जहाँ निश्छल और पवित्र सेवा का भाव होता है, वहाँ स्वयं ईश्वर “हरि”विद्यमान होते हैं।- संत अश्वनी बेदी जी

शिमल 13 सितम्बर
श्री राम मंदिर में श्री राम शरणम के प्रमुख संत अश्वनी बेदी जी ने कहा कि-
पूज्य श्री स्वामी सत्यानंद जी महाराज ने अपनी प्रसिद्ध रचना भक्ति प्रकाश में सेवा के अद्भुत और कल्याणकारी स्वरूप का वर्णन करते हुए लिखा है:
सेवा में हरि आप हैं, सेवा हर्त्ती पाप।
नीचे झुक सेवा करो, हरो दीन संताप॥
यह वाणी मानव जीवन में सेवा भाव के महत्व, उसके आध्यात्मिक प्रभाव और निष्काम भाव से दूसरों के दुख दूर करने के संदेश को उजागर करती है।

श्री स्वामी जी का स्पष्ट मत है कि ईश्वर की प्राप्ति का सबसे सरल और पवित्र माध्यम निःस्वार्थ सेवा ही है।
सेवा में हरि का निवास और पापों का नाश बड़ी सरलता से सहज ही जो जाता है ।
भक्ति प्रकाश में श्री स्वामी जी महाराज की यह वाणी की पहली पंक्ति बताती है कि जहाँ निश्छल और पवित्र सेवा का भाव होता है, वहाँ स्वयं ईश्वर (“हरि”) विद्यमान होते हैं। किसी पीड़ित, असहाय या जीव-जंतु की सेवा करना साक्षात ईश्वर की आराधना करने के समान है। इसके साथ ही, जब मनुष्य बिना किसी अहंकार के सेवा कार्य में लीन होता है, तो उसके पूर्व जन्मों और इस जन्म के पापों तथा अवगुणों का नाश होने लगता है। सेवा मन को निर्मल बनाती है और आत्म-शुद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है।
विनम्रता और अहंकार का त्याग
दूसरी पंक्ति में स्वामी जी कहते हैं—”नीचे झुक सेवा करो”। यहाँ “नीचे झुकने” का अर्थ केवल शारीरिक रूप से झुकना नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, घमंड और मान-सम्मान की लालसा को त्यागना है। जब तक मनुष्य का अहंकार शांत नहीं होता, तब तक सच्ची सेवा संभव नहीं है। विनम्रता ही सेवा का मूल आधार है। अहंकाररहित होकर की गई सेवा ही समाज के दुखी, पीड़ित और संताप में जी रहे लोगों (“दीन”) के कष्टों को हर सकती है।
जीवन में सेवा का व्यावहारिक महत्व
आत्मिक शांति मिलती है दूसरों के आंसू पोंछने और दूसरों के जीवन में सुख लाने से जो संतोष मिलता है, वह संसार के किसी भौतिक सुख में नहीं है।
श्री महाराज कहते हैं कि सेवा भाव से समाज में भेदभाव समाप्त होता है और आपसी प्रेम व सौहार्द बढ़ता है।
पूज्य श्री स्वामी सत्यानंद जी महाराज का यह संदेश हमें सिखाता है कि केवल कर्मकांड या पूजा-पाठ ही भक्ति नहीं है; पीड़ित मानवता की सेवा करना ही सबसे बड़ा धर्म और सच्ची भक्ति है।
श्री स्वामी सत्यानंद जी महाराज की यह वाणी हमें जीवन का परम लक्ष्य समझाती है। यदि मनुष्य अपने जीवन में थोड़ा सा समय भी निःस्वार्थ सेवा के लिए निकाले, तो वह न केवल अपने पापों और कष्टों से मुक्ति पा सकता है, बल्कि समाज के संताप को हरकर ईश्वर का प्रिय पात्र भी बन सकता है। सेवा ही वह दीपक है जो अंधकारमय जीवन को प्रकाश से भर देता है।



