EXCLUSIVE: पत्र पर पत्र, जवाब का इंतजार; बंदरों के आतंक में विभागों के बीच फंसी शिमला की जनता
MC ने कई बार वन विभाग, वाइल्डलाइफ विंग और पशुपालन विभाग से उठाया मामला, लेकिन समाधान के बजाय जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने का सिलसिला
शिमला।
राजधानी शिमला में बंदरों का आतंक लगातार गंभीर होता जा रहा है। बंदरों के काटने, घरों में घुसने और लोगों पर हमला करने की घटनाएं सामने आ रही हैं, लेकिन इस समस्या के स्थायी समाधान को लेकर संबंधित विभागों के बीच समन्वय का अभाव अब बड़ा सवाल बन गया है। नगर निगम शिमला की ओर से कई बार संबंधित विभागों को पत्र लिखकर समस्या से अवगत करवाया जा चुका है, लेकिन निगम के स्तर पर उपलब्ध पत्राचार के अनुसार इन पत्रों का अपेक्षित जवाब और ठोस कार्रवाई सामने नहीं आ रही है।
स्थिति यह है कि नगर निगम एक विभाग को पत्र लिखता है, तो जिम्मेदारी दूसरे विभाग की बताई जाती है। वन विभाग, वाइल्डलाइफ विंग और पशुपालन विभाग के स्तर पर जिम्मेदारियों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होने से आखिरकार समस्या वहीं की वहीं रह जाती है। ऐसे में सवाल यह है कि जब समस्या सामूहिक है तो समाधान के लिए विभाग एक टेबल पर बैठकर संयुक्त कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे?
10 जुलाई का पत्र गंभीरता की पूरी तस्वीर दिखाता है
नगर निगम शिमला ने 10 जुलाई 2026 को मंडलीय वन अधिकारी, वन्यजीव प्रभाग शिमला को पत्र लिखकर बंदरों के बढ़ते आतंक पर तत्काल कार्रवाई की मांग की थी। पत्र में कहा गया कि बंदरों की समस्या स्थानीय निवासियों, विशेषकर स्कूली बच्चों और बुजुर्गों के लिए गंभीर चिंता बन चुकी है। बंदरों के काटने की घटनाएं बढ़ने का भी उल्लेख पत्र में किया गया।
MC ने पत्र में शिमला के समिट्री क्षेत्र की उस घटना का हवाला दिया, जिसमें बंदरों के हमले से बचने के दौरान एक बुजुर्ग महिला छत से गिरकर घायल हो गई थी और उसे अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। निगम ने समस्या पैदा करने वाले बंदरों को नियमों के तहत पकड़ने अथवा रेस्क्यू कर सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने की मांग की थी।
लेकिन 10 जुलाई के इस पत्र के बाद क्या कार्रवाई हुई, क्या जवाब मिला और कितने बंदरों को पकड़ा गया—यह सवाल अब भी महत्वपूर्ण बना हुआ है।
एक-दूसरे की जिम्मेदारी बताने से नहीं निकलेगा समाधान
MC की आधिकारिक वेबसाइट पर भी दर्ज है कि निगम को बंदरों के काटने और उनके आतंक की शिकायतें मिलती रहती हैं तथा बंदरों से जुड़े मामलों को वन विभाग के वाइल्डलाइफ विंग के समक्ष उठाया जाता है।
इसके बावजूद स्थिति यह है कि निगम की ओर से वन विभाग, वाइल्डलाइफ विंग और पशुपालन विभाग समेत संबंधित एजेंसियों को बार-बार पत्राचार किए जाने के बावजूद अपेक्षित जवाब नहीं मिल पा रहा है। नतीजा यह है कि जिम्मेदारी किसकी है, इसे लेकर विभागीय स्तर पर स्थिति साफ होने के बजाय एक-दूसरे की ओर जिम्मेदारी स्थानांतरित होती रहती है।
