असर विशेष: पांच दशक बाद फिर दिखा हिमाचल का रहस्यमयी घोस्ट ऑर्किड
रक्छम-छितकुल वन्यजीव अभयारण्य में मिले केवल चार पौधे, सांगला घाटी की जैव विविधता में जुड़ा दुर्लभ अध्याय

शिमला/किन्नौर। हिमाचल की ऊंची पहाड़ियों में प्रकृति ने एक बार फिर अपना अनोखा रहस्य उजागर किया है। किन्नौर के रक्छम-छितकुल वन्यजीव अभयारण्य
में करीब पांच दशक बाद दुर्लभ और रहस्यमयी घोस्ट ऑर्किड (Epipogium aphyllum) की मौजूदगी दर्ज की गई है। जमीन के भीतर वर्षों तक छिपे रहने और अनुकूल परिस्थितियां मिलने पर महज कुछ दिनों के लिए फूलों के साथ दिखाई देने वाला यह अनोखा पौधा हिमाचल की समृद्ध वनस्पति विरासत में एक महत्वपूर्ण कड़ी जोड़ता है।
रक्छम क्षेत्र में नियमित फील्ड मॉनिटरिंग के दौरान ब्लॉक फॉरेस्ट ऑफिसर संतोष ठाकुर, वन मित्र अल्पना नेगी तथा सांगला वन्यजीव टीम के रूप सिंह और गोपाल नेगी ने इस दुर्लभ ऑर्किड को प्राकृतिक आवास में खोजा। टीम ने पौधों की तस्वीरें लेने के साथ-साथ आवश्यक फील्ड डाटा भी दर्ज किया। खास बात यह रही कि काफी तलाश के बावजूद क्षेत्र में इसके केवल चार पौधे ही मिले।
कुछ दिनों के लिए आता है, फिर वर्षों तक गायब
घोस्ट ऑर्किड का नाम ही इसकी रहस्यमयी जीवनशैली को बयां करता है। इसमें न तो सामान्य पत्तियां होती हैं और न ही क्लोरोफिल। यही कारण है कि यह दूसरे हरे पौधों की तरह सूर्य के प्रकाश से अपना भोजन तैयार नहीं कर पाता।
यह एक माइकोहेटरोट्रॉफिक ऑर्किड है, जो जंगल की मिट्टी में मौजूद विशेष फंगस के साथ अपने जटिल संबंध के जरिए पोषण प्राप्त करता है। इसका अधिकांश जीवन जमीन के नीचे राइजोम के रूप में बीतता है। अनुकूल मौसम आने पर इसका पुष्पीय तना अचानक जमीन को चीरते हुए बाहर आता है और लगभग 10 से 12 दिनों तक ही दिखाई देता है। फूल खिलने के बाद यह फिर जमीन के भीतर अदृश्य हो जाता है और कई वर्षों तक दोबारा नजर नहीं आता।
यही अनिश्चित और अल्पकालिक उपस्थिति इसे हिमालय के सबसे रहस्यमयी ऑर्किड में शामिल करती है।
हिमाचल में बेहद सीमित पुराने रिकॉर्ड
हिमाचल प्रदेश में Epipogium aphyllum के रिकॉर्ड बेहद सीमित रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसका उल्लेख सबसे पहले हेनरी कोलेट ने वर्ष 1921 में शिमला के फागू क्षेत्र से किया था। इसके बाद वर्ष 1959 में डॉ. राव द्वारा इसके संग्रह का रिकॉर्ड मिलता है। एक अन्य संग्रह डॉ. वैद्य से संबंधित बताया जाता है, जो संभवतः 1980 के दशक का है, हालांकि इसकी सटीक तिथि की पुष्टि अभी बाकी है।
ऐसे में रक्छम से मिला वर्तमान रिकॉर्ड इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह इस दुर्लभ प्रजाति की हिमाचल में मौजूदगी का एक समकालीन और महत्वपूर्ण फील्ड रिकॉर्ड सामने लाता है।
हिमाचल के दुर्लभतम ऑर्किड में शामिल
डॉ. गुरिंदरजीत सिंह गोराया, आईएफएस, सेवानिवृत्त प्रधान मुख्य अरण्यपाल एवं वन बल प्रमुख, हिमाचल प्रदेश तथा प्रसिद्ध टैक्सोनोमिस्ट, ने इस खोज को बेहद महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि घोस्ट ऑर्किड हिमाचल की सबसे दुर्लभ ऑर्किड प्रजातियों में से एक है और इसके पुराने रिकॉर्ड के बाद लंबे समय तक प्रमाणित समकालीन दस्तावेज बहुत कम रहे हैं।
उन्होंने रक्छम वन्यजीव टीम को बधाई देते हुए कहा कि उत्तर-पूर्व भारत और चीन के कुछ पर्वतीय क्षेत्रों में यह प्रजाति अपेक्षाकृत अधिक मिलती है, लेकिन हिमाचल में इसकी मौजूदगी अत्यंत दुर्लभ है।
पश्चिमी हिमालय की वनस्पति समझने में मिलेगी मदद
