असर संपादकीय: दिल को झकझोरने आई “चंबल की चिट्ठी”
देश की जानी-मानी वृत्तचित्र निर्माता- निर्देशिका रेणु नेगी का आया नया वृतचित्र

चिट्ठियां तरह तरह की सिफ़त भरे संदेशे अपने साथ लेकर चलती हैं– उनका इन्तजार हर किसी को रहता है। कुछ खास संदेश लेकर एक वृत्तचित्र आया है “चम्बल की चिट्ठी”।
यह चिट्ठी साधारण चिट्ठी नहीं है बल्कि इसमें सदियों का और आज का दर्द है। पीड़ा है और तकलीफ है जिसे लेकर आयी हैं देश की जानी-मानी वृत्तचित्र निर्माता- निर्देशिका रेणु नेगी। रेणु नेगी हिमाचल प्रदेश के किन्नौर-कैलाश की फिजाओं में जन्मी हैं और आज देश की पहली आदिवासी महिला फिल्म निर्माता हैं।
हाल ही में पूरबी राजस्थान के चंबल के बदनाम बीहड़ में जाकर जीवट के साथ उन्होंने वहाँ पानी की कमी की पीड़ा की वास्तविकताओं को समझकर उसे मुकम्मल जुबान दिया। लिहाजा, यह फिल्म लोगों के दर्द का दृश्यों में ढला महज हुलिया या हवाला नहीं है बल्कि उन सच्चाईयों का ज़िंदा दस्तावेज है जिसकी गांठीं अभी खुल नहीं सकी हैं।
रेणु की फिल्मों का सफर तीन दशकों का है अपने उत्कृष्ट कार्य के लिए उन्हें International human rights (IHRO) एवं हिमाचल प्रदेश के मीडिया ग्रुप ने इन्हें ” नारी तू नारायणी” से भी सम्मानित किया गया l इतने समय में उनकी ज़िद्द, प्रतिबद्धता ने उन्हें उत्तर भारत के तमाम वृत्तचित्र निर्माताओं से अलहदा पहचान दी है। उन्होंने विज्ञान, स्वास्थ्य, पर्यटन, शिक्षा, कला और संस्कृति, आदिवासी क्षेत्रों मुद्दों सहित लगभग जरूरी विषय पर लघु फिल्में, सीरिअल, डॉक्यू-ड्रामा, वृत्तचित्र और टीवी विज्ञापन बनाए हैं।
Yak the ship of mountain डाक्यूमेंट्री फिल्म के लिए साल 2018 में 8वें भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान फिल्म महोत्सव (एनएसएफएफआई) में उन्होंने दो पुरस्कार जीते। फिल्म को सर्वश्रेष्ठ विज्ञान फिल्म के लिए सिल्वर बीवर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा, फिल्म की सुंदरता को खूबसूरती से चित्रित करने के लिए सर्वश्रेष्ठ सिनेमैटोग्राफी का पुरस्कार भी जीता। इस के इलावा मत्स्य पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म , हिमाचल के आदिवासी पर बनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म और कई अन्य विषयों पर बनी फ़िल्मों के लिए रेणु को भारत सरकार से प्रशंसा प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया है।
महज लघु फिल्म या वृत्त चित्र ही नहीं बल्कि वे भारत सरकार के विज्ञान ओटीटी प्लेटफॉर्म और सिनेमा घरो के साथ कई प्रोजेक्ट में भी सक्रिय हैं।
यह एक दिलचस्प सच है कि उनकी बनायी कई फिल्में राष्ट्रीय अभिलेखागार में सुरक्षित रखी गयी हैं। यह गौरव और गरिमा की बात है। बेशक, जीवट से लबालब रेणु की शख्सियत अपने समाज और अपने राज्य की ही नहीं बल्कि समूचे भारत की प्रेरणा बन चुकी हैं।