अगर बंदरों को पकड़ना वन्यजीव विभाग की जिम्मेदारी है, नसबंदी के लिए पशु चिकित्सा विशेषज्ञता पशुपालन विभाग से जुड़ी है और शहर में नागरिक सुरक्षा तथा कूड़ा प्रबंधन नगर निगम से संबंधित है, तो इन सभी विभागों को साथ बैठाने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
हाईकोर्ट भी दे चुका है समन्वय से कार्रवाई के निर्देश
बंदरों की समस्या पर विभागों के बीच समन्वय का सवाल नया नहीं है। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने आदेश में भी बंदरों और आवारा कुत्तों के हमलों से बच्चों और बुजुर्गों के प्रभावित होने का उल्लेख किया था। कोर्ट ने नगर निगम और वन विभाग को समस्या से निपटने के प्रयास जारी रखने के साथ-साथ बंदर पकड़ने वाले कर्मियों को प्रशिक्षण देने, बंदरों के स्थानांतरण के लिए क्षेत्र चिन्हित करने और पकड़ने व छोड़ने की प्रक्रिया के लिए SOP तैयार करने जैसे निर्देश दिए थे।
इसके बावजूद राजधानी में आज भी मूल सवाल वही खड़ा है—कार्रवाई कौन करेगा और उसकी जवाबदेही किसकी होगी?
सदन में भी उठा मामला, फिर भी जनता को राहत नहीं
सितंबर में नगर निगम सदन में भी बंदरों और आवारा कुत्तों के आतंक को लेकर हंगामा हुआ था। रिपोर्ट के अनुसार सदन में पार्षदों ने जनता को राहत देने की मांग उठाई। वहीं वन विभाग की ओर से बंदरों की जिम्मेदारी नगर निगम के हवाले किए जाने की बात सामने आई। इसके जवाब में सदन ने प्रस्ताव पारित किया कि निगम तभी बंदरों की जिम्मेदारी संभालेगा, जब रेस्क्यू सेंटर और वन विभाग का स्टाफ निगम को उपलब्ध कराया जाए।
यानी जिम्मेदारी नगर निगम की बताई जा रही है, लेकिन उसे निभाने के लिए जरूरी संसाधन और विशेषज्ञ स्टाफ कहां से आएगा, इसका स्पष्ट रोडमैप अभी भी बड़ा सवाल है।
नसबंदी कार्यक्रम भी सवालों के घेरे में
बंदरों की बढ़ती समस्या के बीच नसबंदी कार्यक्रम की स्थिति भी चिंता का विषय है। जुलाई 2026 में प्रकाशित IGMC के अध्ययन में बंदर काटने के मामलों को गंभीरता से चिन्हित किया गया। अध्ययन में बंदर काटने के मामले कुल रिपोर्टेड पशु-काटने के मामलों का 36 प्रतिशत बताए गए और नसबंदी कार्यक्रम के लंबे समय तक प्रभावित रहने तथा संसाधनों की कमी को समस्या से जोड़ा गया।
ऐसे में सिर्फ पत्र लिखने और जवाब का इंतजार करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। नसबंदी कहां और कितनी हो रही है, रेस्क्यू की व्यवस्था क्या है, समस्या वाले बंदरों की पहचान कैसे होगी और उन्हें कहां स्थानांतरित किया जाएगा—इन सभी सवालों का स्पष्ट जवाब और जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
अकेला MC आखिर क्या करेगा?
बंदरों का आतंक केवल नगर निगम की समस्या नहीं है। यह वन्यजीव प्रबंधन, पशु चिकित्सा, स्वास्थ्य, कूड़ा प्रबंधन और नागरिक सुरक्षा से जुड़ा संयुक्त मामला है। इसलिए नगर निगम को अकेला छोड़कर इस समस्या का समाधान संभव नहीं है।
हिमाचल प्रदेश वन विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर शिमला शहर में बंदरों से संबंधित शिकायतों के लिए हेल्पलाइन नंबर तक जारी किया गया है
फिर सवाल यह है कि जब शिकायतें आ रही हैं, नगर निगम पत्र लिख रहा है और विभागों को समस्या की जानकारी है, तो शिकायत के बाद की कार्रवाई की निगरानी कौन करेगा?
