सम्पादकीय

असर संपादकीय: बेटी से बहु तक का सफर

मोनिका की कलम से

*मोनिका”

घर में जब एक बेटी की किलकारियां गूंजती हैं तो पिता के चेहरे पर मुस्कान के साथ चिंता भी घर कर जाती हैं। अरे हो भी क्यू ना बेटी की पढ़ाई लिखाई और फिर शादी भी तो करवानी है। ऊपर से घरवालों और रिश्तेदारों के ताने अलग। हां अगर बेटा हुआ तो बुढ़ापे में माता पिता की देख भाल से लेकर चिता को अग्नि भी तो बेटा ही देगा। आखरी समय में बेटी कहां काम आएगी। लेकिन मां अपनी बेटी को देख कर बहुत खुश हैं। अभी से बेटी के लिए सपने सजाने लगती हैं। लेकिन एक पिता ना तो अच्छे से बेटी होने की खुशी महसूस कर पा रहा है और ना एक बाब होने की खुशी को जी पा रहा है। दिल में बहुत कश्मश है। फिर एक लम्बी सी सांस लेता है ओर सोचता है बेटी है तो क्या हुआ मैं इसे अपने बेटे की तरह 

पालूंगा ।

अब बेटी का जन्म हो गया है, जैसे तैसे बेटी बड़ी हो रही है। पापा को शादी की चिंता सताने लगी है। तो वहीं दूसरी तरफ वो मां दिन रात सोचती रहती है पता नहीं मेरी लाडो को केसा घर बार मिलेगा वहा मेरी बेटी खुश तो रहेगी या नहीं। बस अब तो मां को दिन रात यही चिंता सताने लगी है । मां ही समय यह सोचती रहती मेरी बेटी को पति का प्यार और सास का दुलार मिलेगा या नहीं। बेटी को अच्छे से पढ़ाया लिखाया है, कहीं ना कही दिल को एक तसल्ली है कि मेरी बेटी पढ़ी लिखी है कल को कैसा भी समय आए वो सब संभाल लेगी। रीत भी तो देखो पहले पाल पोस कर बेटी को पढ़ाया लिखाई और अब विदा करना है। मां सोचती है कि मेरा तो पेट भी खाली हो गया और अब घर भी खाली हो जाएगा।

बेटी की पढ़ाई पूरी हो गई हैं। अब उसे एक अच्छा रिश्ता आया है माता-पिता से खुश है। लड़का अच्छा कमाता है। अपने माँ बाप की इक लौती औलाद है। शादी तय हो गई। अब पिता को बेटी के दहेज की चिंता दिन रात खाने लगी। मां बेटी को शिक्षा देती हैं घर का काम काज सिखाती हैं। मां कहती हैं बेटी अपने घर को कभी बिखरने मत देना हमेशा जोड़ कर रखना। मां बेटी को बताती हैं पति के चरणों में स्वर्ग होता है। ऐसा कोई भी काम मत करना के कभी हमारा सर शर्म से नीचा हो जाए। सेहमी सी बेटी कहती है तुम चिंता मत करो मां मैं सब संभाल लूंगी।

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शादी का दिन भी आ गया अब बेटी को विदा करने के बाद बाप ने एक लंबी सी सांस ली। चलो एक फर्ज तो पूरा हुआ बेटी तो होती ही पराया धन है। शादी के बाद ससुराल में बेटी को सब नया नया सा लग रहा है। सब रिश्तेदार पास है फिर भी एक अजीब सा अकेलापन लग रहा है। अब डर भी सताने लगा है माँ की बातें भी याद आ रही हैं। मन ही मन में सोच रही है मैं सब कुछ कैसे संभाल पाऊंगी, कुछ गड़बड़ हो गया तो। ये सब सोच ही रही होती है कि उतने में उसका पति सामने आ जाता है। पति को देखते चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट आती है मानो दिल को एक तस्ली सी मिलती हैं कि यह साथ है तो सब हो जाएगा।
अब बेटी के बाद बहु का फर्ज निभाना हैं। घर में सबसे पहले उठती हैं। मायके में जो बेटी सुबह सबसे अखरी में उठती थी वो अब ससुराल में सबसे पहले उठ जाती हैं। बिस्तर में चाय पीने वाली अब सबको उठते ही गरमा गर्म चाय की प्याली देती है। अब हर रोज सुबह सुबह खाना बनाती है और दिन भर काम करती हैं। थकी हारी रात के खाने को फिर से
खड़ी हो जाती हैं। सब की पसंद ना पसंद का ध्यान रखते रखते अपनी पसंद ना पसंद सब भूल जाती हैं। जब बेटी थी तो हजार नखरे थे, बात बात पर गुस्सा हो जाना। अब यह सब तो भूल ही गई हैं। बेटी तो मां से लाड लड़ा लेती थी अब सास तो बस कमियां निकलती है। खैर, अब समझ आया वो मां क्यू कहती थी घर को संभालना यह करना वो करना सब बाते याद आती हैं। दिन भर काम कर कर के अपने लिए तो समय निकालना मानो भूल ही गई हो। अब बीमार भी हो तो पीछे पीछे घूम घूम कर समय समय पर दवा खिलाने वाली मां भी तो नहीं है। बेटी से बहु तक के सफर में बेटी अब समझदार हो गई।

अब सास ससुर के साथ पति और बच्चों का भी ध्यान रखने लगी हैं। फुर्सत में उस मां को याद करती हैं जो उसे बीमार होने पर बिस्तर से उठने नहीं देती थी। घर का हर काम सिखाती पर खुद ज्यादा काम करती। मन ही मन में सोचती मां देख तेरी बेटी अब समझदार हो गई। वो बेटी से बहु बन गई। मां को दिल से सौ दुवाएं देती मां तेरे बिना मैं एक बेटी से बहु तक के सफर में शायद ही सफल हो पाती।

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