सम्पादकीय

असर संपादकीय: लोगों की जागरूकता से सृदृढ़ होगा लोकतंत्र

निधि शर्मा (स्वतंत्र लेखिका) की कलम से

निधि शर्मा (स्वतंत्र लेखिका)

 

लोकतंत्र यानि की लोगों द्वारा चलाए जाने वाला तंत्र लोगों के इस अधिकार को तवज्जों देने के लिए वर्ष 2007 से हर वर्ष 15 सितंबर को यूनाइटेड नेशन द्वारा अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस के तौर पर मनाया जाता है। इस वर्ष यूएनओ द्वारा इस दिवस की थीम लोकतंत्र के सि द्वातों को बनाए रखना और बढ़ावा देना, रखी है। लेकिन क्या लोकतंत्र सिर्फ जनता द्वारा सरकार चुनना ही है ? शायद नहीं । लोकतंत्र जनता और लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच पुल का काम करता है । इस पुल की मजबूती किसी भी देश की जनता का लोकतांत्रिक मूल्यों पर आस्था से ही मजबूत होती है। लेकिन इस आस्ता को प्रबल करने के लिए देश की राजनैतिक पार्टियों को भी मजबूती से काम करने की आवश्यकता है।

 

एक जाने माने राजनैतिक विचारक रॉबर्ट डाहल द्वारा राजनैतिक उद्यमी अवधारणा से समाज को रूबरू करवाया गया । उनके अनुसार नेता एक व्यवसायी है जनता जैसी मांग नेताओं के सामने रखती है, उन्हीं के मांगानुसार राजनेता राजनीति करते हैं। लोकतंत्र में सबसे नुकासन देह बात है कि अगर जनता मुख्य मुद्दों के प्रति ज्ञान नहीं रखेगी, भावनात्मक तौर पर धर्म, जाति या समूह को तवज्जों देगी तो राजनेता भी जनता की ही रजामंदी मानकर, इन्हीं मुद्दों के आधार पर उन पर शासन करेंगे।

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आज लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जनता और राजनेता दोनों शॉर्ट टर्म गेन के लिए सरकारें बना रहे हैं। यही कारण है कि जनता की मुद्दों व लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अनपढ़ता ने कुछ वर्ग के लोगों को ही सत्ता पर काबिज़ कर दिया है। जो कुछ एक विचार एक आधार पर समाज में संघर्ष पैदा करते हैं और लंबे समय तक सता पर बने रहते हैं। दुखद पहलू यह है कि पढ़ा-लिखा वोटर भी इस मायाजाल में फंसकर उस वर्ग के सतासीन होने पर प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तौर पर मदद करता है जबकि अनपढ़ वोटरों से तो सकारात्मक लोकतंत्र की आशा करना ही मूर्खता है। जनता अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायलय का दरवाजा खटखटाना और सड़कों पर उतरना तो बखूबी जानती है। लेकिन मौलिक दायित्वों के प्रति विमुख होने से लोकतंत्र का ही नुकसान हो रहा है। क्योंकि जनता द्वारा राजनैतिक व्यवस्था पर सही नियंत्रण ज्ञान व जागरूकता से ही लाया जा सकता है। यह परिवर्तन वोटरों द्वारा अपने दायित्व के निर्वहन द्वारा और अपनी तार्किक बुद्धि के द्वारा ही संभव हो सकता है

 

एक अन्य जाने-माने राजनैतिक विचारक जे.एस. मिल्स राजनीति में खामियां ढूंढने और सवाल पूछने के पक्षधर है। इसके साथ-साथ उनका मानना है कि अधिकतम लोगों तक अधिकतम सुख पहुँचाने के लिए सरकारों को व्यक्तियों की गतिविधियों से कम से कम हस्तक्षेप करना चाहिए। जबकि जनता को सत्तासीन शासकों को समाज के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए उनका कार्य का निरीक्षण करते रहना चाहिए तभी लोकतंत्र की मजबूती को सुनिश्चित किया जा सकता है । इसके साथ-साथ लोकतंत्र को मजूबत करने के लिए जनता को भी प्रतिदिन अपने दायित्व को पूरी ईमानदारी के साथ पूरा करना होगा। क्योंकि लोकतंत्र कल्याणकारी तभी हो सकता है जनता और सरकारों दोनों एक दूसरे के कल्याण के लिए काम करें। जनता तार्किक मुद्दे सरकारों के सामने रखे और उन्हें पूरा करने के लिए उन पर दवाब बनाए । जनता का यह संघर्ष ज्ञान, आत्म विश्वास, समानता और विकासात्मक होना चाहिए। सही मायने में यही लोकतंत्र का सार है अन्यथा पाँच वर्ष के लिए चुनी गई सराकारें बस जादू की झप्पी लगाकर आपको खामोश करती रहेगी, जिसके जिम्मेदार सिर्फ हम लोग ही हैं उठिए लोकतंत्र की मजबूती के लिए काम करिए ।

Deepika Sharma

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