पर्यावरण

असर विशेष: उच्च हिमालय में पहली बार दिखा हरियल, किन्नौर में 3,400 मीटर पर दर्ज हुआ ऐतिहासिक रिकॉर्ड

हिमालय की ऊँचाइयों में हरियल की मौजूदगी ने चौंकाए वैज्ञानिक, जलवायु परिवर्तन से जोड़े जा रहे संकेत

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रक्छम–चितकुल वन्यजीव अभयारण्य में मिला येलो-फुटेड ग्रीन पिजन

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किन्नौर का पहला और हिमाचल का अब तक का सर्वाधिक ऊँचाई वाला प्रमाणित रिकॉर्ड

वैज्ञानिकों ने माना जैव विविधता के अध्ययन में बड़ी उपलब्धि

रक्छम (किन्नौर)।

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हिमाचल प्रदेश के उच्च हिमालयी क्षेत्र से पक्षी विज्ञान के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि सामने आई है। किन्नौर जिले के रक्छम–चितकुल वन्यजीव अभयारण्य में लगभग 3,400 मीटर की ऊँचाई पर पहली बार हरियल (येलो-फुटेड ग्रीन पिजन – Treron phoenicopterus) का प्रमाणित रिकॉर्ड दर्ज किया गया है। यह न केवल किन्नौर जिले में इस प्रजाति की पहली आधिकारिक उपस्थिति है, बल्कि हिमाचल प्रदेश में अब तक की सबसे अधिक ऊँचाई पर दर्ज किया गया हरियल का पहला रिकॉर्ड भी माना जा रहा है।
यह महत्वपूर्ण अवलोकन वन खंड अधिकारी संतोष कुमार ठाकुर तथा वन मित्र अल्पना नेगी ने रक्छम क्षेत्र में किया। इसके बाद इस रिकॉर्ड को सत्यापन और वैज्ञानिक अभिलेखीकरण के लिए राज्य के पक्षी विशेषज्ञों एवं पक्षी अध्ययन समुदाय के साथ साझा किया गया।
विशेषज्ञों के अनुसार हरियल सामान्यतः मैदानी इलाकों, उप-पहाड़ी वनों, बाग-बगीचों तथा अधिकतम लगभग 2,400 मीटर की ऊँचाई तक ही देखा जाता है। अत्यधिक ठंडे और ऊँचे हिमालयी क्षेत्रों में इसकी उपस्थिति बेहद दुर्लभ मानी जाती है। ऐसे में बस्पा घाटी के शीत मरुस्थलीय क्षेत्र से सटे इलाके में 3,400 मीटर की ऊँचाई पर इसका मिलना वैज्ञानिकों के लिए आश्चर्यजनक होने के साथ-साथ पारिस्थितिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हिमाचल के प्रकृतिविद् हिमांशु चौधरी ने बताया कि यह संभवतः प्रदेश में इस प्रजाति का अब तक का सबसे ऊँचाई वाला रिकॉर्ड है। उन्होंने वर्ष 2020 में लद्दाख के माथो गाँव (लगभग 3,500 मीटर) से नागरिक विज्ञान मंच eBird पर दर्ज दुर्लभ रिकॉर्ड का उल्लेख करते हुए कहा कि सामान्यतः मैदानी और तराई क्षेत्रों में रहने वाला यह पक्षी बहुत कम अवसरों पर इतनी अधिक ऊँचाई तक पहुँचता है।
डॉ. एम. भट्टाचार्य, हिमाचल प्रदेश की eBird संयोजिका के अनुसार Treron phoenicopterus की पाँच मान्यता प्राप्त उप-प्रजातियों में T. p. phoenicopterus हिमालय की तलहटी और उत्तरी भारत में सबसे अधिक पाई जाती है। इसका सामान्य वितरण हिमालय की तलहटी, गंगा के मैदानी क्षेत्रों, हिमाचल से असम और बांग्लादेश तक तथा दक्षिण में मध्य प्रदेश और ओडिशा तक फैला है। eBird के उपलब्ध रिकॉर्ड बताते हैं कि हिमाचल में अब तक यह पक्षी मुख्य रूप से कांगड़ा, सोलन और शिमला के निचले इलाकों में दर्ज किया गया था, जबकि अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों से इसके रिकॉर्ड अत्यंत दुर्लभ हैं। नेपाल और भूटान सहित पूरे हिमालयी क्षेत्र में भी ऐसे उदाहरण बहुत कम मिले हैं।
वैज्ञानिकों और वन अधिकारियों का मानना है कि इस प्रकार के असामान्य रिकॉर्ड पर्वतीय क्षेत्रों में पक्षियों के बदलते वितरण की ओर संकेत कर सकते हैं। बढ़ते तापमान और बदलती जलवायु के कारण ऊँचाई वाले क्षेत्रों की पारिस्थितिकी में परिवर्तन हो रहे हैं, हालांकि विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि किसी ठोस निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए दीर्घकालीन निगरानी और वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक होंगे।
उप अरण्यपाल (डीसीएफ) सराहन, आईएफएस अशोक नेगी ने कहा कि किन्नौर की जैव विविधता अत्यंत समृद्ध है और क्षेत्रीय वन अधिकारियों व कर्मचारियों की सतत निगरानी के कारण यहां पक्षियों की नई-नई प्रजातियों का लगातार दस्तावेजीकरण हो रहा है।
वहीं उपायुक्त किन्नौर डॉ. अमित कुमार शर्मा (आईएएस) ने इस उपलब्धि पर वन्यजीव प्रभाग की टीम को बधाई देते हुए विश्वास व्यक्त किया कि भविष्य में भी किन्नौर की पक्षी विविधता से जुड़े ऐसे अनेक महत्वपूर्ण रिकॉर्ड सामने आएंगे।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह समझना अभी बाकी है कि हरियल की यह उपस्थिति केवल अस्थायी भ्रमण, भोजन की उपलब्धता में बदलाव या जलवायु परिवर्तन के कारण इसके वितरण क्षेत्र के विस्तार का संकेत है। इसके लिए व्यवस्थित वैज्ञानिक अनुसंधान और दीर्घकालीन निगरानी की आवश्यकता होगी।
यह रिकॉर्ड न केवल पश्चिमी हिमालय में पक्षियों के बदलते वितरण को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा, बल्कि यह भी दर्शाता है कि वन अधिकारी, वन कर्मचारी और स्थानीय वन मित्र जैव विविधता के संरक्षण और वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

Deepika Sharma

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