
दीपक वोहरा द्वारा यू ट्यूब पर हिंदी फिल्म के एक दिग्गज कलाकार राजकुमार के साथ एक साक्षात्कार है जिसमें राजकुमार से पूछा जाता है कि उन्होंने फिल्मों में क्या बदलाव देखे हैं।
राजकुमार जवाब देता है कि पहले की फिल्में क्लासिक उपन्यास पर आधारित होती थीं, कहानी और पटकथा परिवार की संरचना, सामाजिक और मानवीय मूल्यों पर आधारित होती थी, उपन्यासकार कहानी लिखने पर बहुत ध्यान देते थे, फिल्मों का एक सामाजिक उदेशय होता था जबकि परिवर्तन यह हुआ है सिनेमा का समग्र ध्यान व्यावसायिकता, पैसा कमाना बन गया है।
फिल्में हमारे सामाजिक, भावनात्मक और व्यक्तिगत जीवन का एक अभिन्न अंग हैं। फिल्मी दुनिया को अपने ग्लैमर व् चकाचौंध कारण माया नगरी भी कहा जाता है। हालांकि इसे एक उद्योग के रूप में जाना जाता है लेकिन फिल्म उद्योग लोगों को रोजगार देने के अलावा हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाता है। मात्र कहानी, कथानक और पूरी फिल्म नहीं, यहां तक कि एक फिल्म के संगीत और गीत भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और हम पर प्रभाव डालते हैं। ऐसा कई बार हुआ है एक भावनात्मक दृश्य देखने के दौरान कुछ समय के लिए लोगों की आँखों से आंसू भी निकल आते हैं और निश्चित रूप से वे हंसते भी हैं जब एक अच्छा कॉमेडी दृश्य होता है। एक फिल्म देखना भी अपने आप में एक ऐसी घटना है, जिसे देखने से पहले दर्शक स्वयं को मानसिक रूप से तैयार करता है, अपने आप को ट्यून करता है और फ़िल्म के शीर्षक, कथानक, अभिनेताओं और कई चीजों के साथ स्वयं को जुड़ा महसूस भी करता है और एक भावना के साथ फ़िल्म देखता है। समग्र रूप से फिल्में किसी भी भाषा में हो सकती हैं, लेकिन मुख्य रूप से हिंदी भाषा में पिछले कुछ दशकों के दौरान कई बदलाव हुए हैं, हम इसमें शामिल कई मुद्दों का विश्लेषण करने की कोशिश करेंगे और एक समग्र दृष्टिकोण लेंगे।
आम तौर पर आज कल ऐसा सुनने में आता है और आपस में लोग बात करते हैं कि फिल्मों की गुणवत्ता खराब हो गई है, वास्तविकता को दिखाने के नाम पर आजकल फिल्मों में बहुत ज्यादा सेक्स और अश्लीलता को परोसा जा रहा है, बच्चों और माता -पिता के साथ बैठ कर फिल्मों को आराम से नहीं देख जा सकता है क्योंकि आजकल की फिल्मों में बहुत अधिक अश्लील सामग्री है, एक्शन दृश्य बनावटी से लगते हैं और कहानियां अनुमानित प्रकार की होती हैं, मार धाड़ व् अत्यंत हिंसा व् क्रूरता को बढ़ावा दिया जाता है आदि आदि। एक दिलचस्प बात यह है कि कुछ फिल्म निर्माताओं द्वारा हिंसा, सेक्स, अश्लीलता का बचाव भी किया जा रहा है और तर्कसंगत भी बताया जा रहा है। अगर हम पिछले कुछ दशकों से फिल्मों पर एक नज़र डालते हैं तो यह एक सच्चाई है। हालांकि दर्शकों का रुझान लगभग हर दशक के बाद बदलता रहा है, रोमांटिक फिल्मों से लेकर गुस्से में युवा व्यक्ति तक, सहानुभूति से लेकर बदला लेने का मंच, राजनीतिक अवस्था से लेकर देशभक्ति, दोस्ती, विश्वासघात वगैरह। एक बार किसी विशेष विषय की कुछ फिल्मों को रिलीज़ किया जाता है और जब वे सफल हो जाती हैं, एक के भी हिट होने पर उसी कथानक पर कई फिल्में बनने लग जाती हैं और एक ट्रेंड में बदलाव हो जाता है।
