सम्पादकीय

असर संपादकीय: खुद अपने अंदर झांक कर प्रसन्नता पाना

अर्जुनराम मेघवाल की कलम से...लेखक बीकानेर से संसद सदस्य तथा केंद्रीय संसदीय मामलों, भारी उद्योग और सार्वजनिक उद्यम के राज्य मंत्री हैं

 

20 मार्च को दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस मनाया जाता है। पिछले साल इस दिन दुनिया भर में मानवता असमंजस में थी क्योंकि कोविड-19 महामारी सिर पर मंडरा रही थी। इस सदी की सबसे बड़ी महामारी, जिसके दुखद अनुभव ने मानवीय विवेक को पूरी तरह हिला कर रख दिया, चरम पर पहुँच कर अब नीचे आ रही है। ऐसे समय में जब कि मानवता इस वैश्विक संकट का मिल कर सामना कर रही है तब इस साल का ‘अंतर्राष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस’ खुद को तथा औरों को संभालने और सकारात्मक तरीके से आगे का रास्ता खोजने का एक मौका देता है। इस वर्ष इस दिवस की थीम उपयुक्त ही है ‘शांत रहें, समझदार बनें, दयालुता रखें’। यह थीम सीखने, सीखा हुआ भूलने तथा फिर से नया सीखने के लिए हम सब के लिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि इसी से हम खुशियां प्राप्त कर सकते हैं। 

दुनिया अभी अभूतपूर्व चुनौतियों का मुक़ाबला कर रही है, जैसे महामारी, जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और आतंकवाद। इनके साथ अब मानवता की भलाई की चुनौती और खड़ी हो गई है जो अन्य सबसे ज्यादा मायने रखती हैं। इन चुनौतियों का महत्व आज पहले से कहीं अधिक है। स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चल रही सहभागी योजनाओं का वे महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। समावेशी, संतुलित तथा न्यायसंगत दृष्टिकोण वाले आर्थिक विकास की जरूरत महसूस की जा रही है जिससे सतत विकास और गरीबी उन्मूलन हो सके और सभी को खुशी तथा सब की भलाई को बढ़ावा मिल सके। विश्व भर में लोगों के जीवन में खुशी और कल्याण के सार्वभौमिक लक्ष्य और आकांक्षाओं की प्रासंगिकता को पहचानते हुए तथा सार्वजनिक नीति के उद्देश्यों में उनकी मान्यता दिलाने के लिए संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने अपने 66 वें सत्र के दौरान, 12 जुलाई 2012 को 66/281वें प्रस्ताव के जरिये 20 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में घोषित किया। प्रसन्नता का पहला अंतर्राष्ट्रीय दिवस 20 मार्च 2013 को आयोजित किया गया।

संयुक्त राष्ट्र के हैप्पीनेस इंडेक्स में उदारता, भ्रष्टाचार की अवधारणा, प्रति व्यक्ति जीडीपी, सामाजिक समर्थन, जन्म के समय स्वस्थ जीवन का अनुमान, जीवन में चयन की स्वतंत्रता आदि जैसे संकेतकों के आधार पर देशों को श्रेणीबद्ध किया जाता है। उदात्त मूल्यों और संस्कृति के हमारे इतने बड़े भंडार, जो आंतरिक प्रतिबिंबों के माध्यम से सभी प्राणियों के लिए खुशी और भलाई को बढ़ावा देते हैं, के बावजूद भारत के प्रदर्शन के बारे में सरोकार रखना चाहिए। जरूरत है कि यह अवस्था हमारे सामाजिक और वैश्विक बेहतरी के लिए हमारे विचारों और कार्यों के बीच गंभीरता से समन्वय स्थापित करे। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि ऊपर से नीचे वाले तरीके से वैश्विक दृष्टिकोण हासिल नहीं किया जा सकता बल्कि नीचे से ऊपर वाले दृष्टिकोण से ऐसा करना संभव है जो व्यक्ति के खुद अंदर से आना चाहिए। प्रसन्नता के व्यक्तिवादी बोध से चरित्र की सुंदरता वाले एक बेहतर व्यक्ति का निर्माण होगा, जिससे एक खुशहाल परिवार, एक खुशहाल समाज बनेगा, और इसकी खुशबू राष्ट्रीय सीमाओं को पार कर जाएगी और एक न्यायप्रिय दुनिया बनाने के लिए असमानताओं को कम किया जा सकेगा और सभी के लिये बेहतर जीवन सुनिश्चित किया जा सकेगा। 

 

भारतीय महाकाव्यों और पुराणों में प्रसन्नता के संदर्भ में कई शिक्षाएं मिलती हैं। भागवत गीता के 18वें अध्याय के 36वें श्लोक में कहा गया है: “सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ।अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति।।”

