
लेखक – असर मीडिया हाउस डेस्क
श्रेणी – समाज / अपराध / युवा
1. प्रस्तावना: पहाड़ों पर चढ़ती ‘चिट्टा’ की सफ़ेद लकीर
हिमाचल प्रदेश, जिसे हम देवभूमि कहते हैं, आज ‘चिट्टा’ (हेरोइन) और सिंथेटिक नशों की मार से जूझ रहा है।
पहाड़ों की शांति के बीच, गांव–कस्बों में एक ख़ामोश युद्ध चल रहा है –
एक तरफ़ नशा माफिया, दूसरी तरफ़ हमारा युवा भविष्य।
राज्य में NDPS एक्ट के तहत दर्ज मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। 2022 में 1,517 मामलों के मुकाबले 2023 में 2,147 केस दर्ज हुए – यानी करीब 42% की बढ़ोतरी।The Times of India+1
2020 से अब तक पुलिस लगभग 70 किलो हेरोइन पकड़ चुकी है, जो इस नेटवर्क की गहराई और विस्तार दोनों दिखाती है।The Times of India
2. हिमाचल में ‘चिट्टा’ माफिया की वर्तमान तस्वीर
2.1 हॉटस्पॉट जिले और आंकड़े
हाल के आंकड़ों के अनुसार:
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शिमला – 51 चिट्टा से जुड़े मामले
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मंडी – 42 मामले
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कांगड़ा – 36
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बिलासपुर – 32
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ऊना, सिरमौर – 23–23 मामले
जबकि लाहौल–स्पीति जैसे कुछ आदिवासी क्षेत्रों में अभी तक एक भी हेरोइन ज़ब्ती दर्ज नहीं हुई है।Moneycontrol
सिर्फ जनवरी 2024 से सितंबर 2024 के बीच पुलिस ने लगभग 7.8 किलोग्राम हेरोइन (चिट्टा), 200 किलो से ज़्यादा चरस और बड़ी मात्रा में अफीम, गांजा, पोस्ता इत्यादि बरामद की।The Tribune
ये आंकड़े दो बातें एक साथ बताते हैं:
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पुलिस कार्रवाई बढ़ी है,
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लेकिन नशा तस्करी की जड़ें भी उतनी ही गहरी हैं।
2.2 कोर्ट और संस्थाओं की चेतावनी
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने कई आदेशों में साफ कहा है कि राज्य में ड्रग्स, ख़ासकर किशोरों और विद्यार्थियों के बीच, “गंभीर और चिंताजनक स्तर” तक पहुँच चुके हैं।Indian Kanoon+1
एक अध्ययन में यह पाया गया कि पहले शराब और चरस–गांजा अधिक आम थे, लेकिन अब रुझान तेजी से सिंथेटिक ड्रग्स और हेरोइन/चिट्टा की ओर शिफ्ट हो रहा है, जो कहीं ज़्यादा मारक और लत पैदा करने वाले हैं।ijip.in
3. युवाओं में पनपती नशे की लत: अपराध, टूटते परिवार और खोता भविष्य
3.1 petty crime से लेकर हिंसा तक
रिपोर्टों के अनुसार, चिट्टा की लत ने हिमाचल के सैकड़ों युवाओं को चोरी, लूट और घरेलू हिंसा तक धकेल दिया है। नकद, मोबाइल, ज़ेवर, घर से सामान – सब नशे के लिए बेच दिया जाता है।The Tribune
कई मामलों में:
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माता–पिता के साथ मारपीट,
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घर से भाग जाना,
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स्कूल–कॉलेज छोड़ देना,
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छोटे–मोटे अपराधों से शुरू कर संगठित नशा–तस्करी तक जुड़ जाना,
ऐसी घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं।
3.2 सामाजिक और मानसिक असर
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परिवार आर्थिक रूप से टूटते हैं,
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गांवों में “फलाँ लड़का तो चिट्टे में चला गया” जैसे वाक्य सामान्य हो चुके हैं,
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छात्र पढ़ाई छोड़कर नशे के चक्र में फँस जाते हैं,
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मानसिक स्वास्थ्य – अवसाद, चिंता, आत्महत्या की प्रवृत्ति – बढ़ रही है।
समस्या सिर्फ “कानूनी” नहीं, पूरी तरह सामाजिक–मानसिक है।
4. सरकार की घोषणाएँ और नीतियाँ: काग़ज़ पर युद्ध, ज़मीन पर कितनी लड़ाई?