अगर हम एक शांत दिमाग के साथ सोचें तो निश्चित रूप से यह इस तरह से ही हुआ है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि सभी फिल्में व्यावसायिक दृष्टिकोण से बनी हैं, लेकिन तथ्य यह है कि यह दृष्टिकोण अवश्य हावी है। भावनाओं पर ध्यान कम है, मुख्य लक्षित विषय वासना और हिंसा को उत्तेजित करना अधिक है। मैं यह बात समझ नहीं सका हूँ कि पात्रों के मुंह से माँ बहन की गालियों को निकलवा कर किस प्रकार की वास्तविकता दिखाई जा रही है? समाज की सच्चाई होती थी प्यासा, फिर सुबह होगी, दो बीघा ज़मीन जैसी फिल्मों मे, जिससे समाज की सामाजिक व् आर्थिक विषमताओं व् शोषण का चित्रण ऐसे किया जाता था कि शोषित के साथ सहानुभूति भी आती थी, करुणा भी और एक किस्म का पश्चाताप भी। फिल्मों का अधिक केंद्र परिवार, मूल्य, दोस्ती, वफादारी होता था। मनोरंजन कोण इन रुझानों के आसपास बुना जाता था। बुराई पर अच्छाई की जीत भी एक मुख्य विषय थी। देश के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति में बदलाव के साथ, रुझान बदल गए, कथानक भी बदलने लगे, दोस्ती, प्रेम के बाद बदला, उग्र युवा वर्ग की हताशा हावी होने लगी लेकिन मूल्यों के साथ समझौता कभी नहीं बदला गया। यहां तक कि नृत्य संगीत के फिल्मांकन, कैबरे गाने भी एक ऐसे स्तर के होते थे कि उनको परिवार के साथ बैठ कर देखते समय किसी को नज़र चुरानी नहीं पड़ती थी।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर, मेरी ज़िंदगी मेरे हिसाब के नाम पर वास्तविकता दिखाने के नाम पर, सस्ते पन और अश्लीलता ने प्रवेश करना शुरू कर दिया और जो कुछ भी हो रहा है वह हमारे सामने है। चुंबन दृश्य, संभोग दृश्य, खुले आम गालियां, अधिकतर फिल्मों में एक प्रवृत्ति बन गई है। कॉल गर्ल, अनचाहे संबंध, अवैध संबंध, अतिरिक्त वैवाहिक संबंध एक चालू और खूब बिकने वाला विषय बन गया है। अगर कुछ और गौर करें तो फंतासी, मारधाड़, जादू टोना, आदि भी गर्म मसाले का काम कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि निवेश किया जा रहा पैसा बहुत अधिक है और अर्जित धन भी बहुत अधिक है क्योंकि लोगों को इन स्वादिष्ट चीजों की सेवा की जा रही है, जिन्हें वे पचा भी रहे हैं। अच्छी विषय गत फिल्में भी बन रही हैं, ऐतिहासिक और सामाजिक विषय भी प्रस्तुत किए जा रहे हैं, सामाजिक बुराइयों की ओर भी ध्यान कर्षण किया जा रहा है लेकिन उनकी संख्या सीमित है। दक्षिण फिल्मों से प्रेरणा लेने के बाद बड़ी संख्या में फिल्में रीमेक बन कर आ रही हैं ओर टेक्नोलॉजी की मदद से स्पेशल इफेक्ट्स डाल कर दर्शकों को चकाचौंध किया जा रहा है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि मनोरंजन फिल्मों को देखने का मुख्य उद्देश्य है लेकिन मनोरंजन स्तर को भी सभ्य और शालीन होना होता है। बड़ी संख्या में ऐसे फिल्मों के नाम गिनाये जा सकते हैं जो लोगों ने कई बार देखी होगी ओर हर बार उन्हें आनंद ही आया है लेकिन पिछले कुछ वर्षों से फिल्मों की एक बड़ी संख्या में से एक शायद ही एक से अधिक बार देखने लायक कोई फिल्म होगी। यह एक तथ्य है और गुणवत्ता और स्तर को दर्शाता है। वर्तमान की फिल्में हमेशा के लिए प्रभाव नहीं डालती हैं या उनके ऐसा दम प्रभाव नहीं है क्योंकि वे व्यक्तिगत, परिवारों, सामाजिक ताने -बाने से संबंधित नहीं हैं। हम आम तौर पर ऐसा खाना खाते हैं जो स्वादिष्ट भी होता है, हमारे स्वास्थ्य को भी ठीक रखता है और हमें एक किस्म की तृप्ति भी देता है। हम जंक फूड भी खाते हैं जो हमारे पेट की भूख को शांत तो कर देता है लेकिन स्वास्थ्य के हिसाब से हमारे तन के लिए भी ठीक नहीं होता ओर हमारे मन ओर विचारों के लिए भी। मुझे लगता है कि वर्तमान में बड़ी संख्या में हिंदी फिल्में जंक फूड की तरह हैं।



