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ASAR ALERT : हिमाचल में बढ़ रही बच्चों की खामोश चीख — समाज के लिए खतरे की घंटी”

बचपन में बढ़ती अंधेरी सोच: क्यों मासूम आत्महत्या या हत्या जैसे कदम उठा रहे हैं?”

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कभी वही बच्चे जो खिलखिलाते थे, अब ख़ामोश हैं। खिलौनों की जगह अब उनके हाथों में मोबाइल है, और सपनों की जगह स्क्रीन पर दिखती नक़ली ज़िंदगी।
देशभर की तरह अब हिमाचल में भी ऐसे मामले बढ़ रहे हैं, जहाँ छोटे बच्चे या तो खुद अपनी जान लेने की कोशिश कर रहे हैं, या गुस्से में दूसरों को चोट पहुँचा रहे हैं।
ये आंकड़े नहीं, बल्कि समाज के टूटते ताने-बाने की कहानी हैं। सवाल सिर्फ इतना है — “क्या हम अपने बच्चों को सुन रहे हैं?”

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मासूमियत पर मनोवैज्ञानिक दबाव
बीते कुछ वर्षों में देशभर में छोटे बच्चों द्वारा आत्महत्या या हिंसक घटनाओं की खबरें बढ़ रही हैं। अब हिमाचल जैसे शांत प्रदेश में भी ऐसे मामलों ने चिंता बढ़ा दी है। स्कूल जाने वाले 10 से 14 वर्ष की आयु के बच्चे कभी पारिवारिक झगड़ों, कभी पढ़ाई के दबाव या सोशल मीडिया की नकल में ऐसे कदम उठा रहे हैं जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। विशेषज्ञों के अनुसार, यह मानसिक स्वास्थ्य संकट का संकेत है जिसे समय रहते समझने की ज़रूरत है।
 हिमाचल में बढ़ते मामले
पिछले कुछ महीनों में शिमला, सोलन और कांगड़ा जैसे जिलों से ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां बच्चों ने गुस्से, डर या अवसाद में आत्मघाती कदम उठाए। कुछ घटनाओं में दोस्तों से झगड़े या मोबाइल की पाबंदी तक कारण बने। पुलिस और चाइल्ड वेलफेयर कमेटी का कहना है कि कई बार माता-पिता इन संकेतों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं — जैसे बच्चा अकेला रहना चाहता है, बात करना बंद कर देता है या चिड़चिड़ा हो जाता है। I
 विशेषज्ञ की राय (डॉ. प्रवीण भाटिया, मनोविशेषज्ञ )
डॉ. प्रवीण भाटिया का कहना है कि “आज के बच्चे भावनात्मक रूप से बहुत संवेदनशील हैं। घर और स्कूल दोनों जगह का दबाव उन्हें भीतर से तोड़ रहा है। सोशल मीडिया पर दिखने वाली ‘परफेक्ट लाइफ़’ की तुलना, कम अंक या माता-पिता की अपेक्षाएँ उन्हें असफलता का भय देती हैं। ऐसे में बच्चे संवाद की कमी के कारण खुद को अकेला महसूस करते हैं और ग़लत दिशा में सोचने लगते हैं।”
वे कहते हैं — “जरूरत है कि माता-पिता बच्चों से हर दिन बात करें, उनके मन की सुनें और तुलना की बजाय सहयोग का माहौल दें।”और जरूरत पड़ने पर समय रहते सख्ती भी बरतना जरूरी है क्योंकि यदि बाद बच्चे पर कोई परिस्थिति उत्पन्न होती है तो अवसाद में आ जाता है 

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समाधान की दिशा
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि स्कूलों में नियमित काउंसलिंग सत्र, भावनात्मक शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम अनिवार्य किए जाने चाहिए। माता-पिता को यह समझना होगा कि अंकों से ज़्यादा अहम बच्चे की भावनात्मक स्थिरता है। जब बच्चा डर के बजाय विश्वास के माहौल में बड़ा होगा, तो वह किसी कठिनाई में खुद को खत्म करने की नहीं, आगे बढ़ने की सोच रखेगा।
बच्चों के लिए एक ही संदेश — “बात करो, चुप मत रहो।”

 डिजिटल युग और बच्चों की उलझन
मोबाइल और सोशल मीडिया ने बच्चों की दुनिया को बदल दिया है। अब उनका खेल, दोस्ती और संवाद सब स्क्रीन के भीतर सिमट गया है। हिंसक गेम्स, रील्स और फेक कंटेंट उनके व्यवहार को सीधे प्रभावित कर रहे हैं।
डॉ. प्रवीण भाटिया बताते हैं कि “ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बच्चों के अवचेतन मन में असुरक्षा और तुलना की भावना पैदा कर रहे हैं। बच्चे अब वास्तविक जीवन की समस्याओं से जूझने के बजाय वर्चुअल दुनिया में भाग रहे हैं।”
इसलिए अभिभावकों को चाहिए कि वे मोबाइल उपयोग की निगरानी करें, लेकिन सख्ती नहीं — समझदारी के साथ।
  समाज और सरकार की भूमिका
बच्चों की मानसिक स्थिति सिर्फ परिवार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की है। पंचायत स्तर पर बाल मनो-सलाह केंद्र, स्कूलों में साइकोलॉजिकल हेल्प डेस्क और मीडिया में संवेदनशील रिपोर्टिंग की जरूरत है।
राज्य सरकार यदि हर जिले में “बाल मन स्वास्थ्य अभियान” शुरू करे तो यह बड़ा कदम होगा।
डॉ. भाटिया का सुझाव है — “हर स्कूल में एक ‘मेंटल हेल्थ कार्ड’ बनाया जाए, जिससे बच्चे की भावनात्मक प्रगति भी दर्ज की जाए, न कि सिर्फ अकादमिक रिपोर्ट।”

 

Deepika Sharma

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