डॉ. भगवती प्रसाद शर्मा, वनस्पति विज्ञान के प्रोफेसर एवं वरिष्ठ वनस्पति विशेषज्ञ, के अनुसार Epipogium जीनस की दुनिया में लगभग आठ प्रजातियां पाई जाती हैं, जबकि भारत में तीन प्रजातियां दर्ज हैं। हिमाचल प्रदेश में इस जीनस की दो प्रजातियों की जानकारी उपलब्ध है।
उन्होंने बताया कि Epipogium aphyllum यूरोप और एशिया के कुछ हिस्सों में पाई जाती है और भारत में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड तथा सिक्किम के हिमालयी क्षेत्रों में इसके रिकॉर्ड हैं। सामान्यतः यह करीब 2800 से 3200 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में देखी जाती है।
उनके अनुसार रक्छम से मिला यह रिकॉर्ड पश्चिमी हिमालय में इस प्रजाति के वितरण, पारिस्थितिकी और फाइटोजियोग्राफी को समझने में महत्वपूर्ण योगदान देगा।
सांगला घाटी की जैव विविधता का नया अध्याय
प्रसिद्ध टैक्सोनोमिस्ट डॉ. आशुतोष शर्मा ने भी रक्छम में घोस्ट ऑर्किड की मौजूदगी को उल्लेखनीय बताया। उन्होंने कहा कि यह पत्तियों रहित और माइकोहेटरोट्रॉफिक ऑर्किड है, जो अपने पोषण के लिए जंगल के विशेष फंगस पर निर्भर रहता है।
उनके अनुसार सांगला घाटी में इस दुर्लभ प्रजाति का मिलना न केवल किन्नौर की वनस्पति विविधता के दस्तावेजीकरण को समृद्ध करता है, बल्कि हिमाचल की प्राकृतिक विरासत की अनदेखी परतों को भी सामने लाता है।
वैज्ञानिक निगरानी और संरक्षण जरूरी
प्रीति भंडारी, आईएफएस, मुख्य वन संरक्षक, शिमला वन्यजीव (दक्षिण) ने इस खोज के लिए संतोष ठाकुर और अल्पना नेगी को बधाई दी। उन्होंने कहा कि किन्नौर से घोस्ट ऑर्किड का रिकॉर्ड यह याद दिलाता है कि हिमालयी परिदृश्य में अभी भी जैव विविधता के कई रहस्य सामने आना बाकी हैं। ऐसी दुर्लभ प्रजातियों के संरक्षण के लिए निरंतर वैज्ञानिक अध्ययन, नियमित जैव विविधता निगरानी और इनके प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा जरूरी है।
श्री अशोक नेगी, आईएफएस, उप अरण्यपाल, वन्यजीव, सराहन ने भी सांगला वन्यजीव टीम को बधाई देते हुए रक्छम-छितकुल अभयारण्य की जैव विविधता को सामने लाने में टीम के फील्ड प्रयासों की सराहना की।
वहीं डॉ. अमित कुमार, आईएएस, उपायुक्त किन्नौर ने टीम को बधाई देते हुए कहा कि सांगला घाटी में अभी न जाने कितने ऐसे दुर्लभ पौधे और वनस्पति रहस्य छिपे हो सकते हैं, जिनकी खोज और वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण बेहद जरूरी है।
चार पौधे, लेकिन बड़ी खोज
रक्छम में घोस्ट ऑर्किड के सिर्फ चार पौधों का मिलना इसकी दुर्लभता की कहानी खुद बयां करता है। यह खोज केवल एक दुर्लभ फूल को तलाश लेने भर की उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह हिमालयी जंगलों की उस अनदेखी दुनिया की ओर भी संकेत करती है, जहां कई प्रजातियां वर्षों तक हमारी नजरों से ओझल रहकर अपना जीवन चक्र पूरा करती हैं।
रक्छम-छितकुल वन्यजीव अभयारण्य से Epipogium aphyllum का यह पुनः रिकॉर्ड हिमाचल की वनस्पति विरासत में एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि है। साथ ही यह संदेश भी देता है कि हिमालय की गोद में प्रकृति के ऐसे अनेक रहस्य अब भी छिपे हैं, जिन्हें खोजने के लिए लगातार जंगलों में उतरना, प्रकृति को करीब से समझना और वैज्ञानिक तरीके से उसका दस्तावेजीकरण करना जरूरी है।
रक्छम के जंगलों में मिला यह छोटा-सा घोस्ट ऑर्किड हिमाचल की विशाल जैव विविधता की एक ऐसी कहानी है, जो करीब पांच दशक बाद फिर दुनिया के सामने आई है।