रेणु को प्रकृति से प्यार है, उसकी खूबसूरती से और उसकी जैव-विविधता से। वह व्यावहारिक नजरिया रखकर अपनी आबोहवा को दिल के करीब और आत्मा में रचा-बसा पाती हैं। उनकी तकलीफें भी इसी प्यार की गवाही है जो चम्बल की चिट्ठी से उभर कर कई सवाल करती है। उनके दिल्ली स्थित R N Production के बैनर तले पूरबी राजस्थान पर बनी डाक्यूमेंट्री फिल्म चम्बल की चिट्टी राजस्थान में पानी से जुड़े कई सवाल रखती है। आज की पीढ़ी को चम्बल में पसरी पानी की पीड़ा उन्होंने इस फिल्म के जरिये बताया है कि कैसे बेबसी अपने लोकतंत्र का तिलिस्म मात्र बनकर बेपरवाही की किस्मत की भेंट चढ़ चुका है। जैसे पानी को पिकनिक और अय्याशी का जरिया बना रही आज की पीढ़ी को वह नसीहत देकर हलक गीली करने की गुहार लगाती आबादी के हकों को मुकम्मल आवाज देतीं हैं। वह बताने की कोशिश करती हैं कि चम्बल में पसरी पानी की पीड़ा की निरंतरता कोई साल-दर साल का नतीजा कतई नहीं है बल्कि सदियों का नतीजा है। रेणु समस्याओं को पानी की इस समस्या को रखकर अपना पल्ला नहीं झाड़ती हैं बल्कि सरकार की पहल से चम्बल में तेज़ हो रही पानी की कलकल धार को अपनी फिल्म का स्वर बनाकर लोकमानस के बीच उम्मीदों भरी प्रेरणा स्थापित करने में सफल होती हैं। बकौल रेणु, “मुझे पूरी उम्मीद है कि इस वृत्तचित्र के माध्यम से हम सभी के लिए जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक साथ आएंगे और सरकार ईआरसीपी को एक राष्ट्रीय परियोजना बना सकती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि हर इंसान को पानी तक पर्याप्त पहुंच मिले।”
यह एक महत्त्वपूर्ण कालखंड है जिसमें वृत्तचित्र की दुनिया में रेणु नेगी अपनी प्रतिबद्धता साबित करती जा रही है। उन्होंने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय, सरकारी/निजी एजेंसियों के लिए विभिन्न विषयों पर अभी तक 95 से अधिक फिल्में बनाई हैं । उनकी कई फिल्में दूरदर्शन के नेशनल चैनल और सिनेमा घरों पर प्रसारित की गई हैं। ये फिल्में देश की घुमक्क्ड़-खानाबदोश विलुप्तप्राय आदिवासियों की भी हैं जिनमें उनकी जीवन-शैली, कला, लोकाचार से लेकर अबूझ परम्पराओं का ख़ास प्रतिबिम्बन है। वह लोकजीवन से लेकर भौगोलिक दुरूहताओं को भी अपनी फिल्मों में समेटती हैं। इसी क्रम में वह चम्बल के भय भरे माहौल में जाकर उन बदहालियों को फिल्मांकित किया है, यह उनकी साहस और दिलेरी की गवाही है। अंततोगत्वा, उन्होंने उन मान्यताओं को ध्वस्त किया है कि फिल्म निर्माण का काम औरतें नहीं कर सकतीं। उन्होंने इस भ्रम को भी तोड़ा है कि मुम्बई के बिना फिल्में नहीं बन सकतीं। रेणु की उपलब्धियों से तीसरा भ्रम भी कुहासे की तरह छंट चुका है कि आदिवासी महिलाएं भला फिल्म निर्माण कैसे कर सकती हैं। चूँकि रेणु का मकसद आत्म प्रचार नहीं है, वह हंगामा और प्रचार के मंसूबों के साथ काम नहीं करती बल्कि एक खूबसूरत ज़िद्द और मनभावन शालीनता से वह अपने काम को अंजाम देती हैं। चम्बल की चिट्ठी की सशक्त प्रस्तुति रेणु की उस ख़ास दृष्टि की गवाही है जिसे उन्होंने अपने अनुभवों से बटोरा और सजाया है।
चम्बल की चिट्ठी वृत्तचित्र के निर्माण के दौरान उनकी प्रतिबद्धता स्थानीय लोगों को स्तब्ध और विस्मित करती थी। समाज को अपने सकारात्मक कार्यों से उत्प्रेरित करने वाली रेणु को अपने देश पर अभिमान है। पानी को लेकर रेणु की संवेदना जल से वंचित अवाम को साहस और सम्बल देती है। रेणु नेगी यह कथन कितना मर्मस्पर्शी है कि जिस दिन पूरबी राजस्थान पानीदार हो जाएंगे, उस दिन उन्हें ऑस्कर हासिल करने जैसा सुख उन्हें महसूस होगा। सच में आदिवासी बेटियां ऐसी ही होती हैं।