सरकार को होना होगा गंभीर
अब पत्राचार नहीं, संयुक्त एक्शन प्लान चाहिए
शिमला में बंदरों के आतंक को लेकर अब सरकार को नगर निगम, वन विभाग, वाइल्डलाइफ विंग, पशुपालन विभाग और जिला प्रशासन की संयुक्त बैठक बुलाकर समयबद्ध एक्शन प्लान तैयार करना चाहिए। इसमें बंदरों के हॉटस्पॉट चिन्हित करने, नसबंदी अभियान को नियमित करने, समस्या पैदा करने वाले बंदरों के रेस्क्यू, सुरक्षित स्थानांतरण, प्रशिक्षित मंकी कैचर उपलब्ध कराने, कूड़ा प्रबंधन और लोगों की सुरक्षा के उपायों की स्पष्ट जिम्मेदारी तय हो।
क्योंकि आम आदमी के लिए यह जानना मायने नहीं रखता कि बंदर किस विभाग की जिम्मेदारी है। उसे सिर्फ यह चाहिए कि उसके घर के बाहर, रास्ते में, स्कूल जाते बच्चों के सामने या छत पर बंदरों का खतरा न रहे।
शिमला की जनता अब यह सवाल पूछ रही है—MC पत्र लिखता रहे, विभाग जवाब का इंतजार करवाते रहें और जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालते रहें, तो आखिर कार्रवाई कब होगी?
बंदरों के आतंक का समाधान किसी एक विभाग की फाइल में नहीं, बल्कि सभी संबंधित विभागों के एक टेबल पर बैठने और जिम्मेदारी तय कर जमीन पर कार्रवाई करने से निकलेगा।
कुत्तों के काटने के मामले भी बढ़े, नसबंदी अभियान को चाहिए विभागीय सहयोग
बंदरों के साथ शिमला में आवारा कुत्तों के काटने के मामले भी चिंता बढ़ा रहे हैं। शहर में डॉग बाइट के मामले सामने आने के बावजूद समस्या को केवल नगर निगम की जिम्मेदारी मानकर छोड़ना पर्याप्त नहीं होगा। कुत्तों की संख्या नियंत्रित करने और नसबंदी अभियान को गति देने के लिए नगर निगम को पशुपालन विभाग का भी सक्रिय सहयोग मिलना जरूरी है।
नगर निगम की ओर से कुत्तों की नसबंदी का काम किया जा रहा है, लेकिन यदि पशुपालन विभाग के अस्पतालों और वहां उपलब्ध पशु चिकित्सकों की विशेषज्ञता और सुविधाओं का बेहतर समन्वय निगम के साथ किया जाए तो नसबंदी अभियान को और तेजी दी जा सकती है। इससे नगर निगम पर अकेले काम करने का दबाव भी कम होगा और अधिक संख्या में कुत्तों की नसबंदी संभव हो सकेगी।
जरूरत इस बात की है कि नगर निगम और पशुपालन विभाग मिलकर एक संयुक्त कार्ययोजना बनाएं, जिसमें नसबंदी के लिए लक्ष्य तय हों, क्षेत्रवार अभियान चलाया जाए और उसकी नियमित निगरानी हो। साथ ही, जहां कुत्तों के काटने की घटनाएं ज्यादा सामने आ रही हैं, उन हॉटस्पॉट की पहचान कर वहां विशेष अभियान चलाया जाए।
बंदर हों या आवारा कुत्ते—समस्या का स्थायी समाधान तभी संभव है, जब नगर निगम को संबंधित विभागों का पूरा तकनीकी, चिकित्सकीय और मानव संसाधन सहयोग मिले। अकेले निगम से हर मोर्चे पर परिणाम की उम्मीद करना भी व्यावहारिक नहीं है। पशुपालन विभाग के डॉक्टर और अस्पताल इस अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।