4.1 राज्य ड्रग नीति और विशेष टास्क फोर्स
हिमाचल सरकार ने 2022 में स्टेट ड्रग पॉलिसी जारी की, जिसमें चिट्टा/हेरोइन और अन्य ओपिऑइड ड्रग्स को लेकर विशेष चिंता जताई गई – खासकर शिमला, कुल्लू जैसे क्षेत्रों के लिए।esomsa.hp.gov.in
जनवरी 2025 में सरकार ने नशा और संगठित अपराध से निपटने के लिए Special Task Force (STF) बनाने का फैसला लिया। यह STF:
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संगठित नेटवर्क पर फोकस,
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बड़े तस्करों की संपत्ति ज़ब्त,
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बार–बार अपराध करने वालों पर कड़ी कार्रवाई,
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STF के अलग थाने और स्वतंत्र जांच।The New Indian Express+1
हाल में PIT-NDPS के तहत 40 से अधिक बड़े तस्करों को डिटेन करने और दर्जनों करोड़ की संपत्तियाँ जब्त करने की बात सरकार ने सार्वजनिक कार्यक्रमों में कही है।The Times of India+1
4.2 Anti-Chitta Volunteer Scheme और वॉकाथन
सरकार ने Anti-Chitta Volunteer Scheme (ACVS) शुरू करने की घोषणा की –
जिसमें 1000 से अधिक स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित कर उन्हें पुलिस के साथ मिलकर नशे के हॉटस्पॉट चिन्हित करने, जागरूकता फैलाने और युवाओं को काउंसलिंग/रीहैब से जोड़ने की भूमिका दी जा रही है।The Times of India
हाल ही में मुख्यमंत्री के नेतृत्व में एंटी-चिट्टा वॉकाथन, स्कूलों–कॉलेजों में जागरूकता कार्यक्रम, और “ड्रग-फ्री कैंपस” अभियान के तहत 12ों ज़िलों के 40 से ज़्यादा शैक्षणिक संस्थानों में सर्च और चेकिंग अभियान चलाए गए, जिनमें FIR दर्ज हुईं और सैकड़ों दुकानों/वेंडरों की जांच की गई।The Times of India+1
सरकारी बयान कहते हैं – “स्थिति नियंत्रण में है, NDPS मामलों का हिस्सा कुल IPC अपराधों का लगभग 9% है।”Himachal Pradesh Government
5. पुलिस और प्रशासन की भूमिका: कार्रवाई भी, सवाल भी
5.1 सख़्त कार्रवाई के उदाहरण
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NDPS मामलों में लगातार वृद्धि इस बात की भी संकेत देती है कि पुलिस अधिक केस दर्ज कर रही है और छापेमारी बढ़ी है।The Times of India+1
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पुलिस ने कई मौकों पर बाहरी राज्यों (खासकर पंजाब, उत्तराखंड) से जुड़े तस्करों को पकड़ा है।India Narrative+1
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सरकार का दावा है कि नशा तस्करी में शामिल सरकारी कर्मचारियों/पुलिसकर्मियों पर भी कड़ी कार्रवाई की जा रही है, और ऐसे कर्मचारियों को सेवा से हटाने तक की चेतावनी दी गई है।Himachal Pradesh Government
5.2 लेकिन जनता के सवाल: “चिट्टा बिक कैसे रहा है?”