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इसका अर्थ है, “यदि मन खुश है, तो पूरी दुनिया (लगता है) खुश है। यदि मन निराश है, तो पूरी दुनिया (प्रतीत होता है) निराश है। अतः यदि आप खुशी चाहते हैं, तो पहले मन की खुशी पाने का प्रयास करें।”

प्रसन्नता व्यक्तिगत स्तर पर आत्म-चेतना की एक विशुद्ध आंतरिक और अमूर्त भावना है, लेकिन इसकी अनुभूतियों की तरंगें बाहर सामूहिक रूप से सभी के कल्याण के सुसंगत परिवेश का निर्माण करती हैं। हमारे दैनिक जीवन में, हम जो कुछ भी अच्छा करते हैं वह खुशी का स्रोत बन जाता है। यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुका है कि सकारात्मक संपर्क और अनुभवों के माध्यम से खुशी प्राप्त की जा सकती है। यह संपर्क और अनुभव मनुष्य के मस्तिष्क में रासायनिक प्रतिक्रिया पैदा करते हैं। डोपामाइन- जिसे पुरस्कार रसायन कहा जाता है, ऑक्सीटोसिन- प्रेम का हार्मोन, सेरोटोनिन- मूड को स्थिर रखने वाला हार्मोन और एंडोर्फिन- दर्द निवारक हार्मोन आदि प्रसन्नता की शाश्वत भावना के दूत कहे जा सकते हैं। 

खुशी कोई विशेष इकाई नहीं है; यह विभिन्न घटनाओं, कार्यों और परिणामों की परिणति है। सरकारें, गैर सरकारी संगठन, उद्योग, सामाजिक संगठन और प्रशासनिक मशीनरी असीमित या परोक्ष रूप से व्यक्तियों और उनकी सामूहिक खुशी को प्रभावित करने वाली वस्तुओं पर प्रभाव डालती है। नागरिकों के जीवन को आसान बनाने, दलितों के उत्थान, बेहतर बुनियादी ढांचे, रोजगार के अवसरों में वृद्धि के लिए सरकार द्वारा किए गए उपायों से नागरिकों की खुशहाली में सीधे सुधार होता है। दूसरी तरफ, फिट-इंडिया अभियान, खेलो भारत, प्रधान मंत्री की परीक्षा पर चर्चा आदि, नागरिकों के लिए तनाव घटाने और उनके स्वस्थ जीवन के लिए जागरूकता के उपाय बनते हैं। विभिन्न शैक्षिक संस्थान, मनोविज्ञान, संज्ञानात्मक विज्ञान, तंत्रिका विज्ञान, प्रबंधन, शैक्षिक प्रौद्योगिकी, सिग्नल प्रोसेसिंग से संबंधित विभिन्न विषयों को एक साथ लाकर सार्थक जीवन, सुख, भलाई और समग्र आत्म विकास के लिए सकारात्मकता के विज्ञान और अभ्यास को बढ़ावा देने के उपायों को अपने पाठ्यक्रमों में शामिल कर रहे हैं। 

तकनीकी रूप से आपस में जुड़ी दुनिया में, उपभोक्तावाद, बाजार की ताकतें और भौतिक वस्तुओं का लगाव जो खुशी देते हैं वह सतही और अल्पकालिक होती है। हम सभी को ऐसी खुशी पाने की चाह की बजाय अपनी इच्छाओं को सीमित करके खुशी की तलाश करना सीखना चाहिए। उपभोक्तावादी दृष्टिकोण की जगह न्यूनतमवादी दृष्टिकोण अपनाना भविष्य की पीढ़ियों के लिए धरती की स्थिरता सतत बनाए रखने में मदद करेगा। भौतिक वस्तुओं को खरीदने की बजाय, हमें अच्छे अनुभव पाने को प्राथमिकता देनी चाहिए। इससे समाज को अवसाद, आत्महत्याओं, मानव तस्करी और अन्य बुरे इरादों की प्रवृत्तियों से बाहर निकलने में मदद मिलेगी। 

अंत में कह सकते हैं कि खुशी अपने अंदर बहुत ही व्यक्तिपरक होती है। अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति के उसके स्वभाव के अनुरूप अलग-अलग पैरामीटर होते हैं। परंतु यह वस्तुपरक तरीके से देखने की चीज है जिससे व्यक्ति के अपने घेरे में उसके विचारों और क्रियाओं से प्रसन्नता पाई जा सकती है। ये व्यक्तिगत घेरों के अंतर-संबंध बेहतर न्यायपूर्ण और सामंजस्यपूर्ण समाज का निर्माण करेंगे। इस अवसर पर आइये हम आंतरिक रूप से यह निर्णय लें कि कोई भी कभी भी जब हम से विदा ले तब वह बेहतर और खुशहाल हो कर जाये और हमारी सामूहिक बुद्धि हमें इस बात के लिए साथ मिलकर काम करने की ताकत दे ताकि : 

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।। 

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