

रिटायर्ड मेजर जनरल एके शौरी
महाभारत में एक प्रसंग है जब युधिष्ठिर संजय को धृतराष्ट्र के पास जाकर अपना संदेश देने के लिए नियुक्त करते हैं। जब संजय मिले तो उन्होंने अपनी नाराजगी व्यक्त की और धृतराष्ट्र से कहा कि वह अगले दिन खुले सदन में युधिष्ठिर का संदेश सुनाएंगे ताकि अन्य मंत्री भी सुनें और पांडवों की पीड़ा के बारे में जानें। धृतराष्ट्र बहुत चिंतित हो गये और बड़े सोच में पड़ गये कि संजय अगले दिन क्या कहेंगे। उन्होंने विदुर से आने और उनसे मिलने का अनुरोध किया ताकि वह उनके साथ विचार-विमर्श कर सकें और साथ ही विदुर से कुछ नीति की बात को समझ सकें।जब विदुर आए तो धृतराष्ट्र ने उनसे कहा कि वह पूरी रात सो नहीं सके क्योंकि वह चिंतित हैं। विदुर ने उनसे कहा कि चूंकि पांडवों को वन क्षेत्रों में भेजने में वह भी एक पक्ष थे, इसलिए उनकी नाखुशी का कारण यही है। विदुर ने उनसे कहा कि इतने विद्वान और दयालु होते हुए उन्होंने दुर्योधन और दुशासन जैसे भ्रष्ट मानसिकता वाले व्यक्तियों को राज करने की अनुमति दी है। इन अकुशल शासकों के अधीन उसका राज्य कैसे फल-फूल सकता है? तब विदुर ने उन्हें समझाया कि असली पंडित किसे माना जाता है, उनकी विशेषताएं और खूबियां क्या होती हैं।
पंडित के लक्षण
जिस मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान, दुःख सहने की शक्ति और धर्म में आस्था रहती है, उसे कौन पुरुषार्थ से विमुख कर सकता है? दरअसल ऐसा मानव ही पंडित कहलाने का अधिकारी है। अपने वास्तविक स्वरूप के ज्ञान से अभिप्राय है अपनी क्षमता और सीमाएँ को जानने और समझने की अक्ल होना और धर्म से तात्पर्य किसी धार्मिक प्रथा या अनुष्ठान का ज्ञान नहीं है, बल्कि गुणों के अनुसार कार्य करना है। जो व्यक्ति बुरे कर्मों से दूर रहकर अच्छे कर्मों में लीन रहता है वही आस्तिक और भक्त होता है। यहां विदुर द्वारा आस्तिक और भक्त की एक अलग परिभाषा दी गई है क्योंकि वह किसी धार्मिक गतिविधियों पर नहीं बल्कि कर्म सिद्धांत पर जोर देते हैं। इसमें भगवान श्रीकृष्ण के कर्म दर्शन को महसूस किया जा सकता है। इसी क्रम में विदुर ने पंडित की विशेषताओं के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि वह व्यक्ति पंडित होता है जिसके मन में प्रसन्नता, लज्जा, क्रोध, काम वासना के भाव आते तो हैं लेकिन उसके पुरुषार्थ पर किसी प्रकार का असर नहीं डालते तथा वो अपने आप को बड़ा व् पूजनीय आदमी कभी नहीं समझता है; क्योंकि इन सब का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, वह स्वयं को सदैव हर हाल में एक जैसा ही रख पाने में सफल रहता है। दरअसल अगर हम याद करने की कोशिश करें तो यह बात श्री राम के आचरण, व्यवहार और जीवन के प्रति दृष्टिकोण में दिखाई देती है, जिन्हें राजा बनना था लेकिन उन्हें चौदह वर्षों के लिए जंगलों में जाना पड़ा; लेकिन उन्हें न तो राजा बनने की खुशी थी और न ही वन जाने का दुख। जिस व्यक्ति की राय, आचरण और कर्मों का मूल्यांकन दूसरे लोग उसके पूरा होने से पहले नहीं कर सकते, बल्कि उसके पूरा होने के बाद ही कर सकते हैं, ऐसा व्यक्ति ही सच्चा पंडित होता है। आइए इसे समझने की कोशिश करें. व्यक्ति को कभी भी अपने इरादों का खुलासा नहीं करना चाहिए और न ही अपने रहस्य और रणनीति पहले से बतानी चाहिए अन्यथा या तो वह असफल हो जाएगी या बर्बाद हो जाएगी। शुभचिंतक बहुत नहीं होंगे लेकिन शत्रु बहुत होंगे। अतः: जो व्यक्ति बातों को अपने तक ही सीमित रखता है और अपनी भावनाओं और अपने आंतरिक विचारों को प्रकट नहीं होने देता, वही सच्चा पंडित है।