इसके बावजूद, ज़मीनी स्तर पर तीन प्रकार की नाराज़गी साफ दिखाई देती है:
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आम धारणा: “अगर पुलिस और प्रशासन सच में कड़ाई से काम करे तो मोहल्ले–मोहल्ले में खुलेआम नशा नहीं बिक सकता।”
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गठजोड़ की आशंका:
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लोकल स्तर पर कुछ पुलिसकर्मियों, पंचायत प्रतिनिधियों या छोटे–मोटे नेताओं की “मिलीभगत” के आरोप अक्सर सुनाई देते हैं।
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सरकार को इतनी बार यह कहना पड़े कि “कर्मचारियों पर भी सख़्त कार्रवाई होगी” – यह खुद इस बात का संकेत है कि सिस्टम के भीतर घुसपैठ की आशंका वास्तविक है।Himachal Pradesh Government+1
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किस पर ज़्यादा सख़्ती?
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छोटे–मोटे उपयोगकर्ता और पेडलर आसानी से पकड़े जाते हैं,
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लेकिन “बड़ी सप्लाई चेन” और असली फाइनेंसर पर कार्रवाई कम नज़र आती है – यह धारणा कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टों और अभियानों में उभरकर आई है।PHM India+1
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यह भी सच है कि पड़ोसी राज्य पंजाब ने बार–बार आरोप लगाया है कि हिमाचल को अपनी सीमाओं और पर्यटक क्षेत्रों में नशे के खुला कारोबार पर ज़्यादा जिम्मेदारी लेनी चाहिए, और सिर्फ बाहर से सप्लाई पर दोष मढ़ना पर्याप्त नहीं।The Times of India
6. प्रशासन की विफलता के आयाम
6.1 उपचार और पुनर्वास की कमज़ोर व्यवस्था
कई राष्ट्रीय/स्थानीय रिपोर्टों में यह माना गया है कि हिमाचल में:
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डि-ऐडिक्शन और पुनर्वास केंद्र पर्याप्त नहीं हैं,
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जो हैं भी, वहाँ प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता कम हैं,
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नशे से बाहर निकलकर वापस सामान्य जीवन में लौटने की व्यवस्था कमजोर है।PHM India+1
कानून केवल पकड़–धकड़ करते हैं,
लेकिन लत का इलाज, परिवार की काउंसलिंग और समाज में पुनर्वापसी –
इन पर अभी भी पर्याप्त फोकस नहीं है।
6.2 स्कूल–कॉलेज और नौकरी की दुनिया में प्रिवेंशन की कमी
हालाँकि अब “ड्रग-फ्री कैंपस” अभियान चल रहा है, लेकिन:
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कई वर्षों तक स्कूल–कॉलेजों में नशा–रोधी शिक्षा गंभीरता से नहीं दी गई,
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करियर तनाव, बेरोजगारी और खाली समय ने युवाओं को नशे की तरफ धकेला,
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पंचायत, युवक मंडल, महिला मंडल स्तर पर स्थायी प्रोग्रामिंग दुर्लभ रही।Business Standard+2The Times of India+2
7. ‘चिट्टा’ के खिलाफ असली लड़ाई कहाँ है? सिर्फ गिरफ्तारी नहीं, healing जरूरी
हाल की विश्लेषणात्मक रिपोर्टों ने साफ लिखा है कि:
“सिर्फ गिरफ़्तारियाँ और सीज़र्स से समस्या हल नहीं होगी;
असली लड़ाई डि-ऐडिक्शन, पुनर्वास और सामाजिक पुनर्समावेशन में है।”The Times of India+1
यानी:
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सप्लाई रोकना = पुलिस/कानून का काम,
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डिमांड कम करना = पूरा समाज, परिवार, स्कूल, प्रशासन, स्वास्थ्य तंत्र का काम।
जब तक:
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नशेड़ी को अपराधी से पहले “मरीज” नहीं माना जाएगा,
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उसे इलाज और सम्मानजनक वापसी का रास्ता नहीं दिया जाएगा,
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तब तक वह या तो अपराध की तरफ़ जाएगा या फिर सिस्टम से और बाहर होता जाएगा।
8. आगे की राह: हिमाचल के लिए क्या ज़रूरी है?
