्चे की पहली शिक्षक होती है। घर पर बातचीत करने, कहानी सुनाने, गीत गाने और रोजमर्रा की गतिविधियों में बच्चों को शामिल करने से उनके सीखने और विकास को बढ़ावा मिलता है।
बच्चों की प्रगति का आकलन करने के तरीकों पर भी जानकारी दी गई। इसमें बच्चों के व्यवहार, गतिविधियों में भागीदारी और दैनिक अनुभवों के आधार पर उनकी सीखने की जरूरतों को समझने पर जोर दिया गया। इसका उद्देश्य बच्चों की तुलना करना नहीं, बल्कि उनकी जरूरतों के अनुसार शिक्षण में सुधार करना है।
*मेंटरिंग एवं मॉनिटरिंग पर विशेष जोर*
कार्यक्रम में BEEOs की भूमिका पर चर्चा करते हुए उन्हें विद्यालयों का नियमित दौरा करने, शिक्षकों को शैक्षणिक सहयोग देने और कक्षाओं में चल रही गतिविधियों की निगरानी करने के महत्व से अवगत करवाया गया। साथ ही, शिक्षकों की प्रशिक्षण संबंधी जरूरतों की पहचान करने और सामने आने वाली चुनौतियों का समाधान खोजने पर जोर दिया गया। कार्यक्रम के अंत में प्राप्त जानकारी को विकास खंडों और विद्यालयों तक पहुंचाने के लिए कार्ययोजना तैयार करने पर चर्चा हुई। इसका उद्देश्य प्री-प्राइमरी शिक्षा से जुड़ी गतिविधियों को प्रभावी ढंग से लागू करना और बच्चों के सीखने के अनुभवों को बेहतर बनाना है। कार्यशाला में SCERT प्री-प्राइमरी समन्वयक रंजना कुमारी, ECCE परामर्शदाता दलीप वर्मा सहित, प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन के जोगिन्दर शर्मा, कुलदीप पुंडीर, केवल कृष्ण, जागृति शर्मा और पुरुषोत्तम संसाधन व्यक्तियों (Resource Persons) के रूप में शामिल हुए।




