स्वास्थ्य

असर संपादकीय: गुरू के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का दिन है गुरु पूर्णिमा

शिक्षक ममाराज पुंडीर की कलम से…

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भारतीय पुरातन ग्रन्थों के अनुसार गुरू का अर्थ अन्धकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश देने वाला होता है। गुरु हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले होते हैं। आर्य सनातन वैदिक धर्मानुसार जो विद्यायुक्त ज्ञान का उपदेश कर्ता हैं वो जो वेदों का सृष्टि के आदि में ऋषियों को उपदेश कर्ता हैं और वह उन ऋषियों का भी गुरु हैं उस गुरु का नाम परमात्मा है। फिर भी लोक में विद्यादाता को गुरु कहा गया है । मान्यतानुसार गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार संभव हो पाता है और गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं हो पाता । जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है। इसलिए आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूजा का विधान है और इस दिन को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। वैदिक व मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है और इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाने का कार्य करते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए ये चार महीने अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। मान्यतानुसार गुरु पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह उज्जवल और प्रकाशमान होते हैं उनके तेज के समक्ष तो ईश्वर भी नतमस्तक हुए बिना नहीं रह पाते। गुरू पूर्णिमा का स्वरुप बनकर आषाढ़ रुपी शिष्य के अंधकार को दूर करने का प्रयास करता है। शिष्य अंधेरे रुपी बादलों से घिरा होता है जिसमें पूर्णिमा रूपी गुरू प्रकाश का विस्तार करता है। जिस प्रकार आषाढ़ का मौसम बादलों से घिरा होता है उसमें गुरु अपने ज्ञान रुपी पुंज की चमक से सार्थकता से पूर्ण ज्ञान का का आगमन होता है। गुरू आत्मा – परमात्मा के मध्य का संबंध होता है और गुरू से जुड़कर ही जीव अपनी जिज्ञासाओं को समाप्त करने में सक्षम होता है और इस प्रकार उसका साक्षात्कार ईश्वर से होता है।

आषाढ़ पूर्णिमा के दिन को गुरु पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा, मुड़िया पूनों आदि नामों से जाना जाता है। इस दिन बंगाली साधु सिर मुंडाकर परिक्रमा करते हैं क्योंकि इसी दिन सनातन गोस्वामी का तिरोभाव हुआ था। ब्रज में इसे मुड़िया पूनों कहा जाता है। इस दिन गोवर्धन पर्वत की श्रद्धालुओं के द्वारा परिक्रमा करने की परिपाटी है। यह दिन गुरु–पूजा का दिन होता है। इस दिन गुरु की पूजा की जाती है। पूरे भारत में यह पर्व बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। वैसे तो व्यास नाम के कई विद्वान हुए हैं परंतु व्यास ऋषि जो चारों वेदों के प्रथम व्याख्याता थे, आज के दिन उनकी पूजा की जाती है। हमें वेदों का ज्ञान देने वाले आदिगुरू व्यास जी की स्मृति को बनाए रखने के लिए अपने-अपने गुरुओं को व्यास जी का अंश मानकर उनकी पूजा करने की परम्परा है । इस दिन केवल गुरु की ही नहीं अपितु कुटुम्ब में अपने से जो बड़ा है अर्थात माता-पिता, भाई-बहन आदि को भी गुरुतुल्य समझ श्रद्धा भाव से पूजते है ।

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गुरु पूर्णिमा जगत गुरु माने जाने वाले वेद व्यास को समर्पित है और गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है । क्योंकि पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार आषाढ़ पूर्णिमा का दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी। इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। वेदों के सार ब्रह्मसूत्र की रचना भी वेदव्यास ने आज ही के दिन की थी। वेद व्यास ने ही वेद ऋचाओं का संकलन कर वेदों को चार भागों में बांटा था। उन्होंने ही महाभारत, पुराणों व उप पुराणों की रचना की थी जिनमें भागवत पुराण जैसा अतुलनीय ग्रंथ भी शामिल है। पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है और गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है। व्यास का शाब्दिक संपादक, वेदों का व्यास यानी विभाजन भी संपादन की श्रेणी में आता है। कथावाचक शब्द भी व्यास का पर्याय है। कथावाचन भी देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप पौराणिक कथाओं का विश्लेषण भी संपादन है। भगवान वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, 18 पुराणों और उपपुराणों की रचना की। ऋषियों के बिखरे अनुभवों को समाजभोग्य बना कर व्यवस्थित किया। पंचम वेद महाभारत की रचना इसी पूर्णिमा के दिन पूर्ण की और विश्व के सुप्रसिद्ध आर्ष ग्रंथ ब्रह्मसूत्र का लेखन इसी दिन आरंभ किया। तब देवताओं ने वेदव्यासजी का पूजन किया। तभी से व्यासपूर्णिमा मनायी जा रही है। भक्तिकाल के संत घीसादास का भी जन्म इसी दिन हुआ था वे कबीरदास के शिष्य थे।
शास्त्रों में गुरु का अर्थ बतलाते हुए कहा गया है- गु का अर्थ अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को गुरु कहा जाता है । कहा गया है-
अज्ञान तिमिरांधश्च ज्ञानांजन शलाकया,
चक्षुन्मीलितम तस्मै श्री गुरुवै नमः ।
गुरु तथा देवता में समानता स्थापित करते हुए कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। बल्कि सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है।

और भी कहा है –
गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर,
गुरु साक्षात् परमं ब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम: । ।
अर्थात- गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है। गुरु ही साक्षात परब्रह्म है। ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं।

वस्तुतः गुरु के प्रति नतमस्तक होकर कृतज्ञता प्रकट अर्थात व्यक्त करने का दिन है गुरुपूर्णिमा। लोक मान्यतानुसार गुरु के लिए पूर्णिमा से बढ़कर और कोई तिथि नहीं हो सकती। जो स्वयं में पूर्ण है, वही तो पूर्णत्व की प्राप्ति दूसरों को करा सकता है। पूर्णिमा के चंद्रमा की भांति जिसके जीवन में केवल प्रकाश है, वही तो अपने शिष्यों के अंत:करण में ज्ञान रूपी चंद्र की किरणें बिखेर सकता है। इसलिए इस दिन अपने गुरुजनों के चरणों में अपनी समस्त श्रद्धा अर्पित कर अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करने की पुरातन परम्परा कायम है । गुरु कृपा असंभव को संभव बनाती है। गुरु कृपा शिष्य के हृदय में अगाध ज्ञान का संचार करती है। यही कारण है कि प्राचीन काल से ही भारत में गुरू पूर्णिमा का पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाये जाने की परिपाटी है। पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करते थे तथा गुरू के समक्ष अपना समस्त बलिदान करने की भावना भी रखते थे, तो आषाढ़ पूर्णिमा के दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर छात्र अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतकृत्य होता था। जो आज भी बदस्तूर जारी है । पारंपरिक रूप से शिक्षा देने वाले विद्यालयों में, संगीत और कला के विद्यार्थियों में आज भी यह दिन गुरू को सम्मानित करने का अवसर होता है। मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, स्थान- स्थान पर भंडारे होते हैं और मेले लगते हैं।

 

Deepika Sharma

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