8.1 सरकार और पुलिस के लिए
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बड़े नेटवर्क पर फोकस:
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छोटे उपयोगकर्ता नहीं, बड़े सप्लायर, फाइनेंसर और बॉर्डर नेटवर्क पर और आक्रामक कार्रवाई।
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पारदर्शिता:
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NDPS मामलों, ज़ब्त संपत्तियों, सज़ा की दर, और पुलिस–कर्मचारियों पर हुई कार्रवाई के आंकड़े सार्वजनिक पोर्टल पर नियमित अपडेट हों।
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पुलिस सुधार:
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भर्तियों में अनिवार्य ड्रग टेस्ट (जो अब शुरू हो चुका है),The Times of India
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विभाग के भीतर ज़ीरो-टॉलरेंस नीति, समय–समय पर इंटर्नल विजिलेंस।
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8.2 समाज और परिवार के लिए
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माता–पिता का जागरूक और संवादपूर्ण होना:
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बच्चों की दिनचर्या, मित्र–मंडली, अचानक खर्च बढ़ना, घर से सामान गायब होना – संकेतों को गंभीरता से लें।
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कलंक (stigma) कम करना:
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नशे में फँसे बच्चे को “कमीना/अपराधी” कहकर नहीं,
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“मदद की ज़रूरत वाले इंसान” की तरह देखें।
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युवा संगठनों और पंचायतों की भूमिका:
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नशा–रोधी क्लब, स्पोर्ट्स एक्टिविटी, जॉब–काउंसलिंग, करियर–गाइडेंस – यह सब “एंटी-चिट्टा फ्रंट” का हिस्सा होना चाहिए।
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8.3 मीडिया, खासकर असर मीडिया हाउस के लिए
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नशा माफिया के खिलाफ साहसिक रिपोर्टिंग,
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पीड़ित परिवारों की कहानियाँ,
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फर्जी एनकाउंटर–रोमांटिकाइज़ेशन से बचकर तथ्यपूर्ण पत्रकारिता,
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सरकार–पुलिस से कड़े लेकिन न्यायपूर्ण सवाल,
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और सबसे ज़रूरी –
युवाओं को उम्मीद, रास्ता और विकल्प दिखाना।
9. निष्कर्ष: “चिट्टा” से लड़ाई सिर्फ पुलिस की नहीं, पूरी पीढ़ी की है
हिमाचल में “चिट्टा माफिया” के खिलाफ अभियान चल रहे हैं,
कानून सख़्त हुए हैं, टास्क फोर्स बनी है, वॉकाथन हो रहे हैं –
लेकिन अगर इसके बावजूद गली–गली नशा बिक रहा है,
तो यह साफ संकेत है कि लड़ाई आधी है, पूरी नहीं।
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सरकार को घोषणाओं से आगे जाकर पारदर्शी और दीर्घकालीन रणनीति देनी होगी,
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पुलिस को जनता का भरोसा जीतने के लिए ईमानदार, निष्पक्ष और निरंतर कार्रवाई करनी होगी,
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और समाज को यह समझना होगा कि
हर नशेड़ी के पीछे एक टूटा हुआ बच्चा है,
जिसे हमने समय रहते थामने की कोशिश ही नहीं की।
देवभूमि हिमाचल को नशामुक्त करने की लड़ाई –
सिर्फ नारों से नहीं,
सच को स्वीकार कर, सिस्टम को बदलकर और बच्चों को सहारा देकर ही जीती जा सकती है।




