सम्पादकीय

असर समीक्षा: तबादला नीति नहीं तबादला कानून बने

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राजनीतिक दृष्टि से हिमाचल प्रदेश में कर्मचारियों की महत्वपूर्ण भूमिका हैं वैसे तो कर्मचारियों के बहुत से मुद्दे होते हैं परंतु प्रदेश की भौगोलिक स्थिति एवं सीमित यातायात संसाधनों के कारण तबादला कर्मचारियों; मुख्यत शिक्षकों के लिए अत्यधिक महत्व रखता हैं जिसके कारण सरकार से संबंधित छुटभैया नेताओं के साथ साथ कुछ कर्मचारी संगठनों के प्रतिनिधियों पर भी तबादलों के विषय में धन ऐंठने के आरोप लगते आए हैं। बेशक समय समय पर सरकारों ने तबादलों से सम्बन्धित नीतियां एवं नियम बनाए परंतु किसी न किसी लूप हॉल के कारण वह नीतियां एवं तबादल नियम प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पाए जिसके फलस्वरूप आज भी माननीय उच्च न्यायालय अथवा पूर्व के प्रशासनिक ट्रिब्यूनल में हजारों मामले केवल और केवल तबादलों से संबंधित आते रहे हे।
भले ही मार्च 2024 तक सरकार ने लोकसभा चुनाव के दौरान ताबड़तोड़ तबादले किए परंतु आचार संहिता के लगने के बाद बहुत से मामले सम्बन्धित निदेशालय में लटके रहे और आचार संहिता के बाद उन सभी को सरकार ने निरस्त कर दिया ।

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उसके बाद माननीय शिक्षा मंत्री ने शैक्षणिक सत्र के दौरान शिक्षकों के तबादलों पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया और शायद पिछले कुछ दशकों में यह प्रतिबंध सबसे अधिक प्रभावी रहा।
आज शिक्षा मंत्री कार्यालय से जारी निर्देशों के मध्यनजर फिर से तबादलों पर शिक्षकों का ध्यान केंद्रित होना स्वाभाविक हैं। कुछ दिनों से शोर था कि तबादले केवल आवश्यकता अनुरूप अर्थात नीड बेस्ड होंगे और म्यूचुअल तबादलों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जायेंगे ताकि दूर दराज के कबायली क्षेत्रों में दशकों से कार्य करने वाले शिक्षकों को वरीयता के आधार पर सुलभ क्षेत्रों में आने के अवसर मिलेंगे ।परंतु इन निर्देशों में म्यूचुअल तबादलों पर पूर्ण तबादलों के स्थान पर उसे नियंत्रित कर शहरी क्षेत्रों तक सीमित करने का प्रयास किया गया जो संभवतः नाकाफी हैं क्योंकि हिमाचल में शहरी क्षेत्रों की सीमा मात्र 10 से 15 किलोमीटर के दायरे में समाप्त हो जाती हैं और म्यूचुअल तबादलों को माहिर जानते हैं कि अब वह म्यूचुअल 15 किलोमीटर से बाहर अर्थात ग्रामीण क्षेत्रों में करेंगे ओर पुनः लाभ उन्हीं को मिलेगा जिन्हें मिलता रहा हैं। दूरदराज में बिना किसी राजनैतिक पहुंच के दशकों से कार्य करने वाले शिक्षक फिर रिक्ति स्थान उपलब्द न होने के कारण अगले वर्ष को प्रतीक्षा करते रह जाएंगे, साथ ही अपने घरों के आस पास ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले शिक्षक नियुक्ति से सेवानिवृत्ति तक एक ही स्थान पर रहते आए हैं और अब भी डेट रहेंगे और दोनों ही स्थिति में नुकसान विद्यार्थियों का ही होगा क्योंकि जहां शहरी क्षेत्रों के शिक्षक मात्र दो साल बाद ही तबादलों की जुगाड़बाजी में अगला वर्ष बिताएंगे , वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षकों को रिलीवर नहीं मिल पाएंगे तथा दशकों विद्यार्थियों को एक ही शिक्षक को झेलना पड़ेगा जहां नवाचार के सारे रास्ते बंद होंगे ।
सरकारी शिक्षा संस्थानों एवं शिक्षा की बेहतरी चाहने वाले शिक्षक संगठनों की माने तो सरकारी विद्यालयों में व्यवहारिक तबादला कानून होना चाहिए ताकि निष्पक्षता से सभी शिक्षकों को सभी स्थानों के विद्यार्थियों को जानने तथा पढ़ाने का अवसर मिल सके ।

Deepika Sharma

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